Home » बिज़नेस » New RBI governor's dilemma: to be or not to be a govt yes-man?
 

आरबीआई के नए गवर्नर की दुविधा!

नीरज ठाकुर | Updated on: 28 July 2016, 8:14 IST
QUICK PILL
  • रघुराम राजन विरोधी बेहद शिद्दत के साथ अगले गवर्नर के नाम की घोषणा किए जाने का इंतजार कर रहे हैं. नए गवर्नर से सरकार की उम्मीद के मुताबिक काम किए जाने की उम्मीद की जा रही है.
  • मौजूदा गवर्नर रघुराम राजन महंगाई की ऊंची दर के बीच ब्याज दरों में कटौती करने के पक्ष में नहीं रहे हैं. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले गवर्नर ब्याज दरों में कटौती करते है या नहीं.

रघुराम राजन विरोधी लॉबी शिद्दत के साथ अगले गवर्नर के नाम की घोषणा किए जाने का इंतजार कर रही है. नए गवर्नर से सरकार की उम्मीद के मुताबिक काम किए जाने की उम्मीद की जा रही है. माना जा रहा है कि वह महंगाई को नियंत्रित किए जाने के मामले में अपेक्षाकृत उदार रवैया अख्तियार करते हुए ब्याज दरों में कटौती करेंगे.

राजन का साफ कहना था कि महंगाई पर काबू पाए बिना रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती नहीं कर सकता. लेकिन अब राजन के साथ करीब दो सालों की खींचतान के बाद सरकार के लिए स्थिति माकूल होती नजर आ रही है. क्या यह संभव है कि नए गवर्नर सरकार के आदमी होंगे जो सरकार के मुताबिक काम करेंगे?

सुब्बाराव का समर्थन

आरबीआई की स्वायत्ताता को लेकर राजन को पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव का भी समर्थन मिला. हाल ही में सुब्बाराव की आत्मकथा 'हू मूव्ड माई इंटरेस्ट रेट्स?' बाजार में आई है. किताब में सुब्बाराव ने तत्कालीन दो वित्त मंत्रियों प्रणव मुखर्जी और पी चिदंबरम के साथ कड़वे संबंधों का जिक्र किया है. उनका कहना है कि यूपीए सरकार के दोनों ही वित्त मंत्री नहीं चाहते थे कि आरबीआई महंगाई नियंत्रण पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करे.

मिंट को 25 जुलाई को दिए गए इंटरव्यू में सुब्बाराव ने कहा, 'आरबीआई को अपनी स्वायत्ताता बनाए रखनी पड़ती है क्योंकि यह मौद्रिक और नियामकीय संबंधी नीतियों के लिए जरूरी है. आरबीआई को न केवल अपनी स्वायत्ता के लिए कोशिश करना चाहिए बल्कि यह दिखना भी चाहिए कि वह स्वयात्ताता को लेकर गंभीर है.'

पिछले एक महीने के दौरान राजन ने महंगाई को नियंत्रित किए जाने के फायदे को लेकर कई बयान दिए हैं. राजन की तरह की सुब्बाराव को दूसरा कार्यकाल नहीं मिला. उस वक्त राजन वित्त मंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार के तौर पर काम कर रहे थे.

राजन ने अपने कार्यकाल के दौरान थोक मूल्य सूचकांक से ध्यान हटाकर खुदरा महंगाई दर पर ध्यान केंद्रित किया.

नए गवर्नर की मुश्किलें

ऐसा माना जाता है कि सीपीआई की मदद से ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में लोगों पर महंगाई का क्या असर पड़ रहा है. जून 2016 में सीपीआई महंगाई दर 22 महीने के उच्चतम स्तर 5.77 फीसदी तक जा पहुंची. सरकार को उम्मीद थी कि बेहतर मानसून से सब्जियों की कीमतों में कमी आएगी लेकिन इस बात की संभावना बन रही है कि आने वाले महीनों में सीपीआई महंगाई दर अधिक ही रहेगी.

2010 में भी ऐसा ही हुआ था जब खाद्य महंगाई दर बेहतर मानसून के बाद कम नहीं हुई थी. ऐसे में आरबीआई के नए गवर्नर क्या करेंगे? क्या वह केवल वित्त मंत्री की मर्जी के मुताबिक काम कर अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाएंगे?

ऐसा संभव है कि अगर सरकार किसी साधारण इच्छाशक्ति के व्यक्ति को आरबीआई का गवर्नर बना दे. लेकिन पारंपरिक तौर पर आरबीआई में बड़े अर्थशास्त्री होते हैं जिनका वैश्विक अनुभव होता है. उनकी छवि हां में हां मिलाने वाले व्यक्ति की नहीं होती है.

इसलिए इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सरकार क्या फैसला लेती है. इस पूरी प्रक्रिया में कुछ न कुछ दांव पर लगेगा.

First published: 28 July 2016, 8:14 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी