Home » बिज़नेस » New EPFO data show enrolment has been reduced by 12.58 per cent or 4.95 lakh to 34.40 lakh as against 39.35 lakh e
 

रोजगार को लेकर अब EPFO के आंकड़ों ने भी छोड़ा मोदी सरकार का साथ

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 July 2018, 11:18 IST

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के आंकड़ों के आधार पर हालही में कहा गया था कि मार्च तक सात महीनों में लगभग 39.36 लाख नए रोजगार का सृजन हुआ था लेकिन अब यह आंकड़े तेजी से नीचे आ रहे है. सरकार ने जो दावा किया था उसके हिसाब से सितम्बर 2017 और मार्च 2018 के बीच कर्मचारी भविष्य निधि में नामांकन की संख्या बेहद कम है. सितंबर 2017 और मार्च 2018 के बीच के प्रत्येक महीने नामांकन संख्याओं में संशोधन के बाद यह 6 प्रतिशत से 21 प्रतिशत कम हो गया हैं.

ये नए आंकड़े अब सरकार के सामने बड़ी मुश्किल पैदा पैदा कर रहे है. 25 मई को सरकार द्वारा जारी आंकड़ों में कहा गया था कि सितंबर 2017 और मार्च 2018 के बीच 39.9 5 लाख लोगों ने ईपीएफओ फंड में दाखिला लिया था. 25 जून को सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने इसी अवधि के लिए 34.40 लाख की संख्या दर्ज की है. सितंबर से मार्च तक प्रत्येक माह के लिए नामांकन आंकड़े 6% से 21% तक घटा दिए गए हैं.

इससे संकेत यह मिल रहे हैं कि ईपीएफओ नामांकन डेटा में बडी संख्या में गड़बड़ियां थी. अधिकारियों का कहना है कि एमएसपीआई ने ईपीएफओ को इस पर जवाब मांगा है. इस वर्ष जनवरी में एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया था कि 2017-18 में लगभग 70 लाख नौकरियां पैदा की गई हैं. आईआईएम बेंगलुरु के प्रोफेसर पुलक घोष और एसबीआई के मुख्य अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष ने इस अध्ययन में 70 लाख नौकरियां पैदा होने की बात कही थी.

हालांकि बाद में एक रिपोर्ट में यह बात सामने आयी थी कि यह अध्ययन नीति आयोग ने करवाया था. अध्ययन का नाम था टुवार्ड्स अ पेरोल रिपोर्टिंग इन इंडिया था. इस अध्ययन में कर्मचारी भविष्य निधि यानी ईपीएएफ के सदस्य आठ करोड़ खाताधारकों से जुड़ी जानकारियां जुटाने जुटाने की बात कही गई थी.

हालांकि इस तरह का डेटा सार्वजनिक नहीं किया गया था. 25 जून को रिलीज रिपोर्ट में एमओएसपीआई ने कहा कि अप्रैल में ईपीएफओ नामांकन संख्या 6.85 लाख थी, जो सितंबर 2017 के महीनों में सबसे ज्यादा थी. बदले गए नामांकन संख्याओं पर नज़र डालने से पता चलता है कि जनवरी को छोड़कर, प्रारंभिक और नवीनतम नामांकन संख्याओं के बीच का अंतर नवंबर में 7.88 प्रतिशत से बढ़कर दिसंबर में 13.33 प्रतिशत हो गया, जो फरवरी में 15.24 प्रतिशत तक पहुंच गया था और फिर मार्च में 21.5 9 प्रतिशत था.

ये भी पढ़ें : RBI की मंजूरी के बाद अब चाइनीज बैंकों का भारत में बढ़ेगा वर्चस्व !

First published: 6 July 2018, 11:06 IST
 
अगली कहानी