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भारत ही नहीं दुनिया भर के देश में कर रहे हैं जीडीपी आंकड़ों में हेरफेर

नीरज ठाकुर | Updated on: 15 July 2016, 8:47 IST
QUICK PILL
  • भारत के जीडीपी आंकड़ों के बारे में कहा जा रहा है कि उसे बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है. चीन पर पिछले कई सालों से जीडीपी आंकड़ों की हेराफेरी करने का आरोप लगता रहा है.
  • अफ्रीकी महाद्वीप में नाइजीरिया ने 2014 में अपनी अर्थव्यवस्था के आकार को 89 फीसदी बढ़ाकर दुनिया को सन्न कर दिया था. नाइजीरिया ने अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाकर अफ्रीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा किया था. 
  • केन्या ने 2014 में अपनी अर्थव्यवस्था के आकार में 25.3 फीसदी की बढ़ोतरी की थी. केन्या ने जीडीपी के गणना वर्ष को बदल कर यह काम किया था.

क्या जीडीपी ग्रोथ रेट वाकई में मायने रखती है? भारत के जीडीपी आंकड़ों के बारे में कहा जा रहा है कि उसे बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है. चीन पर पिछले कई सालों से जीडीपी आंकड़ों की हेराफेरी करने का आरोप लगता रहा है.

अफ्रीकी महाद्वीप में नाइजीरिया ने 2014 में अपनी अर्थव्यवस्था के आकार को 89 फीसदी बढ़ाकर दुनिया को सन्न कर दिया था. नाइजीरिया ने अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाकर अफ्रीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा किया था. 

केन्या ने 2014 में अपनी अर्थव्यवस्था के आकार में 25.3 फीसदी की बढ़ोतरी की थी. केन्या ने जीडीपी के गणना वर्ष को बदल कर यह काम किया था. ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या जीडीपी को बढ़ा देने से किसी देश को मदद मिलती है? क्या बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए आंकड़ों की मदद से निवेशकों को बेवकूफ बनाया जा सकता है.

देशों के जीडीपी आंकड़ों को बढ़ाने के लिए दोषी नहीं दिया जा सकता. ऐसा इसलिए क्योंकि यूनाइटेड नेशंस स्टैटिसटिकल कमीशन (यूएनएससी) देशों को पांच साल पर अपने जीडीपी के आधार वर्ष में संशोधन की बात कहता है. 

हालांकि यह भी सच है कि देश इसमें संशोधन करने के दौरान अक्सर नए तरीकों का इस्तेमाल करते हुए अर्थव्यवस्था के आकार को बढ़ा देते हैं.

ग्रोथ के आंकड़े

मसलन 2015 में जब भारत ने आधार वर्ष को 2004-05 से बदलकर 2011-12 किया तब 2013-14 के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट 4.7 फीसदी से बढ़कर 6.9 फीसदी हो गई.

इन्हीं बदले आधार वर्ष पर 2015-16 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.6 फीसदी रही है. हालांकि अर्थशास्त्री इन आंकड़ों को पचा नहीं पा रहे हैं.

अमेरिकी विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी रिपोर्ट में कहा गया है, 'भारत दुनिया में सबसे तेेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है. लेकिन निवेशकों का खराब रुझान यह बताता है कि यह करीब 7.5 फीसदी की ग्रोथ रेट अधिक कर दिखाई गई है.'

सवाल में वृद्धि दर

अमेरिकी आपत्ति से पहले कई अर्थशास्त्री इन आंकड़ों को चुनौती दे चुके हैं. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च मुंबई में इकनॉमिक्स के प्रोफेसर आर नागराज लगातार कॉरपोरेट डेटा पर सवाल उठाते रहे हैं जिसके आधार पर देश में मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ की गणना की जाती है.

नागराज बताते हैं कि मैक्रो और माइक्रो संकेतक मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ के मुताबिक नहीं हैं.  वित्त वर्ष 2016 की चौथी तिमाही में अनुमान था कि भारत की अर्थव्यवस्था 7.9 फीसदी की दर से आगे बढ़ेगी. हालांकि यह ग्रोथ बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया. जीडीपी आंकड़ों में आई खामी 1.43 लाख करोड़ रुपये के बराबर थी जो पिछले साल की समान अवधि में 29,333 करोड़ रुपये थी.

सालाना आधार पर यह वृद्धि 1.13 लाख करोड़ रुपये की थी. यह प्राइवेट फाइनल कंजम्प्शन एक्सपेंडीचर के मुकाबले महज 14 हजार करोड़ रुपये कम है.

क्यों देश संशोधित कर रहे हैं जीडीपी आंकड़ें?

वैश्विक स्तर पर लगातार बढ़ रही प्रतिस्पर्धा की वजह से देशों के बीच अधिक से अधिक निवेश आकर्षित करने की हड़बड़ी लगी रहती है. यही वजह है कि देश अपनी जीडीपी को बढ़ाकर दिखाते हैं. तो क्या जीडीपी आंकड़े बढ़ाकर निवेशकों को धोखा दिया जा सकता है?

नाइजीरिया का मिसाल लेते हैं. इसने 2014 में अपनी जीडीपी को 89 फीसदी तक बढ़ा दिया.  ग्लोबल इनवेस्टमेंट ट्रेंड्स मॉनिटर ऑफ यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डिवेलपमेेंट (अंकटाड) की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में नाइजीरिया के एफडीआई में 27 फीसदी की गिरावट आई.

नाइजीरिया को हाल ही में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का सामना करना पड़ रहा है. वैश्विक निवेशकों ने अफ्रीकी देशों में निवेश से हाथ पीछे खींच लिया है. अब निवेशकों को अफ्रीका की सबसे बड़ी या छोटी अर्थव्यवस्था से फर्क नहीं पड़ रहा है.

जहां तक भारत की बात है तो यहां मामला अलग है. अर्थव्यवस्था के आकार को देखते हुए निवेशक भारत में लगातार पैसा लगा रहे हैं. भारत को 2015 में सबसे अधिक एफडीआई निवेश मिला.

वैश्विक निवेशकों की जांच

तो क्या भारत ग्रोथ डेटा पर उठ रही आपत्तियोें के बावजूद निवेशकों की परख से बच सकता है?

वैश्विक अनुभव के आधार पर इसका जवाब नहीं है. 2015 में भारत में सबसे अधिक एफडीआई निवेश आने की वजह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मिला समर्थन रहा. आईएमएफ चीफ क्रिस्टिन लेगार्ड ने भारत को एफडीआई के लिए सबसे मुफीद बताया.

हालांकि अब अमेरिकी विदेश मंत्रालय भारत के ग्रोथ संबंधी आंकड़ों पर सवाल उठा रहा है. इसका असर अमेरिकी निवेशकों पर हो सकताा है. वास्तव में यह भारत में होने वाले निवेश को प्रभावित कर सकता है.

लंबे समय में दुनिया को जीडीपी आकलन का एक मानक तरीका निकालना चाहिए. यह वैश्विक निवेशकों के लिए दिशानिर्देश की तरह काम करेगा. तब तक के लिए निवेशकों को अपनी समझ के लिहाज से किसी देश के आर्थिक परिदृश्य के बारे में अपनी राय कायम करनी होगी.

First published: 15 July 2016, 8:47 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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