Home » बिज़नेस » New Defense Procurement Policy 2016 Released
 

नई रक्षा खरीद नीति में कुछ नया नहीं

पिनाकी भट्टाचार्य | Updated on: 31 March 2016, 8:58 IST
QUICK PILL
  • रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने बहुप्रतीक्षित रक्षा खरीद नीति जारी कर दी है. नई नीति की घोषणा से सेनाओं के लिए साजो-समान की खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी.
  • रक्षा खरीद की नई नीति में भारतीय डिजाइन, डिवेलपमेंट और मैन्युफैक्चर्ड की कैटेगरी पेश की गई है जिससे स्थानीय रक्षा उद्योग को फायदा होगा.

लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार रक्षा मंत्रालय ने 2016 की रक्षा खरीद नीति की घोषणा कर दी है. शब्दों में यह बेशक लंबी और विस्तृत नीति है लेकिन राजनीतिक साहस और विचारों का इसमें घोर अभाव दिखता है.

रक्षा खरीद नीति में प्रावधानों का घोर अभाव है जो इस दस्तावेज का आधार होता है. इससे घरेलू रक्षा उद्योग और विदेशी वेंडरों को महत्वपूर्ण दिशानिर्देश दिए जाने थे जो कि इस दशक के दौरान 150 अरब डॉलर की राशि खर्च करने को तैयार हैं. इस रकम का इस्तेमाल भारतीय सैन्य बलों के आधुनिकीकरण में किया जाना है.

रक्षा खरीद नीति में सबसे बड़ा भ्रम प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी नीति मेक इन इंडिया को लेकर है. रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने नीति में बॉय इंडियन-इंडिजीनस डिजाइन, डिवेलपमेंट एंड मैन्युफैक्चर को शामिल किया है.

इस प्रावधान के तहत अगर किसी रक्षा उपकरण में लागत के लिहाज से 40 फीसदी स्वदेशी उपकरण हैं तो उसकी डिजाइनिंग और उत्पादन देश के भीतर ही किया जाएगा. हालांकि इसके साथ ही इसमें बॉय इंडियन कैटेगरी को शामिल किया गया है जिसके तहत 40 फीसदी स्वदेशी लागत वाले उपकरण को भारतीय वेंडर से ही खरीदा जाएगा.

कहा जा सकता है कि रक्षा मंत्रालय के लिए देश के भीतर डिजाइन और डिवेलप किए गए हथियारों को खरीदना उसकी प्राथमिकता नहीं है. मंत्रालय को भारतीय वेंडरों की डिजाइनिंग और डिवेलपमेंट पर उतना भरोसा नहीं है.

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो मेक इन इंडिया अभी भी जुमला ही बना हुआ है

बड़े सौदोें के लिए अभी भी बाहर की कंपनियों पर निर्भरता बनी हुई है और ऐसा होने की वजह से आर्म्स डीलर के लिए रक्षा सौदों में रास्ता बना रहेगा.

पर्रिकर के पास रक्षा एजेंसियों को वैध बनाने का मौका था लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाए. इसके पीछे जोे तर्क दिया गया है वह चौंकाने वाला है. मंत्रालय का कहना है कि दुनिया इस मोर्चे पर बेहद आगे निकल चुकी है. 

दुनिया में कहीं भी रक्षा एजेंसियों पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है क्योंकि सब जानते हैं कि वह हथियारों के सौदे के अहम हिस्से हैं और सौदों में उनकी भूमिका अहम होती है.

निश्चित तौर पर इन एजेंसियों की भूमिका पर्दे के पीछे की होती है. अगर इसे देश में कानून के दायरे में लाया जाता तो कई तरह की अनियमितताओं पर अंकुश लगाने में मदद मिलती.

First published: 31 March 2016, 8:58 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी