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'मेक इन इंडिया' में एचएमटी पिंजौर बंदी के कगार पर

राजीव खन्ना | Updated on: 1 April 2016, 7:21 IST
QUICK PILL
  • एचएमटी पिंजौर बंदी के कगार पर. कर्मचारियों को लंबे समय से तनख्वाह नहीं मिल रही है. कंपनी के पास अभी भी सौ करोड़ रुपये के आर्डर हैं. रोजगार और प्रशिक्षण में भी कंपनी की अहम भूमिका हो सकती है.
  • केंद्र सरकार ने \'मेक इन इंडिया\' और \'स्किल इंडिया\' का नारा दिया है लेकिन इस सरकारी कंपनी पर लटक रही बंदी की तलवार पर सरकार नहीं दे रही है ध्यान. केंद्र और राज्य की बीजेपी सरकारों से नाराज हैं कर्मचारी.

एक तरफ भारत सरकार 'मेक इन इंडिया' अभियान चला रही है तो दूसरी तरफ उसी की एक सरकारी कंपनी की एक इकाई अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. ये कंपनी है हिंदुस्तान मशीन टूल्स (एचएमटी). जिसके नाम से 1990 से पहले जन्मा शायद कोई भी भारतीय अपरिचित न हो.

हाल ही में एचएमटी के एक ज्वाइंट मैनेजर केएस नागी ने आत्महत्या कर ली. एचएमटी के पंचकुला के पिंजौर स्थित संयत्र में कार्यरत इस अधिकारी की मौत से कंपनी की बंदी से पैदा हुए गंभीर हालात का पता चला है. कंपनी के करीब 1500 कर्मचारी गंभीर आर्थिक संकट झेल रहे हैं. एक जमाना था कि इस संयंत्र में ट्रैक्टर समेत कई लोकप्रिय औजार बना करते थे.

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नागी की आत्महत्या के बाद कर्मचारी का विरोध तेज हो गया है. कर्मचारियों के नेता बनाते हैं कि कंपनी के ट्रैक्टर विभाग में 1150 लोग और मशीन टूल्स विभाग में 350 लोग काम करते हैं.

एचएमटी कर्मचारी संघ के अध्यक्ष महेंद्र सिंह कहते हैं, "मशीन टूल्स विभाग के कर्मचारियों को पिछले 11 महीने से और ट्रैक्टर टूल्स विभाग के कर्मचारियों को 20 महीने से तनख्वाह नहीं मिली है. कई लोगों की बीमारियों के कारण मौत हो  गयी क्योंकि वो इलाज का खर्च नहीं उठा सकते थे. नागी की आत्महत्या के बाद लोगों को कर्मचारियों की बदहाली पर ध्यान गया है."

एचएमटी का पिंजौर संयंत्र बंदी के कागार पर लेकिन केंद्र और राज्य सरकार नहीं दे रही है ध्यान

कर्मचारी कहते हैं कि एचएमटी के बेंगलुरु स्थित मुख्यालय से लेकर सरकार के स्तर तक किसी को उनकी परवाह नहीं है. जिसकी वजह से पिंजौर इकाई बंदी की तरफ बढ़ती जा रही है.

पिंजौर इकाई हिमालयन एक्सप्रेसवे के बगल में 867 एकड़ में फैली हुई है. इसकी स्थापना 1971 में तत्कालीन चेकोस्लाविया की मोटोकोफ़ कंपनी के साथ मिलकर की गयी थी.

कर्मचारियों के हितों की लड़ाई लड रहे शिवालिक मंच के अध्यक्ष विजय बंसल कहते हैं, "1990 के दशक से ही इस इकाई को कमतर दिखाने की कोशिश होती रही है. ये संयंत्र इस बात का सर्वोत्तम उदाहरण है कि किसी तरह सबसे कमाऊ यूनिट का इतना दोहन किया गया कि वो बंदी के कगार पर आ गयी."

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महेंद्र सिंह बताते हैं कि मुख्यालय ने एचएमटी की श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर और रानीबाग (उत्तराखंड) इकाई बंद कर दी है.

वो कहते हैं, "अब कंपनी इस इकाई को बंद करना चाहती है. जबकि दक्षिण में स्थित सभी इकाइयां आराम से चल रही हैं. इस इकाई को चलाने के लिए बुनियादी पूंजी भी नहीं दी जा रही है."

कर्मचारी कहते हैं कि कंपनी के दोनों विभागों की सभी मशीनों पूरी तरह काम कर रही हैं. जरूरत बस सरकार द्वारा पहल करनी की है जो वो नहीं कर रही है.

महेंद्र सिंह कहते हैं, "हमारे पास रेलवे और रक्षा से जुड़े निर्माण के ऑर्डर हैं. लेकिन वो निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाना चाहते हैं. एक बार ये इकाई बंद हो जाएगी तो निजी ट्रैक्टरों के दाम बढ़ जाएंगे."

