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एक बार फिर से आपकी बचत पर सरकार की तिरछी नजर

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST

पिछले केन्द्रीय बजट में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सीनियर सिटिजन्स वेलफेयर फंड (एससीडब्ल्यूएफ) बनाया था. इसे उम्रदराज लोगों के कल्याण की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना गया था. हालांकि योजना के लिए बजटीय आवंटन सरकारी मंत्रालयों, कर्मचारियों और कर्मचारी संघों के बीच कलह की कारण बन गया.

समस्या की जड़ में वित्त मंत्री की वह मंशा थी जिसमें वह प्राविडेन्ट फंड और अन्य बचतों में जमा ऐसी राशि का उपयोग करना चाहते थे जिसता लंबे समय से कोई हकदार सामने नहीं आया है. इसका अर्थ यह हुआ कि यदि आपने अपने पीएफ जमा पर सात साल से ज्यादा समय तक दावा नहीं किया है तो सरकार की योजना उस फंड को अपने अधिकार में लेकर उसका इस्तेमाल अपने उद्देश्य के लिए करने की थी.

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सूत्रों के अनुसार यह विवाद अब इस नाजुक मोड़ पर पहुंच गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से इसमें सीधे हस्तक्षेप करने को कहा गया है.

क्या सरकार कामगारों की बचत छीन रही है?

वित्त मंत्री ने इस पर स्वतः संज्ञान लिया था कि पीएफ और ईपीएफ के जो खाते सात साल से निष्क्रिय पड़े हुए हैं, उनके फंड को वह सीनियर सिटीजन्स वेलफेयर फंड (एससीडब्ल्यूएफ) में लगा देंगे. इस नियम की अधिसूचना वित्त मंत्रालय द्वारा जारी की गई थी. यह नियम श्रम मंत्रालय के लिए भी बाध्यकारी था. बाद में यही नाइत्तेफाकी, असंतोष का कारण बनी.

श्रम मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस कदम का पक्ष लेते हुए सरकार के बचाव में कहा है, 'ऐसा नहीं है कि किसी भी दावेदार को उसका धन देने से इनकार किया जाएगा. हर खाताधारक को जब उसे धन की जरूरत होगी, वह ब्याज समेत वापस ले सकेगा. यह उसी तरह है जिस तरह किसी बैंक में, जब कोई व्यक्ति सात साल की अवधि तक अपनी राशि पर कोई दावा नहीं करता है तो यह माना जाता है कि वह उपलब्ध नहीं है. मैं इसमें ऐसी कोई वजह नहीं देखता. आखिरकार यह धन तो लोगों के कल्याण में ही इस्तेमाल किया जाएगा. इससे न तो किसी खाताधारक दावेदार और न ही ईपीएफओ को कोई नुकसान पहुंचेगा.'

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हालांकि श्रम मंत्रालय में ही सभी लोग इस विचार से सहमत नहीं हैं. श्रम मंत्रालय के ही एक अन्य अधिकारी का कहना है कि सरकार को लाखों कामगारों की बचत पर अतिक्रमण करने का कोई अधिकार नहीं है. केवल यही एक सामाजिक सुरक्षा है जिसे सरकार लोगों को देती है. इस मुद्दे पर अब प्रधानमंत्री कार्यालय में विचार किया जा रहा है. श्रम मंत्री ने इस कदम पर आपत्ति उठाते हुए वित्त मंत्री को पत्र भी लिखा है.

अन्य बदलाव

इस हफ्ते की शुरुआत में सीबीटी ने एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ईटीएफ) में निवेश सीमा पांच फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी करने पर विचार किया है. ईटीएफ वे फंड होते हैं जो तार्किक रूप से स्टाक की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित होते हैं. हालांकि ट्रेड यूनियनों और अन्य पक्षों के विरोधी रुख के चलते सीबीटी किसी सर्वसम्मति पर नहीं पहुंच सका क्योंकि इन पक्षों ने रेट बढ़ाने पर अपनी चिन्ताएं जताई थीं. कई सेन्ट्रल ट्रेड यूनियनों के सदस्यों ने तो बैठक का बहिष्कार ही कर दिया था.

यह मुद्दा सिर्फ धन को एससीडब्ल्यूएफ में डालने का ही नहीं था. अधिकारियों के अनुसार सरकार चाह रही थी कि ईपीएफओ की जो अनकलेम्ड इकट्ठा राशि है, उसे आंशिक रूप से विभिन्न सरकारी योजनाओं जैसे स्वच्छ भारत, सभी के लिए घर, अन्य योजनाओं में लगा दिया जाए.

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ऐसे में चिन्ता सिर्फ लाखों कामगारों की बचत को इक्विटी मार्केट में निवेश करने को लेकर ही नहीं थी बल्कि इस फंड को विभिन्न सरकारी योजनाओं में लगाए जाने को लेकर भी थी. ईपीएफओ से जुड़े एक अधिकारी के अनुसार–यह कामगारों के धन को हाईजैक करने जैसा है.

कर्मचारी संगठनों का विरोध

सीबीटी के पक्षकारों में से एक सेन्ट्रल ट्रेड यूनियन्स (सीटीयू) भी है. सीबीटी के 42 सदस्यीय समूह में 10 सीटीयू के हैं. देखने में तो यह संख्या बहुत कम है फिर भी सीबीटी के हिस्सेदारों में यह बड़ा वर्ग है.

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सेन्ट्रल ट्रेड यूनियन्स ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस फंड का इस्तेमाल अन्य कहीं करने के सरकार के निर्णय को बदलवाने के लिए वह सब कुछ करेंगे जो वे कर सकते हैं. भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय सचिव बृजेश उपाध्याय कहते हैं कि सरकार को समझना चाहिए कि यह धन उसका नहीं है. सीबीटी इस धन की रक्षक है और धन के लिए जिम्मेदार है. यह एक स्वायत्तशासी संस्था है.

उपाध्याय आगे यह भी कहते हैं कि यह तो इक्विटी में निवेश करने से भी ज्यादा खतरनाक है. यदि आप सरकारी योजनाओं में निवेश करते हैं और वह फेल हो जाती है तब आपको अपनी बचत का कोई लाभ मिलने की कोई उम्मीद नहीं है.

उन्होंने कहा कि पीएफ नियमों के अनुसार मृत्यु जैसे कारणों के चलते यदि किसी व्यक्ति का धन ईपीएफ में लंबे समय तक पड़ा रह जाता है तो यह राशि उसके निकट के बच्चों को स्थानान्तरित कर दी जाती है. इसमें सरकार कहीं आड़े नहीं आती है. यह तो हम लोगों के साथ विश्वासघात होगा. उन्होंने जानकारी दी कि अनकलेम्ड राशि 24,000 करोड़ रुपए के आसपास है.

अभी तक एक सामान्य कर्मचारी के लिए अपने धन को वापस मिलने में चिन्ता का कोई ज्यादा कारण नहीं दिख रहा है. फिर भी, कामगारों के धन का अतिक्रमण करने और उसे सरकारी योजनाओं में लगाने को बुद्धिमानी भरा कदम नहीं माना जा सकता.

First published: 2 August 2016, 8:13 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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