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आईपीओ के जोखिम: कम्पनी मालिक अपना निवेश निकालने के लिए आपके पैसे का इस्तेमाल करते हैं

नीरज ठाकुर | Updated on: 6 August 2016, 16:38 IST
(कैच)
QUICK PILL
  • कम्पनियों ने अपने मौजूदा निवेशकों को कम्पनी से बाहर निकालने के लिए जरूरी पूंजी इकट्ठा करने के मकसद से आईपीओ जारी किया है.
  • शेयर बाजारों की मौजूदा हालत के बीच कंपनियां और प्रमोटर पैसा बनाने के लिए जनता के बीच आईपीओ लाने का हथकंडा अपना रहे हैं.

कोई कम्पनी कब अपना प्रारम्भिक सार्वजनिक इश्यू लेकर आती है? किसी पाठ्य पुस्तक में इसे ऐसे समझाया जाता है, जब कोई कम्पनी अपना व्यापार बढ़ाने के लिए जनता से पैसे उगाहना चाहती है, तब वह ऐसा करती है, जब उसे अपना व्यापार उस स्तर तक ले जाना हो, जहां जनता ही उसमें पैसा लगा सकती है.

परन्तु असलियत में इसमें थोड़ा फर्क है. अक्सर कम्पनी उस वक्त आईपीओ लेकर आती है, जब कम्पनी के मूल निवेशकों को उससे बाहर निकलना होता है, तब वे जनता को आईपीओ का लुभावना आॅफर देकर भविष्य में आर्थिक लाभ का सपना दिखाते हैं.

भारतीय स्टाॅक एक्सचेंज में हाल ही में आए कुछ आईपीओ इसी मूल मकसद के चलते लाए गए हैं. कम्पनियों ने अपने मौजूदा निवेशकों को कम्पनी से बाहर निकालने के लिए जरूरी पूंजी इकट्ठा करने के मकसद से आईपीओ जारी किया है न कि कम्पनी के प्रोफाइल में विस्तार के लिए.

अक्सर कम्पनी उस वक्त आईपीओ लेकर आती है, जब कम्पनी के मूल निवेशकों को उससे बाहर निकलना होता है.

मिंट अखबार द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में आईपीओ द्वारा उगाही गई राशि में से दो तिहाई सेल आॅफरों में निवेश कर दी गई. इससे मौजूदा निवेशकों को निकलने का मौका मिला.

केवल एक तिहाई राशि ही कम्पनी की पूंजी में समाहित की गई. यह पिछले दस वर्षों का न्यूनतम है, केवल 2013 को छोड़ कर जब आईपीओ से जुटाई गई राशि में से केवल एक चौथाई ही कम्पनी के विस्तार और पूंजीगत निवेश के काम आई थी.

यह परिदृश्य दो बातों की ओर संकेत करता है, एक तो यह कि कम्पनी के संस्थापक और निवेशक अभी भारत के आर्थिक विकास की बातों पर यकीन नहीं कर पा रहे और अपनी कम्पनी में संभावित जोखिम को कम करने के लिए अपनी पूंजी निकालना चाहते हैं. दूसरा, जिन खुदरा निवेशकों ने इन कम्पनियों में निवेश किया है, उन्हें इस जोखिम की आशंका रहती है कि कहीं अगर यह कम्पनी निकट भविष्य में चल नहीं पाई तो उनका पैसा डूब सकता है.

अस्थिर बाजार

पिछले दो सालों में दुनिया भर के शेयर बाजारों में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया. इसका खामियाजा निवेशकों को भारी पूंजी गंवा कर भुगतना पड़ा. कुछ अल्प अवधि के दौरान बाजार में उछाल भी रहा लेकिन उसका इस्तेमाल कम्पनियों ने अपने निवेश की रकम वसूलने के लिए किया. भारत में 2013 से 2015 के बीच शेयरों में तेजी का समय रहा, जब सेंसेक्स ने 30,000 का आंकड़ा पार कर लिया था.

सरकार भले ही यह दावे कर रही हो कि चीन को पछाड़ते हुए भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन चुका है, लेकिन काॅरपोरेट सेक्टर से निवेश न के बराबर है.

निष्कर्ष यह है कि भारत में स्टाॅक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कम्पनियों में निवेश करके लाभ की उम्मीद करना दूर की कौड़ी है. कंपनियों के वित्तीय नतीजों ने भी निराश ही किया है.

एक रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में आईपीओ द्वारा उगाही गई राशि में से दो तिहाई सेल आॅफरों में निवेश कर दी गई.

निवेशकों की पूंजी डूबने का एक चौंकाने वाला उदाहरण हाल ही में इंडिगो के आईपीओ के रूप में सामने आया, जो कि सूचीबद्ध होने के नौ माह की ही अवधि में अपने निवेशकों को नकारात्मक परिणाम दे रही है.

शेयर बाजारों की मौजूदा हालत के बीच जो कंपनियां और प्रमोटर पैसा बनाने के लिए जनता के बीच आईपीओ लाने का हथकंडा अपना रहे हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि ब्रितानी मूल के एक अमेरिकी अर्थशास्त्री बेंजामिन ग्राहम का एक प्रसिद्ध कथन है, ‘हर हाल में आईपीओ का निवेशक नुकसान की आग में खुद ही सुलगता है, दो साल तक दूर रहने के बाद दोबारा खुद को उसी आग में झोंकने के लिए किसी और आईपीओ में निवेश कर देता है. जब तक शेयर बाजारों का वजूद रहेगा तब तक निवेशक इस दुष्चक्र में फंसे रहेंगे.’

First published: 6 August 2016, 16:38 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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