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खुल गया जेटली का पिटारा : हैं कई चौंकाने वाले अप्रिय निर्णय भी

भावेश शाह | Updated on: 1 April 2017, 9:33 IST


भारत अपने इतिहास के सबसे बड़े कर सुधार 'गुड्स एंड सर्विस टैक्स यानी जीएसटी' को इसकी अवधारणात्मक शुरुआत के 15 साल बाद अब इसे लागू करने की दहलीज पर है. राज्यसभा में विपक्ष के विरोध की आशंका के मद्देनजर सरकार ने जीएसटी संबंधी बिलों को लोकसभा में मनी बिल के रूप में पेश किया. इसलिए इसमें किसी संशोधन के लिए या इसके अप्रूवल के लिए सरकार को अब इस बिल को राज्यसभा से पारित कराने की जरूरत नहीं होगी. पिछले छह महीनों में सभी राज्य जिनमें अब बड़ी संख्या में राज्य भाजपा शासित ही हैं, ने जीएसटी के क्रियान्वयन में रुचि दिखाई है. वित्त मंत्री अरुण जेटली के जीएसटी को हकीकत बनाने के लिए किए गए प्रयास सराहनीय हैं.


यहां तक तो सब ठीक है. पर सरकार और जीएसटी कांउसिल के लिए असली परीक्षा अभी बाकी है. अब जो यात्रा है वह अनजाने क्षेत्र में है- वस्तुओं और सेवाओं को उनके टैक्स दायरे में रखना, जीएसटी कर प्रणाली को क्रियान्वित करने के लिए नियमों का मसौदा तैयार करना और उनको अंतिम रूप देना, और नई कर प्रशासन प्रणाली को लागू करना. लोकसभा में जो बिल पेश किया गया है उसमें कई ऐसे प्रावधान हैं जो कि विनिर्माताओं, कारोबारियों और सबसे महत्वपूर्ण उपभोक्ताओं के लिए समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

 

 

विपक्ष की आशंकाएं


बुधवार को जेटली ने संसद में बहस की शुरुआत की. विपक्ष हालांकि जीएसटी के आईडिया के समर्थन में है लेकिन उसने सरकार के मसौदे की आलोचना की जबकि ट्रेजरी बेंच पर पर बैठे सदस्यों ने इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गेमचेंजर करार दिया.

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यूपीए सरकार को जीएसटी लागू करने का मौका न देने से राष्ट्र को 12 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. पूर्व विधि मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली ने बिल पर चर्चा के दौरान कहा कि सात-आठ साल हो चुके हैं कि जब तत्कालीन यूपीए जीएसटी बिल को पारित करना चाहती थी. लेकिन तब कुछ पार्टियों ने सोचा कि इसे रोका जाना चाहिए और इसका कारण सिर्फ वे ही जानते हैं.

इसके बाद उन्होंने जोड़ा कि जीएसटी को लाने में इस देरी से देश को लगभग डेढ़ लाख करोड़ का वार्षिक नुकसान हुआ है. मोइली ने आगे आरोप लगाया कि जीएसटी और भारतीय संविधान में बुनियादी अंतर्विरोध हैं, क्योंकि यह इसके बुनियादी प्रावधानों के विरुद्ध जाती है. मोइली के अनुसार जीएसटी काउंसिल, जिसको जीएसटी दरें तय करने का अधिकार दिया गया है, वह संसद की विधायी शक्तियों में बाधक है.

दूसरी तरफ बीजू जनता दल के सदस्य भर्तुहरी महताब ने कहा कि इस सुधार से जो लाभ होने की उम्मीद जताई जा रही है उन पर लगाम लगाने की जरूरत है, उन्होंने कहा “हमें जीएसटी से होने वाले फायदे को लेकर उम्मीदों को कुछ कम करने की जरूरत है. क्या इससे देश को फायदा होगा, क्या इससे राज्यों का कर राजस्व अप्रभावित रहेगा और क्या इससे उपभोक्ताओं को कम दामों पर सामान और सेवाएं मिल सकेंगी. यह सब हम एक साल या उसके भी बाद ही जान सकेंगे.

 

चौंकाने वाले प्रावधान

 

कुछ दिनों पहले लोकसभा से पारित हुए जीएसटी बिल में 30 विधायी परिवर्तन किए गए हैं. सामान्य दिनों में ये सभी संसदीय प्रकिया के अनुसार एक अलग विधान के रूप में संसद में पेश किए गए होते. इसी तरह से जो जीएसटी बिल लोकसभा में पेश हुआ और जो छह माह पूर्व इससे प्रभावित होने वाले पक्षों में बांटा गया था उसमें काफी बड़े अंतर हैं.

1. कंपोजिशन स्कीम को पुनर्निर्धारित गया है. यह स्कीम छोटे कारोबारियों और जॉब वर्करों के लिए है. इसमें अब ऐसे मैन्युफैक्चरर्स जिनका टर्नओवर सालाना 50 लाख है उन पर 2.5 प्रतिशत और अन्य पर 1 प्रतिशत चार्ज के बजाय मैन्युफैक्चरर्स पर 1 प्रतिशत और भोजन और पानी आदि सप्लॉयर्स यानी रेस्टॉरेंन्ट्स पर 2.5 प्रतिशत शुल्क लगाया गया है. इसका आशय है कि शहरों के बड़े रेस्टॉरेंन्ट्स में खाना अब महंगा हो जाएगा.

