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Inside Story : आखिर मुकेश से 40 अरब डॉलर कम कैसे हो गई अनिल की संपत्ति ?

कैच ब्यूरो | Updated on: 19 October 2018, 17:26 IST

धीरूभाई अंबानी के दोनों बेटों मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी के कारोबार का डंका आज भी पूरे देश में बज रहा है लेकिन पिछले कुछ सालों में इन दोनों भाइयों की किस्मत एक दूसरे से बिलकुल जुदा रही. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट की माने तो पिछले एक साल में इन दोनों भाइयों की सम्पति में 40 अरब डॉलर से भी अधिक का अंतर आ चुका है. बड़े भाई मुकेश अंबानी का कारोबार जहां लगातार सफलता की नई ऊंचाइयां छू रहा है वहीं अनिल अंबानी लगातार कर्जे में डूबते जा रहे हैं.

टेलिकॉम कंपनी जियो शुरू करने के बाद 61 वर्षीय मुकेश अंबानी ने चीन के जैक मा को पछाड़कर एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति का दर्जा हासिल कर लिया है. पेट्रोकेमिकल्स समूह चलाने वाली मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड अब 100 बिलियन डॉलर क्लब में शामिल हो चुकी है.ब्लूमबर्ग बिलियनेयर इंडेक्स के मुताबिक मुकेश की निजी सम्पत्ति 43.1 बिलियन डॉलर (31 खराब) हो चुकी है, जो मा और माइक्रोसॉफ्ट कॉर्प के पूर्व प्रमुख स्टीव बाल्मर से ज्यादा है.

इंडेक्स के मुताबिक मुकेश से दो साल जूनियर अनिल अंबानी के लिए बीते दो साल मुश्किल से भरे रहे. उनके कुछ व्यवसायों को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. अनिल अंबानी की कंपनी के शेयर लगातार गिर रहे हैं. अनिल की संपत्ति में अब तक 1.5 अरब डॉलर (4 ख़रब ) तक की गिरावट आयी है. इन दोनों भाइयों की सम्पतियों के अंतर और व्यापार संचालन को लेकर कभी दोनों भाइयों ने कोई सफाई नहीं दी है.

वसीयत नहीं लिख पाए थे धीरूभाई 

दोनों भाइयों की सम्पतियों की कहानी आज से लगभग 16 साल पहले शुरू हुई थी. जब उनके पिता धीरूभाई अंबानी का निधन हुआ था. धीरूभाई के कारोबार शुरू करने की कहानी से बॉलीवुड भी खूब प्रभावित हुआ लेकिन दोनों भाइयों के बीच विवाद का प्रमुख कारण यह रहा है कि धीरूभाई अपने निधन से पहली कोई वसीयत नहीं लिख पाए.

यमन में गैस स्टेशन परिचर के रूप में कारोबार शुरू करने वाले शुरू होने वाले धीरूभाई ने एक गैस क्षेत्र में एक विशाल एम्पायर खड़ा किया. जो कि छोटे निवेशकों को इतने सारे शेयर बेचकर भारी कारखानों का वित्तपोषण कर रहा था कि एक फुटबॉल स्टेडियम में स्टॉकहोल्डर मीटिंग आयोजित करनी पड़ती थी. अपने पिता की मौत के बाद दोनों बेटों के बीच आखिरकार मां कोकिलाबेन के हस्तक्षेप के बाद 2005 में विवाद सुलझ सका.

 

मुकेश को फ्लैगशिप ऑयल रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल्स का कारोबार मिला, जबकि अनिल को बिजली उत्पादन और वित्तीय सेवाओं जैसे नए कारोबार मिले. अनिल ने टेलीकॉम यूनिट भी ले ली, जो मुकेश के अधीन कम कीमत पर मोबाइल कनेक्शन बेचने के बाद विस्तार कर रहा था. उस वक़्त वायरलेस डिवीजन अनिल को उम्मीद से भारत अवसर प्रदान करने वाला लगा.

2005 में कच्चे तेल की कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल से अधिक की रिकॉर्ड रिकॉर्ड पर चढ़ गई. जिससे चिंता बढ़ गई कि रिफाइनरों का मार्जिन खराब हो सकता है. भारत के बढ़ते मोबाइल फोन बाजार का भविष्य लगातार चमक रहा था. कारोबार के करार के कारण मुकेश अम्बानी कोई ऐसा कारोबार शुरू नहीं कर सकते थे जिससे अनिल को नुकसान हो लेकिन दोनों भाइयों के बीच नॉन-कंपीट क्लाउज (प्रतिस्पर्धा नहीं करने की शर्त) 2010 में खत्म हो गया.

हालांकि इस बात का किसी को अंदाजा नहीं था कि मुकेश अम्बानी मौजूदा कारोबार के पैसे से लगातार नए कारोबार को शुरू करने में लगे थे. आखिकार ने मुकेश अंबानी की टेलीकॉम कंपनी जियो ने सारी टेलीकॉम कंपनियों की नींद उड़ा दी. इस कंपनी ने बहुत की कम समय ने फ्री ऑफर के साथ 22 लाख 70 हजार ग्राहक जुटा लिए कंपनी लगातार मुनाफे में आने लाएगी. मुकेश के जियो की चपेट में अनिल की टेलीकॉम कंपनी आरकॉम भी आयी जिसे आखिरकार अपना कारोबार समेटना पड़ा. अनिल अब अपने कर्जों को चुकाने के लिए अपना कारोबार बेच रहे हैं. कई कपनियां अनिल अंबानी के खिलाफ अदालतों के दरवाजे खटखटा रही हैं.

First published: 19 October 2018, 17:17 IST
 
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