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बंसल भी सिंह की बात से सहमत हैं. वो कहते हैं, "उनके पास 100 करोड़ रुपये का ऑर्डर हैं. अभी भी 1000 लोग हर साल प्रशिक्षित किए जाते हैं. क्या ये नरेंद्र मोदी के स्किल डेवलपमेंट के नारे के काबिल नहीं है? अगर इस इकाई को शुरू कर दिया जाए तो हजारों और लोगों को रोजगार मिल जाएगा."

उदारीकरण के बाद एचएमटी बाजार में निजी कंपनियों से पिछड़ता गया. खबरों के अनुसार जिस कंपनी में 1997-98 में 19,276 ट्रैक्टरों का उत्पादन होता था उसमें 2015-16 में महज 704 ट्रैक्टरों बने. यहां के कर्मचारी वो जमाना याद करते हैं जब पिंजौर में बने ट्रैक्टर पूरी दुनिया में निर्यात होते थे.

ऐसा कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार चाहती है कि राज्य सरकार एचएमटी की जमीन के बदले कर्मचारियों को लुभावना प्रस्ताव देकर उन्हें विदा कर दे. लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ प्रयास नहीं हुआ है.

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एचएमटी पिंजौर इकाई की 867 एकड़ जमीन पंजाब सरकार ने दी थी लेकिन अब इसका मालिकाना हक हरियाणा सरकार के पास है. एचएमटी ने इस जमीन पर मालिकाना हक का दावा किया है. जिसपर पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में सुनवायी चल रही है.

अक्टूबर 2013 में एचएमटी ट्रैक्टर को 1083 करोड़ रुपये दिए गए थे. इस पैसे का उपयोग मुख्यतः खाता-बही दुरुस्त करने के लिए हुआ. कर्मचारियों का दावा है कि साल 2000 में करीब 1100 कर्मचारियों के वीआरएस(स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) ले लेने के बाद तकनीकी रूप से कुशल कर्मचारियों की कमी हो गयी है.

एचएमटी के पास करीब 100 करोड़ रुपये के आर्डर हैं, कंपनी दे सकती है हजारों को रोजगार लेकिन सरकार कर रही है अनदेखी

कर्मचारियों का दावा है कि वो केंद्र सरकार के पास कई बार गुहार लगा चुके हैं. कर्मचारियों ने सरकार को ये भी बताया कि ट्रैक्टर विभाग का खर्च हर महीने आठ करोड़ बढ़ता जा रहा है. लेकिन अब कोई सुनवायी नहीं हुई है.

कांग्रेस नेता कुमारी शैलजा ने हाल ही में राज्य सभा में ये मुद्दा उठाया था. जवाब में भारी उद्योग मंत्री अनंत गीते ने कहा कि सरकार कर्मचारियों की शिकायतों से परिचित है और वो उन्हें 2007 की तनख्वाह के आधार पर वीआरएस देने के लिए तैयार है.

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बंसल कहते हैं, "हम वीआरएस के खिलाफ हैं क्योंकि इसका फायदा एक छोटे से वर्ग को मिलेगा जो रिटायरमेंट के करीब हैं. इस समस्या का हल वीआरएस नहीं है."

सीपीआई(एमएल) के नेता प्रेम सिंह अहलावत कहते हैं, "एचएमटी के कर्मचारियों के संग मोदी सरकार के बरताव से पता चलता है कि स्टार्ट अप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसे नारे महज जुमले हैं. ये कामगारविरोधी, जनविरोधी और गरीबविरोधी सरकार है. हम एचएमटी कर्मचारियों के संघर्ष में हम उनके साथ हैं."

कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी भी केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर कठघरे में खड़ा करती हैं. वो कहती हैं, "पहले से मौजूद संयंत्र को न चलाने से उनका मेक इन इंडिया नारा औंधे मुंह गिर चुका है."

महेंद्र सिंह कहते हैं कि कंपनी की दिक्कतें 1990 के दशक से भले ही शुरू हो गयीं हों केंद्र और राज्य में बीजेपी सरकार आने के बाद उसमें बहुत तेजी से गिरावट आयी है. वो कहते हैं, "ये महज संयोग नहीं कि इस पार्टी के सत्ता में आने के बाद से ही कर्मचारियों की तनख्वाह आनी बंद हो गयी."

कर्मचारी अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं. वो हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और उद्योग मंत्री कैप्टन अभिमन्यु का घेराव करने की सोच रहे हैं.

ऐसा लगता है कि इस संयंत्र को जिंदा रखने की लड़ायी लंबी चलने वाली है.

First published: 1 April 2016, 7:21 IST
 
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