2. बिल में लिया जाना वाला अधिकतम टैक्स रेट भी बदल दिया गया है. पहले यह सीजीएसटी में 14 प्रतिशत तय किया गया था, पर अब इसे बढ़ाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया है. सीधे शब्दों में यह कि जो अधिकतम दर अभी 28 प्रतिशत बताई जा रही थी वह अब सीजीएसटी और एसजीएसटी को मिलाकर अगर काउंसिल चाहे तो इससे भी अधिक यानी कुल 40 प्रतिशत कर सकती है.

3. चिंता का एक और क्षेत्र है कृषि क्षेत्र में किए गए कर प्रावधान. पहले मसौदे में कृषि से सभी प्रकार की आय टैक्स के दायरे से बाहर रखी गई थी. लेकिन अब लोकसभा में प्रस्तावित बिल में कहा गया है कि एक एग्रीकल्चेरिस्ट या किसान को तब तक जीएसटी में पंजीकृत कराने की जरूरत नहीं है जब तक कि वह खेती से उपज की आपूर्ति करता है.

 

यहां एग्रीकल्चेरिस्ट उस व्यक्ति या हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली को कहा गया है जो कि खुद या फिर परिवार और नौकर के सहयोग से खेती करता है. इसका मतलब है कि कांट्रैक्ट फार्मिंग यानी ठेके पर देने वाले किसानों को जीएसटी में रजिस्टर करना होगा, जब तक कि जीएसटी लागू होने के बाद इस संबंध में कोई छूट संबंधी नोटिफिकेशन जारी नहीं किया जाता है.

4. एक और प्रावधान जिसका मसौदा काफी मोटा-मोटी बनाया गया है, इसमें कहा गया है कि सेवाओं या वस्तुओं के ऐसे खरीदार से टैक्स लिया जाएगा जो अपना माल ऐसे डीलर से खरीदता हो जो कि पंजीकृत न हो. यह प्रावधान भी मूल ड्राफ्ट में शामिल नहीं था. इसका सीधा से आशय यह है कि अब खरीदार को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह ऐसे डीलर से अपना माल खरीदे जो कि जीएसटी के लिए पंजीकृत हो. वरना सरकार उससे रिवर्स टैक्स सिद्धांत के अंतर्गत कर चुकाने के लिए कह सकती है.

 

यह एक देश और एक टैक्स ढांचा नहीं

 

जैसे ही संसद से संवैधानिक संशोधन बिल पारित हुआ सोशल मीडिया पर इस तरह के संदेशों के भरमार शुरू हो गई कि प्रस्तावित जीएसटी देश में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने जा रहा है. यह संदेश दिया गया कि इसके बाद पूरे देश में एक ही टैक्स होगा.

पर यह सही नहीं है. अधिक से अधिक इतना होगा कि किसी एक कमोडिटी पर एक टैक्स होगा पर इससे अधिक कुछ नहीं. जीएसटी कर ढांचे में स्लैब रखे गए हैं — 0, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत दर रखी गई है वस्तुओं के लिए. जीएसटी काउंसिल ने अभी यह तय नहीं किया है कि सर्विसेज पर टैक्स की दर क्या होगी. इससे भी अधिक यह कि सोना—चांदी, जेम्स और ज्वैलरी पर एक विशेष टैक्स दर होगी, क्योंकि इस प्रकार की कमोडिटी की कीमत बहुत अधिक होती है. इससे भी अधिक यह कि राज्यों के राजस्व में कमी होने पर इसको फंड करने के लिए एक विशेष सेस का प्रावधान भी बिल में किया गया है. इसके लिए एक विशेष क्षतिपूर्ति बिल भी पेश किया गया है.

मसाला और तंबाकू उत्पादों के अलावा दो और आइटम्स जिन पर इस प्रकार के सेस लगाने की बात की जा रही है वह भी हमारी चिंता का विषय होना चाहिए- यात्री कारें तथा सभी प्रकार की वस्तुओं की आपूर्ति. इसका आशय यह है कि काउंसिल अगर चाहे तो इस सेस के दायरे में और भी वस्तुओं को ला सकती है.

 

टैक्स स्लैब्स


अभी हजारों उत्पाद और सैकड़ों प्रकार की सेवाएं हैं जिनको कि उपरोक्त बताई गई टैक्स दरों में सूचीबद्ध करना होगा. इसके लिए अप्रैल से इस पर काम शुरू होगा. प्रत्येक राज्य में ऐसे भी उत्पाद होंगे जिनको कि विशेष श्रेणी में रखे जाएगा. इसका आशय होगा कि या तो वे उत्पाद राज्य के आउटपुट का अहम हिस्सा हैं या फिर उनसे राज्य को बड़ा राजस्व मिलता है.


राज्यों और केंद्र सरकार के हितों को ध्यान में रखते हुए इन सभी आइटमों को टैक्स स्लैब्स में फिट करने के लिए विशेष प्रयासों की जरूरत होगी. अधिकारियों को इन दरों को तय करते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि इसका महंगाई और उपभोक्ता के हितों पर क्या असर होगा, क्योंकि अभी जिस उत्पाद पर 8 प्रतिशत टैक्स लग रहा है उसको आखिर 28 प्रतिशत के स्लैब्स में नहीं रखा जा सकता. अगर ऐसा होता है तो इस सबका दामों में बढ़ोतरी पर तेज असर होगा, जिसका उपभोक्ताओं पर भारी असर पढ़ना तय है.

First published: 1 April 2017, 9:33 IST
 
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