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ऑनलाइन असुरक्षाः साइबरक्राइम में भारतीयों को लगा 1,82,000 करोड़ रुपये का चूना

रंजन क्रास्टा | Updated on: 24 November 2015, 22:15 IST
QUICK PILL
  • भारत में साइबर क्राइम के शिकार लोगों की बड़ी तादाद से तो ऐसा लगता है जैसे हमें इसकी कोई चिंता ही नहीं. पिछले एक साल में यहां 11 करोड़ 30 लाख लोग साइबरक्राइम के शिकार हुए हैं.
  • साइबर सुरक्षा की बड़ी कंपनी नॉर्टन की ताजा \'साइबर सिक्योरिटी इनसाइट्स रिपोर्ट\' के मुताबिक भारत में साइबर अपराध के पीड़ितों की संख्या जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया की कुल आबादी से भी से ज्यादा है.

हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा अब इंटरनेट पर गुजरने लगा है. ऐसे में साइबर सुरक्षा के बारे में लोगों की चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक है. लेकिन भारत में साइबर क्राइम के शिकार लोगों की बड़ी तादाद से तो ऐसा लगता है जैसे हमें इसकी कोई चिंता ही नहीं. पिछले एक साल में यहां 11 करोड़ 30 लाख लोग साइबरक्राइम के शिकार हुए हैं.

साइबर सुरक्षा की बड़ी कंपनी नॉर्टन की ताजा 'साइबरसिक्योरिटी इनसाइट्स रिपोर्ट' के मुताबिक भारत में साइबर अपराध के पीड़ितों की संख्या जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया की कुल आबादी से भी से ज्यादा है. रिपोर्ट में भारत के बारे में दी गयी दूसरी जानकारियां भी इस मामले में देश की खराब स्थिति बयां करती हैं. 

साइबर सुरक्षा

ऑनलाइन डेटिंग सर्विस ऐस्ले मैडिसन से लेकर हॉलीवुड प्रोडक्शन हाउस सोनी तक साइबरक्राइम के सुर्खियों में आ चुके हैं. बीता साल ऑनलाइन अपराधों के लिहाज से उल्लेखनीय रहा.

नॉर्टन का अनुमान है कि दुनिया भर के 59 करोड़ 40 लाख लोग साइबरक्राइम के शिकार रहे हैं. हर छठवां साइबरक्राइम पीड़ित भारतीय है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या बहुत ज्यादा है. लेकिन इस रिपोर्ट के नतीजों के देखते हुए साइबर सुरक्षा को लेकर हमारी लापरवाही समझ से परे है. 

साइबर अपराधों से निपटने में आम भारतीय को औसतन 29 घंटे लगते हैं. जबकि इसका वैश्विक औसत 21 घंटे है

पूरी दुनिया में इंटरनेट यूजर्स ने साइबरक्राइम की वजह से औसतन करीब 23,270 रुपये गंवाए हैं. केवल पिछले एक साल में साइबर क्रिमिनलों ने यूजर्स को 13 हज़ार 78 सौ करोड़ रुपये की चपत लगायी थी. 

बाकी दुनिया के प्रति इंटरनेट यूजर औसत धोखाधड़ी की तुलना में भारतीयों ने कम पैसे गंवाएं हैं. भारत में यूजर्स को साइबरक्राइम की वजह से औसतन 16,770 रुपये गंवाने पड़े. लेकिन भारत में यूजर्स की बड़ी संख्या के कारण साइबर अपराध की शिकार हुई कुल रकम बहुत ज्यादा हो जाती है.

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पिछले एक साल में भारत में एक लाख 84 हज़ार करोड़ रुपये साइबर अपराध की भेंट चढ़ गये.

अगर आप सोचते हैं कि 'टाइम इज़ मनी' (समय ही पूंजी है) तो यह आंकड़े और ज्यादा भयावह हो जाते हैं. 

साइबर अपराधों से निपटने में आम भारतीय को औसतन 29 घंटे लगते हैं. जबकि इसका वैश्विक औसत 21 घंटे है.

