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तेल की दुनिया की ताकतवर हस्ती बनना चाहता है भारत, क्या यह संभव है?

नीरज ठाकुर | Updated on: 27 July 2016, 7:21 IST

सारी दुनिया तेल कम्पनियों द्वारा चलाई जा रही है और दुनिया की सबसे बड़ी तेल कम्पनियों में से कुछेक सरकारी कम्पनियां हैं. उदाहरण के लिए दुनिया की सबसे बड़ी तेल कम्पनी सउदी अरमाको, रूस की रोजनेफ्ट, ईरान की नेशनल ईरानियन आॅयल कम्पनी ऐसी ही विशाल कम्पनियां हैं जो ऊर्जा जगत में अपनी-अपनी सरकारों को बेतहाशा ताकत प्रदान कर रही है.

भारत सरकार भी लम्बे समय से तेल की ताकत को पहचानते हुए एक बड़ी कम्पनी बनाना चाहती है जो दुनिया की निजी क्षेत्र की तेल कम्पनियों जैसे भारत पेट्रोलियम, शेरवाॅन और एक्साॅन मोबाइल को मिलाकर उससे भी बड़ी हो.

प्रस्ताव एनडीए सरकार के टेबल पर है और मंत्रिमंडल को अब यह विचार करना है कि क्या सरकार को ऐसी कोई घोषणा कर देनी चाहिए जिसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र की 13 तेल कंपनियों को मिलाकर एक बड़ा तेल पूल स्टेशन बनाने की योजना हो.

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इससे पहले कि मौजूदा एनडीए सरकार यह कदम उठाए सरकार के लिए वी कृष्णमूर्ति समिति की सिफारिशोंं पर एक नजर डालना फायदेमंद रहेगा. इसका गठन 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय में किया गया था.

भारत में ऐसा कोई भी विलय कर्मचारियों की संख्या में कटौती करवाएगा जो कि तर्कसंगत नहीं होगा

अपनी रिपोर्ट में समित ने कहा है- ‘विलय और अधिग्रहण (एम एंड ए) के मौजूदा उदाहरणों को दखें तो पता चलता है कि दुनिया में केवल 29 प्रतिशत एम एंड ए ही शेयर होल्डरों को लाभ दिलवा सके हैं. इसमें मानवीय पक्ष की अनदेखी करने के कारण ही ये विलय कुछ हद तक सफल रहे हैं.’ 

13 कम्पनियों का विलय कर एक बड़ी कम्पनी बनाने से होगा यह कि तेल व गैस क्षेत्र के सारे व्यावसायिक मामले एक ही कम्पनी देखने लगेगी. इसका मतलब हुआ कि एक ओएनजीसी ही तेल व गैस की खोज, शोधन और देश-विदेश में अंतिम पेट्रोलियम उत्पाद की मार्केटिंग का काम करेगी.

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इस संबंध में कृष्णमूर्ति समिति का कहना था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिन कम्पनियों का विलय हुआ, उनमें ज्यादातर कम्पनियां कमोबेस पहले से ही समेकित थीं.

भारत में हाल ही में हुए विस्तारीकरण के बावजूद सार्वजनिक क्षे़त्र की इकाई यानी पीएसयू कमोबेस हाइड्रोकार्बन वैल्यू चेन के खास क्षे़त्रों में ही कार्यरत है, जो कि उनका अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र है. भारत में ऐसा कोई भी विलय कर्मचारियों की संख्या में कटौती करवाएगा जो कि तर्कसंगत नहीं होगा.

क्या कोल इंडिया लिमिटेड की तरह एक होल्डिंग कम्पनी जिसकी बहुत सी सब्सिडरीज हैं, सभी पीएसयू को समेकित करने का काम करेगी? इस पर कृष्णमूर्ति समिति ने कहा राष्ट्रीय और सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होल्डिंग कम्पनी की अवधारणा चीन जैसे देश में चल सकती है, जहां राजनीतिक व्यवस्था पर एक ही पार्टी का नियंत्रण है. 

मौजूदा सत्ता एक तेल और गैस के महाभंडार के विचार को आजमा कर देखना चाहती है

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लेकिन लोकतांत्रिक समाज में इनमें से कई संभव नही ंहै, क्योंकि यहां सब कुछ आपसी सहमति पर निर्भर है. भारत में कोयला क्षेत्र में जिस तरह की होल्डिंग कम्पनी है, उसकी सब्सिडरी कंपनियों में बाधित उद्यमशीलता/जवाबदेही देखने को मिलती है, जैसे कि ऐसी कंपनी जो पूरे ढांचे में बस एक परत की तरह हो.

अतीत में भले ही प्रस्तावित माॅडल की कितनी ही आलोचना हुई हो, मौजूदा सत्ता एक तेल और गैस के महाभंडार के विचार को आजमा कर देखना चाहती है. ऊर्जा कंपनियों से मिलने वाली भरी भरकम राजस्व राशि अरबों डाॅलर में होती है, जो भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात मजबूती से रखने का आत्मविश्वास दे सकती है.

चीन, रूस और सऊदी अरब जैसे देश अपनी तेल कम्पनियों के अरबों डाॅलर के दम पर ही दुनिया में धाक जमाते आए हैं. भारत और इन देशों के बीच एक बड़ा अंतर प्रमाणित तेल व गैस भंडार का है.

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सउदी अरब के उदाहरण पर गौर करते हैं. वहां 2015 में 268 अरब बैरल तेल का भण्डार बताया गया और रूस में 80 अरब बैरल का.

इसके मुकाबले भारत में 2015 तक केवल 5.7 अरब बैरल कच्चा तेल पाया गया. ऐसे हालात में तेल कंपनियों के एम एंड ए का कदम बड़ी संख्या में लोगांे को राजनीतिक शोर मचाने का मुद्दा दे देगा.

First published: 27 July 2016, 7:21 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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