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1 अरब डॉलर का निवेश करें और 10 साल तक टैक्स से मुक्त रहें

नीरज ठाकुर | Updated on: 7 June 2016, 23:18 IST
(कैच हिंदी)
QUICK PILL
  • नीति आयोग ने भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 1 अरब डॉलर या उससे अधिक का निवेश करने वाली कंपनियों को 10 सालों के लिए कर में छूट देने का प्रस्ताव रखा है.
  • भारत ने सात सालों तेल सेक्टर को कर छूट दे रखा है लेकिन आज भी भारत इस क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने में विफल रहा है. भारत अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80 फीसदी हिस्सा आयात करता है.

नीति आयोग ने भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 1 अरब डॉलर या उससे अधिक का निवेश करने वाली कंपनियों को 10 सालों के लिए कर में छूट देने का प्रस्ताव रखा है. प्रस्ताव की मदद से सैमसंग, शाओमी, एप्पल और हिताची जैसी कंपनियों को भारत में अपना प्लांट लगाने के लिए आकर्षित करना है.

भारत अपनी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं की कुल जरूरतों का करीब 65 फीसदी हिस्सा आयात करता है. देश के कुल व्यापार घाटे में इस सेक्टर की हिस्सेदारी करीब 27 फीसदी है. पेट्रोलियम उत्पाद के बाद इलेक्ट्रॉनिक्स प्रॉडक्ट्स देश के आयात का दूसरा बड़ा हिस्सा है. माना जा रहा है कि 2020 तक भारत का आयात बिल इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों के आयात पर होने वाले खर्च से आगे निकल जाएगा.

ईवाई की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2015 में वैश्विक तौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री में 1.8 ट्रिलियन डॉलर का कारोबार हुआ और इसमें भारत की हिस्सेदारी 12.5 अरब डॉलर रही. 2020 में यह आंकड़ा बढ़कर 40 अरब डॉलर होने की है. इसमें भारत के स्थानीय उत्पादन की हिस्सेदारी 10.4 अरब डॉलर रही.

ऐसे में यहां सवाल पैदा होता है कि क्या कर में छूट देकर विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश करने के लिए आकर्षित किया जा सकता है?

क्या है समस्या?

अधिकांश विकासशील देश निवेश आक र्षित करने के लिए कर में छूट देते हैं लेकिन हर देश को इसके बावजूद निवेश नहीं मिलता है.

मसलन भारत ने सात सालों तेल सेक्टर को कर छूट दे रखा है लेकिन आज भी भारत इस क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने में विफल रहा है. भारत अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80 फीसदी हिस्सा आयात करता है.

कर छूट की अवधि खत्म होने के बाद कंपनियां कर छूट की अवधि में बढ़ोतरी के लिए दबाव बनाने लगती हैं

दूसरी समस्या है कि जब कोई कंपनी कर छूट का लाभ उठाती है तो फिर वह उसी समय तक काम करती है, जब तक उसे कर में छूट का फायदा मिल रहा होता है. कर छूट की अवधि खत्म होने के बाद कंपनियां कर छूट की अवधि में बढ़ोतरी के लिए दबाव बनाने लगती हैं.

सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स इसकी बेहतरीन मिसाल है. इस कंपनी को 2011 तक कर में छूट मिली. लेकिन जब सरकार ने कर छूट हटाए जाने की बात की तब कई कंपनियों ने एसटीपी से अपने ऑफिस को बाहर करने का फैसला किया.

नहीं मिला फायदा

2012 में सरकार ने एम-एसआईपीएस के नाम से योेजना शुरू की. इस योजना के तहत भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में काम करने वाली कंपनियों को कुछ छूट दिए जाने का प्रावधान था.

योजना के तहत जो कंपनियां विशेष आर्थिक क्षेत्र में पैसा लगाती, उन्हें पूंजीगत खर्च पर 20 फीसदी छूट दी जाती और जो कंपनियां इसके बाहर काम करती उन्हें 25 फीसदी छूट दिए जाने का प्रावधान था.

इन भारी भरकम छूट के बाद भी भारत में उम्मीद के मुताबिक निवेश नहीं आ पाया. वित्त मंत्रालय के पूर्व मुख्य  सलाहकार अशोक देसाई कई समस्याओं के बावजूद कर छूट पर जोर देते हैं. हालांकि वह निवेश के आकार पर किसी तरह के भेदभाव नहीं किए जाने की भी बात करते हैं.

देसाई ने कहा, 'उद्योग को आकर्षित करने के लिए कर में छूट बेहद जरूरी है लेकिन यह केवल बड़ी कंपनियों को ही नहीं दिया जाना चाहिए. 1 अरब डॉलर की सीमा से छोटी और बड़ी कंपनियों के बीच फर्क पैदा होता है और इससे सेक्टर के लिए समस्या पैदा होती है.'

देसाई की चिंताएं, ईवाई की रिपोर्ट में भी जाहिर होतीी है. रिपोर्ट बताती है, 'एसी को बनाना भारत में चुनौती भरा काम है क्योंकि यहां पर कोई कंप्रेशर बनाने वाली कंपनी नहीं है. इसका 65-75 फीसदी हिस्सा बाहर से मंगाया जाता है. यही बात टीवी के लिए भी है जिसका अधिकांश भाग बाहर से मंगाया जाता है.'

देसाई बताते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग के ईको सिस्टम बनाया जाना जरूरी है ताकि सभी कंपनियों को निवेश के लिए आकर्षित किया जा सके. केवल बड़ी कंपनियों का आना जरूरी नहीं है क्योंकि उन्हें कई कंपोनेंट छोटी कंपनियों से खरीदने होते हैं.

मौजूदा कंपनियों को घाटा

कर में छूट से मौजूदा कंपनियों को घाटा उठाना पड़ता है. एक कंज्यूमर ड्यूरेबल कंपनी के अधिकारी ने नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर बताया, 'कर छूट में केवल बड़ी कंपनियों को छूूट नहीं मिलनी चाहिए. अगर मेरी कंपनी बड़ा निवेश कर चुकी है और अगले कुछ सालों में अगर हमारी कंपनी की 1 अरब डॉलर की निवेश की योजना नहीं है तो हमारा उत्पाद महंगा नहीं होना चाहिए. सरकार को हमारी मांग पर विचार करना चाहिए.'

कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स का बड़ा बाजार है और स्थानीय उत्पादन मेक इन इंडिया मिशन के लिए जरूरी है. लेकिन कर छूट के पिछले अनुभव को देखते हुए सरकार को यह सोचना चाहिए कि इसे तरीके से लागू किया जाए और यह हर लिहाज से मेक इन इंडिया के लक्ष्य के मुताबिक हो.

First published: 7 June 2016, 23:18 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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