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बीजेपी मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई पर यू-टर्न लेने की तैयारी में है?

नीरज ठाकुर | Updated on: 26 January 2016, 20:36 IST
QUICK PILL
  • खबरों के अनुसार खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल फूड रिटेल में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का समर्थन कर रही हैं. एनडीए सरकार इस पर विचार कर सकती है.
  • आरएसएस मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई की सीमा बढ़ाने के खिलाफ है. छोट कारोबारियों के बड़े तबके को वो अपना वोटर मानती है. ऐसे में सरकार के लिए इस फैसले को लागू करने में मुश्किल हो सकती है.

मीडिया में आई खबरों के अनुसार केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल मल्टी-ब्रांडिंग फूड रिटेलिंग में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की इजाजत देने की पैरवी कर रही हैं.

मल्टी-ब्रांड रिटेल (खुदरा बिक्री) में एफडीआई पिछले एक दशक में सबसे विवादित आर्थिक मुद्दा रहा है. तीखे विरोध के बीच 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने मल्टी-ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत एफडीआई की इजाजत दी थी.

उस समय वामपंथियों पार्टियों और बीजेपी ने इसका विरोध किया था. अब बीजेपी खुद सत्ता में है. साल 2014 के लोक सभा चुनाव में भी ये एक अहम मुद्दा था. बीजेपी ने वादा किया था कि अगर वो सत्ता में आयी तो इस फैसले को रद्द कर देगी.

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पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने इसकी आलोचना की फिर भी सत्ता में आने के बाद बीजेपी ने मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई की नीति बदली नहीं. अब खबर ये है कि बादल की मांग पर पार्टी गंभीरता से विचार कर रही है और इसका नतीजा जल्द सामने आ सकता है.

इससे पहले बीजेपी ने अपने बचाव में कहा था कि अगर वो यूपीए के फैसले को पलटती है तो इससे विदेशी निवेशकों में गलत संदेश जाएगा. पिछले साल मई में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि पार्टी मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई की समर्थक नहीं है. उन्होंने कहा, "डिपार्टमेंट ऑफ़ इंड्रिस्टियल पॉलिसी एंड प्रमोशन ने केवल पहले से बनी हुई नीति को बरकरार रखा है."

बीजेपी विपक्ष में थी तो उसने मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई का विरोध किया लेकिन सरकार में आने के बाद वो पलट गयी

अभी तक रिटेल सेक्टर में एफडीआई की बहस दो मुद्दों के ईर्दगिर्द होती है - सिंगल-ब्रांड रिटेल में एफडीआई और मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई.

सिंगर-ब्रांड रिटेल में एडीडास, आईकिया और सैमसंग जैसी कंपनियां और उनके प्रोडक्ट आते हैं. मल्टी-ब्रांड रिटेल में ऐसी कंपनियां आती हैं जो कई ब्रांडों के सामान बेचती हैं, मसलन, वालमार्ट, कैरेफोर और मेट्रो जैसी कंपनियां.

हो सकता है कि सरकार फूड रिटेल को अलग तरीके से पेश करे लेकिन उसे इसपर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) को राजी कराना आसान नहीं होगा.

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मल्टी-ब्रांड फूड रिटेल से सरकार को सबसे ज्यादा राजस्व मिलता है. रिसर्च संस्था क्रिसिल के अनुसार भारत में रिटेल बाज़ार करीब 25 लाख करोड़ रुपये का है जिसका 69 प्रतिशत हिस्सा फूड और ग्रॉसरी रिटेल का है. यानी अगर भारत सरकार फूड रिटेल में 100 प्रतिशत एफडीआई की इजाज़त देती है तो भारतीय रिटेल बाज़ार का सबसे बड़ा हिस्सा एफडीआई के लिए खुल जाएगा.

इसलिए इस फैसले के गंभीर राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं. माना जाता है कि छोटे दुकानदारों में बड़ी संख्या बीजेपी के वोटरों की है. ये तबका इस फैसले से बिदक सकता है. भारत में करीब 22 करोड़ लोग छोटे घरेलू रिटेल कारोबार से जुड़े हुए हैं.

डिपार्टमेंट ऑफ इंड्रस्टियल पॉलिसी एंड प्रमोशन के पूर्व सचिव अजय दुआ कहते हैं कि फूड रिटेल में 100 प्रतिशत एफडीआई की इजाजत देने से किसानों, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, फल विक्रेताओं को भी एतराज हो सकता है.

भारत में रिटेल बाज़ार करीब 25 लाख करोड़ रुपये का है जिसका 69 प्रतिशत हिस्सा फूड और ग्रॉसरी रिटेल का है

पहले भी ऐसे मुद्दे पर विरोध हो चुका है. साल 2007 में रिलायंस फ्रेश फूट आउटलेट की रांची स्थित तीन दुकानों पर तोड़फोड़ हुई थी. जब ऐसे रिटेलर से छोटे दुकानदारों के कारोबार पर ज्यादा असर नहीं पड़ा तो विरोध में सुस्त पड़ गया. लेकिन वालमार्ट, टेस्को और कैरेफोर जैसे बड़े मल्टी-ब्रांड रिटेलर को अभी भी बड़ा खतरा माना जाता है क्योंकि इन ब्रांड के पास बड़ी बड़ी पूंजी है जिसके दम पर ये लंबे समय तक ज्यादा छूट के साथ सामान बेच सकते हैं.

भारत सरकार रिटेल सेक्टर को धीरे धीरे एफडीआई के लिए खोल रही है. जब यूपीए सरकार ने 51 प्रतिशत एफडीआई की इजाजत दी तो उसमें ये शर्त थी कि फूड रिटेलर को 30 प्रोडक्ट घरेलू बाजार से खरीदने होंगे. लेकिन 2013 में यूपीए सरकार ने इस नियम में ढील दे दी.

इन सबके बावजूद विदेश निवेशकों ने भारत के रिटेल बाजार में निवेश करने को लेकर बहुत उत्साह नहीं दिखाया.
'डेलॉयटे' के निदेशक रोहित भाटियानी कहते हैं कि फूड रिटेल में एफडीआई को लेकर सबसे बड़ी दिक्कत मुनाफे को लेकर होगी. वो कहते हैं, "हो सकता है कि फूड रिटेलिंग का कारोबार बड़ा हो लेकिन उसमें मुनाफे की दर काफी कम है. इसलिए केवल फूड रिटेल में एफडीआई बढ़ाना का कंपनियों के लिए कोई खास मतलब नहीं होगा."

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रिटेल निर्यात से जुड़े कारोबारी हरीश बिजूर कहते हैं कि मुनाफा कमाने के लिए ग्लोबल रिटेलरों को यहां पर अपना बुनियादी ढांचा खड़ा करना होगा. वो कहते हैं, "इसका मतलब हुआ कि सरकार को उन्हें ठेका खेती, गोदाम बनाने, डिलिवरी चेन खोलने जैसी सुविधाएं भी देनी होंगी."

आरएसएस मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई की सीमा बढ़ाने के खिलाफ है. ऐसे में सरकार शायद ये दिखाने की कोशिश करे कि फूड रिटेल, कपड़े, इलेक्ट्रानिक, घरेलू सामान के रिटेल से अलग है. लेकिन आरएसएस को इसका यकीन दिलाना कठिन होगा.

देखना है कि सरकार के इस फैसले पर कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां क्या रुख अपनाती हैं. कांग्रेस जब सत्ता में थी तो वो मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई की जोरदार समर्थक थी. लेकिन अब सत्ता की बिसात पलट चुकी है.

First published: 26 January 2016, 20:36 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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