क्षमता से ज्यादा आत्मविश्वास

ऐसा नहीं है कि भारतीयों को साइबरक्राइम के बारे में पता नहीं है. वो इससे पूरी तरह बेफिक्र भी नहीं हैं. एक हालिया सर्वेक्षण में शामिल करीब 60 फीसदी भारतीयों ने कहा कि वे साइबर अपराधों को लेकर चिंतित रहते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक हर तीन में से दो भारतीय पब्लिक वाईफाई को सार्वजनिक शौचालय के प्रयोग से भी ज्यादा जोखिम भरा मानते हैं. 

भारत के सार्वजनिक शौचालयों की हालात को देखते हुए ये समझा जा सकता है कि भारतीयों को साइबर अपराध के खतरे का अंदाजा है. 

ऐसे में हमारी इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली तकरीबन आधी आबादी साइबर अपराध का कैसे शिकार हो गई? 

दरअसल इसकी बड़ी वजह सुरक्षा उपायों को लेकर हमारा गलत भरोसा है. सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश लोगों ने अपनी साइबर सुरक्षा उपायों को ए ग्रेड दिया. जबकि आंकड़े कुछ और ही हक़ीकत बयां करते हैं. 

केवल 41 फीसदी भारतीय यूजर्स साइबर सुरक्षा के बुनियादी मानकों के अनुरूप पासवर्ड का इस्तेमाल करते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी पासवर्ड को आठ डिजिट का होने चाहिए जिसमें अक्षर, अंक और सिंबल्स सभी का प्रयोग किया गया हो.

सर्वे में शामिल लोगों में बहुतों ने माना कि वो संवेदनशील अकाउंट का पासवर्ड भी दूसरे लोगों के साथ साझा कर चुके हैं. जिसे उन लोगों ने इस्तेमाल भी किया. एक तिहाई भारतीय अपने डेस्कटॉप और स्मार्टफोन जैसे गैजेट्स को पासवर्ड से लॉक नहीं करते. 

साइबर सुरक्षा के लिहाज से ये खतरनाक बात है लेकिन साइबर अपराधियों के लिए एक आदर्श स्थिति है. आज लोग बहुत कम उम्र में ही इंटरनेट का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं. ऐसे में आप सोचेंगे कि साइबर सुरक्षा की स्थिति में सुधार आएगा. 

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क्या आप उस दुनिया की कल्पना कर सकते हैं कि जहां लोग बेहद छोटी उम्र से ही इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगते हैं.

लोगों को लगता है कि वे सुरक्षित हैं बाकी खतरे में हैं

कुछ लोग सोचते हैं कि बुजर्ग लोग या इंटरनेट क्रांति से पहली की पीढ़ी के लोगों पर साइबर अपराध का खतरा ज़्यादा होता होगा. अगर आप भी ऐसा सोचते हैं तो गलत सोचते हैं. सच इसके ठीक उलट है.

रिपोर्ट के अनुसार जिन यूजर्स की उम्र 50 साल से अधिक थी वो इंटरनेट सुरक्षा को लेकर ज्यादा सजग थे. हो सकता है कि इसकी एक वजह सुरक्षा को लेकर उनके पुराने ख्यालात हों.

केवल 41 फीसदी भारतीय यूजर्स साइबर सुरक्षा के बुनियादी मानकों के अनुरूप पासवर्ड का इस्तेमाल करते हैं

वहीं 21वीं सदी में जवान हुए बच्चों के वर्ग में हर 10 में से 4 का मानना था कि साइबर अपराधियों के पास कोई वजह नहीं है जो वो उन्हें निशाना बनाएंगे. जबकि रिपोर्ट के अनुसार ऐसे हर 10 में से 7 लोग साइबर अपराध के शिकार  हो चुके हैं. ऐसे हर दो में से एक बच्चा पिछले सालों में इसका शिकार हो चुका है.

साइभर सुरक्षा की गंभीर स्थिति को देखते हुए उम्मीद है कि आम भारतीय ज्यादा सजग हो जाएंगे. क्योंकि अगर हमारा बैंक अकाउंट हैक हो गया तो वो साइबर सुरक्षा से महंगा पड़ेगा. 

First published: 24 November 2015, 22:15 IST
 
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