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भारतीय अर्थव्यवस्थाः जस मनमोहन राज में तस मोदी राज में

नीरज ठाकुर | Updated on: 22 January 2016, 8:26 IST
QUICK PILL
  • नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में काफी उत्साह दिखा था लेकिन उसका जमीनी असर नहीं दिखा. विभिन्न सेक्टरों में लगातार गिरावट आ रही है.
  • भारत सरकार को अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए जल्द कदम उठाने होंगे वरना भारत में निवेश को लेकर बना सकारात्मक वैश्विक नजरिया बदल सकता है.

जब नरेंद्र मोदी ने 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तब बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) 24,716 अंकों पर बंद हुआ था.

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी की अर्थव्यवस्था में देसी और विदेशी निवेशकों ने काफी भरोसा जताया. मार्च, 2015 में सेंसेक्स ने 30,000 का आंकड़ा छू लिया. लेकिन उसके बाद भारतीय शेयर बाज़ार में लगातार गिरावट का रुख है.

इस साल 20 जनवरी को बीसीई 417 प्वाइंट गिरकर 24,062.04 अंकों पर बंद हुआ. यानी नयी सरकार बनने के बाद शेयर बाज़ार में जो उत्साह दिखा था वो बहुत जल्द ठंडा पड़ गया.

इसका एक विश्लेषण ये हो सकता है कि दुनिया भर के शेयर बाज़ार में इस दौरान गिरावट आयी है. ख़ासतौर पर ग्लोबल कमॉडिटी प्राइस में आयी कमी के चलते जुलाई, 2015 से चीनी बाज़ार में लगातार गिरावट आ रही है.

बीएसई सेंसेक्स उस स्तर पर पहुंच गया है जहां वो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले था

पिछले दो दशकों से चीनी अर्थव्यवस्था की विकास दर दो अंकों में रही थी जो अब घट रही है. मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने वैश्विक विकास दर के अऩुमान की समीक्षा करके इसके 3.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया. आईएमएफ ने अप्रैल, 2015 में ये दर 3.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था.

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हालांकि आईएमएफ ने अपनी रिपोर्ट में भारत को निवेश के लिहाज से 'उम्मीद की किरण' कहा है. आईएमएफ ने कहा है कि मौजूदा वित्त वर्ष में भारत 7.5 प्रतिशत की विकास दर हासिल करने की राह पर है. इस तरह भारत दुनिया की सबसे तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था है. अप्रैल, 2015 से भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर है.

भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का कारण?


सितंबर, 2015 में भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि चीन की अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट भारतीय अर्थव्यस्था के लिए 'बेहतरीन मौका' है क्योंकि 'दुनिया को आर्थिक प्रक्रिया को चलाने के लिए एक और इंजन की जरूरत है. भारत जैसी अर्थव्यस्था आठ से नौ प्रतिशत की दर से विकास कर सकती है ताकि वैश्विक अर्थव्यस्था में वो मदद कर सके.'

शायद निवेशक वैसा नहीं सोचते जैसा भारतीय वित्त मंत्री सोचते हैं. चीन और दूसरे देशों से बाहर हो गए निवेशक भारत का रुख करते नजर नहीं आ रहे हैं.

सैद्धांतिक रूप से पैसा एक शेयर बाज़ार से दूसरे शेयर बाज़ार में जाता है. ऐसे में अगर भारतीय अर्थव्यस्था दुनिया में 'उम्मीद की किरण' है तो क्या दूसरे बाज़ार का पैसा यहां नहीं आना चाहिए?

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केयर रेटिंग्स के सीईओ मदन सबनवीस इस पर कहते हैं, "बीएससी सेंसेक्स के 30,000 पर पहुंचने का कोई कारण नहीं था. ये केवल भावनात्मक उछाल थी. इसका वास्तविक अर्थव्यवस्था से कोई लेना नहीं था. हालांकि आईएमएफ ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक नजरिया रखा है लेकिन इसका जमीनी असर नहीं दिख रहा. नई सरकार आने के बाद कोई ठोस बदलाव नहीं दिखा है."

