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अंतिम मुकाम पर राफेल सौदा: 58.6 हजार करोड़ में बात पक्की

सुहास मुंशी | Updated on: 18 April 2016, 22:57 IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने फ्रांस दौरे के दौरान वहां की सरकार से 36 राफेल विमान खरीदने का वादा किया था. अब लगभग एक साल बाद भारत के सबसे महंगे लड़ाकू विमान सौदे को दोनों देश अंतिम रूप दे चुके हैं.

सूत्रों के मुताबिक विमान सौदे पर इसी माह के अंत तक हस्ताक्षर हो जाने की संभावना है. रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार भारत 36 लड़ाकू विमानों की कीमत 65,000 करोड़ रुपए या 12 अरब डॉलर से कम करवा कर 60,000 करोड़ यानी नौ अरब डॉलर तक लाने में कामयाब रहा है. हालांकि अंतिम कीमत इससे भी थोड़ी कम यानि 58,653 करोड़ रुपए यानी लगभग 8.8 अरब डॉलर रहने की संभावना है.

राफेल की अंतिम कीमत 58,653 करोड़ रुपए यानी लगभग 8.8 अरब डॉलर रहने की संभावना है.

पिछले साल अप्रैल में अपने पेरिस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने विमान सौदे की बातचीत दोबारा शुरू करने का वादा किया था जो 2014 में बीच में ही रुक गई थी. विमान सौदे के करार में बदलने की उम्मीदें इस साल जनवरी में उस समय प्रबल हो गईं थीं जब फ्रांस के राष्ट्रपति ने गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की.

लेकिन कथित तौर पर दोनों देशों में प्रत्येक विमान की कीमत को लेकर मतभेद पैदा हो गए थे. पिछले कुछ महीनों से ये अफवाहें भी चल रही थीं कि सौदा पूरी तरह से रद्द होने वाला है.

हालांकि रक्षा मंत्री दोनों देशों की समझौता कराने की प्रतिबद्धता दोहराते रहे, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जिस गति से बात आगे बढ़ रही थी, वह 'पर्याप्त नहीं थी'. अब लगता है कि दोनों पक्षों ने इस सप्ताह बातचीत में बड़ी सफलता हासिल कर ली है.

भारत के लिए अत्याधुनिक लड़ाकू विमान खरीदने का करार बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि वायुसेना के लड़ाकू स्क्वाड्रनों का बेड़ा पुराना हो चला है. इसके कारण उपमहाद्वीप में भारत का प्रभुत्व तेजी से घट रहा है.

भारतीय वायुसेना को कम से कम 44 स्क्वाड्रनों की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान में इसके पास सिर्फ 32 स्क्वाड्रन सक्रिय हालत में हैं. इनमें से भी 14 स्क्वाड्रन चलन से बाहर हो चुके मिग-21 और मिग-27 के भरोसे हैं, जिन्हें अगले साल से रिटायर करना ही होगा.

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कुछ अन्य स्क्वाड्रन मिराज-2000 और जगुआर की हैं. उन्हें अपग्रेड किया जा रहा है, इसलिए वे भी सेवा से बाहर हैं.

इसी समय भारत के पड़ोसी चीन और पाकिस्तान भी अपनी वायुसेना के आधुनिकीकरण पर काम कर रहे हैं.

हथियारों संबंधी प्रतिबंधों के कारण चीन रक्षा के क्षेत्र में पश्चिमी देशों के साथ हाथ नहीं मिला सकता. इसी कारण वह आधुनिक लड़ाकू जेट विकसित करने के लिए रूस के साथ काम कर रहा है. जेएफ-17 इसी का नतीजा हैं और कई अन्य परियोजनाएं पाइपलाइन में हैं.

भारतीय वायुसेना को कम से कम 44 स्क्वाड्रनों की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान में इसके पास सिर्फ 32 स्क्वाड्रन हैं

दूसरी ओर, पाकिस्तान अमेरिका की मदद से अपनी वायुसेना का आधुनिकीकरण कर रहा है. अस्थायी रूप से रोकी गई एफ-16 विमानों की बिक्री प्रक्रिया कथित तौर पर फिर शुरू कर दी गई है.

भारतीय वायुसेना उपमहाद्वीप में अपनी हवाई श्रेष्ठता बनाये रखने के लिए तुरन्त बेहतरीन उपलब्ध लड़ाकू जेट विमानों से दो स्क्वाड्रन बनाने की तैयारी कर रही है, जिसमे 36 राफेल को शामिल किया जायेगा.

इस पूरी डील की शुरुआत 2012 में उस समय हुई थी जब भारत ने फ्रांस से 126 आधुनिक लड़ाकू जेट राफेल 12 अरब डॉलर में खरीदने का आदेश दिया था.

इस बेहद बड़े रक्षा सौदे का करार हासिल करने के लिए दुनिया भर के सबसे बड़े लड़ाकू जेट विमान निर्माता लाइन लगाकर खड़े थे

इस बेहद बड़े रक्षा सौदे का करार हासिल करने के लिए दुनिया भर के सबसे बड़े लड़ाकू जेट विमान निर्माता लाइन लगाकर खड़े थे. इनमें एफ़/ए-18 सुपर होर्नेट के साथ अमेरिकियों से लेकर, मिग-35 के साथ रूस, यूरोफाइटर टाइफून्स के साथ ब्रिटेन और साब ग्रिपेन्स के साथ स्वीडन तक शामिल थे.

हार्डवेयर के अधिग्रहण में तेजी लाने के लिए इस बात पर सहमति बनी कि राफेल का सौदा अब सीधे दोनों देशों की सरकारों के बीच होगा.

हालांकि 126 विमानों को खरीदने की बातचीत उस समय बीच में ही टूट गई जब इनकी कुल लागत 22 अरब डॉलर तक जा पहुंची. इसके बाद भारत ने उड़ने को तैयार 36 राफेल खरीदने का नया आदेश जारी कर दिया.

अब तक कई लोग राफेल की आसमान छूती कीमत के बाद भी इस सौदे से चिपके रहने की वजह और इसकी व्यवहार्यता पर सवाल उठाने लगे थे. उन्होंने नई डील के लिए कहना शुरू कर दिया कि यह तो 'अनियोजित बच्चे' जैसा है.

भले इसकी कीमत बहुत अधिक चुकानी पड़ रही है, इसके बावजूद इस सौदे के अंजाम तक पहुंचने से भारतीय पक्ष बहुत खुश होगा, क्योंकि यही वह विमान है जो भारतीय वायुसेना की सभी जरूरतों को पूरा कर सकता है.

यदि भारत अगले कुछ हफ़्तों में इस समझौते पर दस्तखत कर देता है तो उम्मीद की जा सकती है कि 2017 के अंत तक कुछ विमान तो आ ही जाएंगे.

First published: 18 April 2016, 22:57 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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