Home » बिज़नेस » Catch Hindi: pharma companies are doing million dollar business in tribal states
 

छत्तीसगढ़ः सस्ती दवाओं का वादा हवाई, बड़ी कंपनियों की बड़ी कमाई

शिरीष खरे | Updated on: 24 April 2016, 18:55 IST

छत्तीसगढ़ जैसे छोटे, आदिवासी राज्य में 40 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, बावजूद इसके दवा कंपनियों का कारोबार खूब फल-फूल रहा है. यहां दवा बनाने वाली 12 कंपनियां और 6 हजार से ज्यादा प्राइवेट मेडिकल स्टोर हैं.

ब्रांडेड कंपनियों के लिए यह राज्य मुनाफे का बड़ा बाजार बन गया है जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां दवाइयों का सालाना कारोबार तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है.

पढ़ेंः 33 करोड़ से ज्यादा लोग सूखे के शिकार फिर भी राष्ट्रीय आपदा नहीं

यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि करीब ढाई करोड़ की आबादी वाले इस राज्य में महंगी दवाओं का दाम आम आदमी के मर्ज पर भारी पड़ता जा रहा है. यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में ठीक तीन साल पहले महंगी दवाओं से छुटकारा दिलाने के लिए राज्य सरकार ने नि:शुल्क दवा योजना लागू की थी.

छत्तीसगढ़ः 40 % जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे फिर भी दवा कंपनियों की है चांदी

मगर नि:शुल्क उपचार के तौर पर पहचान बनाने वाली जेनरिक दवाइयां बाजार में अपनी जगह नहीं बना पाई हैं. यहां तक कि सरकारी अस्पतालों और रेडक्रास की दुकानों से भी यह गायब हैं. गरियाबंद, बलौदाबाजार, महासमुंद, सूरजपुर, बलरामपुर और कांकेर जिलों में रेडक्रास की दुकानें नहीं हैं.

राज्य में महंगी दवाइयों से छुटकारा दिलाने के लिए चंद जगहों पर जन औषधि स्टोर खोले गए हैं. इसका सालाना बजट ही महज 65 करोड़ रुपये रखा है. इसलिए प्राइवेट मेडिकल दुकानों से न्यूनतम बीस गुना ज्यादा मूल्य पर मरीजों को ब्रांडेड दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं.

पढ़ेंः आईपीएल के बाद अब शराब उद्योग पर 'जल संकट'

यह पूरी योजना सरकारी उपेक्षा, भांति-भांति की भ्रांतियां और मेडिकल माफिया के सांठगांठ की भेंट चढ़ गई है. यही वजह है कि इस छोटे से राज्य में भी दवा कंपनियां दो जून की रोटी के लिए जूझ रहे लाखों आदिवासी परिवारों की जेब महंगी दवाओं के नाम पर काटने में कामयाब हो रही हैं.

राजधानी रायपुर के जिला अस्पताल की नि:शुल्क जेनरिक दवा की एकल खिड़की के आगे अपना नंबर आने की बाट जोह रहे गणेश यादव को डेढ़ घंटे कतार में खड़े रहने के बावजूद पेट की दवाइयां तो मिलीं, लेकिन पांच में सिर्फ तीन. इसके अलावा यहां प्रसव और मानसिक रोग सहित कई अनिवार्य दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं. कहने को खिड़की के बाजू की दीवार पर 42 प्रकार की दवाइयां लिखी हैं, लेकिन मेडिकल स्टोर में गिनी-चुनी ही दवाइयां ही हैं.

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अधीन कार्य करने वाले छत्तीसगढ़ राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र की सर्वे ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बीते साल बिलासपुर जिला अस्पताल में सबसे अधिक 49.61 प्रतिशत दवाइयां मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ीं.

पढ़ेंः कोहिनूर क्या लाएंगे, जो है उसी को बचाने में अक्षम है भारतीय कानून

सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों द्वारा जेनरिक दवाइयां नहीं लिखी जा रही हैं. सर्वे के मुताबिक डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाइयों में 34 प्रतिशत ब्रांडेड होती हैं. राजधानी रायपुर में 36 और बस्तर में 40 प्रतिशत ब्रांडेड दवाइयां सरकारी डॉक्टर लिखते हैं.