दिसंबर में भारत का व्यापारिक निर्यात लगातार 13 महीनों से कम होता जा रहा है.  वैश्विक मांग में उत्साह न होना और अस्थिर वैश्विक मुद्रा बाज़ार इसका प्रमुख कारण माने जा रहे हैं. नॉन-इसेंशियल वस्तुओं के आयात में कमी से व्यापार घाटा बढ़ा.

आईएमएफ के सकारात्मक नज़रिए में कितनी सच्चाई है, क्या सचमुच भारतीय अर्थव्यवस्था उम्मीद की किरण है?

वाणिज्य मंत्रालय के आंकडों के अनुसार बीते महीने निर्यात 14.75 प्रतिशत घटकर 22.3 अरब डॉलर हो गया और आयात 3.9 प्रतिशत घटकर 33.9 अरब डॉलर हो गया. इस तरह व्यापार घाटा 11.6 अरब डॉलर हो गया.

साल 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान भारतीय निर्यात नौ महीने तक मंद रहा था.

पिछले एक साल से सरकार कह रही है कि निर्यात में गिरावट वैश्विक परिघटना है. वहीं भारतीय कारोबारी जगत सरकार से नाखुश है.

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भारतीय निर्यात में लगातार होती गिरावट पर इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन टीएस भसीन ने मिंट अख़बार से कहा, "अगर यही हालत रही तो भारत 'उम्मीद की किरण' कैसे बनेगा. निर्यात जीडीपी और रोजगार निर्माण का एक प्रमुख अंग है. इसकी जिम्मेदारी अब वित्त मंत्री अरुण जेटली पर है कि वो निर्यात में छूट दें. उन्हें इसके लिए बज़ट तक इंतजार नहीं करना चाहिए. फ़रवरी के आखिर तक बहुत देर हो जाएगी."

मौजूदा वित्त वर्ष के पहली दो तिमाहियों में रियल एस्टेट, कंज्यूमर गुड्स और सीमेंट उद्योग में भी गिरावट देखी गयी. जाहिर है इस परिप्रेक्ष्य में भी भारत को 'उम्मीद की किरण' नहीं कहा जा सकता.

भारतीय रुपया पिछले 29 महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है

भारत को इस समय वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत गिरने का फायदा मिल रहा है. जिसकी वजह से 2015-16 में भारत का मौजूदा चालू खाता घाटा जीडीपी का 1.1 प्रतिशत रहा. पिछले साल ये 1.3 प्रतिशत था. फिर भी भारतीय रुपये के विनिमय मूल्य में आ रही गिरावट नहीं रुक रही है. डॉलर की तुलना में इस समय भारतीय मुद्रा पिछले 29 महीने के न्यूनतम स्तर 68 रुपये पर है.

पैसा जा कहां रहा है?

सामान्य समझ कहती है कि सुस्त अर्थव्यवस्था से निवेशक पैसा निकाल कर किसी विकसित होती अर्थव्यवस्था में पैसा लगाते हैं. इस लिहाज से निवेशकों को भारत में पैसा लगाना चाहिए. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है तो ये सवाल लाजिम है कि पैसा जा कहां रहा है?

एलेक्स मैथ्यूज के रिसर्च हेड जियोजीत बीएनपी परीबास कहते हैं, "इस समय यूएस बॉन्ड निवेश के लिहाज से सबसे सुरक्षित है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने कहा है कि वो 2016 में ब्याज दर को तीन-चार गुना बढ़ाएगा. इसलिए ये एक बेहतर विकल्प बन गया है."

भारतीय शेयर बाजार में आ रही गिरावट से ये साफ है कि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी से अछूता नहीं रह सकता. ऐसे में सरकार को आर्थिक मंदी से निपटने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना होगा.

भारतीय अर्थव्यस्था को लेकर अगर वैश्विक नज़रिया सकारात्मक है तो हमें ये भी याद रखना चाहिए कि नज़रिया ऐसी चीज़ है जो कभी भी बदल सकता है.

First published: 22 January 2016, 8:26 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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