छत्तीसगढ़ः ढाई करोड़ आबादी, दवा कंपनियों का सालाना कारोबार तीन हजार करोड़ रुपये

वहीं, छत्तीसगढ़ मेडीकल सर्विस कार्पोरेशन के वेयर-हाउसों में लगभग 700 में से महज 303 तरह की जेनरिक दवाइयां हैं. जाहिर है कि जेनरिक दवाइयों की भारी कमी के चलते ब्रांडेड दवा कंपनियों का कारोबार बढ़ता जा रहा है.

छत्तीसगढ़ राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र के पूर्व अध्यक्ष डॉ. वीआर रमन का कहना है, "छत्तीसगढ़ मेडीकल सर्विस कारर्पोरेशन निचले स्तर पर तरीके से काम नहीं कर पा रहा है. यह दवाइयों की अचानक मांग आने पर समयसीमा में उन्हें मुहैया नहीं करा पाता. ऐसी हालत में जिला अधिकारी अपने स्तर पर दवाइयां खरीदते हैं, लेकिन उनके पास दवा खरीद की कुशलता और क्षमता नहीं होती. इससे दवाइयों की गुणवत्ता प्रभावित होती है."

पढ़ेंः यूपी की राजनीति का नया फैक्टर है 'महिला'

राष्ट्रीय जन स्वास्थ अभियान कार्यकर्ता डॉ. नरेन्द्र गुप्ता के मुताबिक, "दवा खरीद के लिए राज्य का सालाना बजट बहुत ज्यादा नहीं है. फिर यहां राजस्थान की तर्ज पर टेंडर, वर्क आर्डर, आपूर्ति और गुणवत्ता से लेकर भंडारण की दैनिक स्थितियां जानने का इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम भी नहीं है. कुल मिलाकर, नि:शुल्क दवा वितरण की पूरी व्यवस्था अव्यवस्थित है."

दूसरी तरफ, दवा बाजार में मामूली बीमारियों की दवाइयां अपनी मूल कीमतों से कई गुना महंगी होने से मरीजों की मुसीबत हो गई है. एक दवा विक्रेता के मुताबिक दवाइयों के दाम इसलिए आसमान छूते हैं कि एक करोड़ रूपये की दवा के मुनाफे पर करीब 70 लाख रूपये दवा कंपनी, डॉक्टरों, बिचौलियों और नीति निर्धारकों के बीच कमीशन के तौर पर बांटा जाता है. इसलिए दवा की कीमत को 70 प्रतिशत तक बढ़ाकर बेचा जा रहा है.

पढ़ेंः पीएम बनने के चक्कर में नीतीश की सीएम की कुर्सी न खिसक जाए

इस मामले में प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर का कहना है, "जेनरिक दवाइयों का वितरण सरकारी अस्पतालों के जरिए किया जा रहा है. इसका वितरण किन्हीं स्थानों पर यदि अच्छी तरह से नहीं हो रहा है तो इसमें सुधार लाया जा सकता है. मगर प्राइवेट क्षेत्र के लोग यदि महंगी दवाइयां बेच रहे हैं तो इस प्रक्रिया को रोकना किसी सरकार के लिए आसान काम नहीं है."

स्वास्थ्य क्षेत्र की सामाजिक कार्यकर्ता सुलक्षना नंदी के मुताबिक, "राज्य में सांप, कुत्ता, बंदर काटने से लेकर प्रसव संबंधी दवाइयों का अकाल है. वहीं, विभिन्न रोगों के मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है, अब यह राज्य सरकार पर निर्भर है कि दवाइयों की किल्लत नहीं होने दे. मगर पब्लिक हेल्थ रिर्सोस नेटवर्क की रिपोर्ट बताती है कि यहां सरकारी अस्पतालों में प्रसव के दौरान 27 प्रतिशत महिलाओं को दवाइयों पर अलग से खर्च करना पड़ रहा है."

जाहिर है राज्य में नामी ब्रांड की महंगी दवाइयां खरीदने से गरीबों पर गरीबी और ज्यादा हावी हो रही है.

First published: 24 April 2016, 18:55 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

पिछली कहानी
अगली कहानी