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अंतिम मौद्रिक नीति की घोषणा में भी अपने विचारों पर कायम रहे राजन

नीरज ठाकुर | Updated on: 10 August 2016, 7:41 IST

रिजर्व बैंक के गवर्नर पद पर रहते हुए मौद्रिक नीति की अंतिम समीक्षा में भी कोई परिवर्तन न करते हुए रघुराम राजन ने उद्योग जगत और वित मंत्री दोनों को खाली हाथ छोड़ दिया.

रेपो दर (जिस दर पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को ऋण उपलब्ध करवाता है) 6.5 प्रतिशत ही रखी गई, जो पहले भी इतनी ही थी. बहुत कम लोगों को इस बात की उम्मीद थी कि राजन ब्याज दरों में कोई कटौती करेंगे, क्योंकि देश में खुदरा महंगाई दर फिलहाल 5 प्रतिशत से ऊपर चल रही है और यही हाल रहा तो नए सरकारी आंकड़ों में यह 6 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है. इसी प्रकार नकद जमा अनुपात (जमा में रखा जाने वाला नकद) में भी कोई परिवर्तन नहीं किया गया और यह 4 प्रतिशत बना हुआ है.

मौद्रिक नीति समीक्षा के प्रमुख के तौर पर दिए गए अपने अंतिम संदेश में राजन ने बाकी बचे वित्त वर्ष में मुद्रास्फीति की दर 5 प्रतिशत से भी अधिक होने की आशंका जताई. साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि इसे कम करने के लिए नए गवर्नर को दरों में कटौती और मुद्रास्फीति प्रबंधन के बीच पर्याप्त संतुलन रखना होगा.

ऊंची ब्याज दर वाला कार्यकाल

राजन का कार्यकाल इस मायने में याद रखा जाएगा कि उन्होंने देश में खुदरा बाजार में महंगाई दर काबू में रखने पर विशेष ध्यान दिया ताकि अर्थव्यवस्था में स्थाई वृद्धि हो सके. हालांकि उनके ऊपर सरकार की ओर से दरें कम करने का भारी दबाव था, क्योंकि एनडीए सरकार में उनके कई आलोचकों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की गति धीमी करने के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर राजन की आलोचना की थी.

हालांकि जिन लोगों ने ब्याज दर कम न करने के लिए राजन की आलोचना की थी, वे इस बात का जवाब नहीं दे पाए कि वाणिज्यिक बैंकों ने दरों में 1.5 प्रतिशत की कटौती क्यों नहीं की, जिसकी घोषणा राजन दो साल पहले ही कर चुके हैं.

पूर्व में राजन ने यह भी बताया था कि कुछ बैंक उद्योगों को ऋण देने के लिए अपनी पूंजी को जोखिम में नहीं डालना चाहते, वह भी उस समय जब गैर निष्पादित संपत्तियों की वजह से उनकी बैलेंस शीट खराब हो रही थी. इसी का नतीजा था कि ब्याज दरें बढ़ा दी गईं.

यहां तक कि नौ अगस्त 2016 को भी राजन ने बैंकों द्वारा ब्याज दरों में कटौती के विचार पर अपनी अप्रन्नता जताई. उन्होंने कहा, ‘विदेशी मुद्रा अप्रवासी रिजर्व (एफसीएनआर) की समस्या सुलझ जाने के बाद मुझे आशंका है कि कुछ और वजहें बन जाएंगी (दरों में कटौती नहीं करने के लिए).’

आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2013 में बैंकों ने एफसीएनआर के जरिये 34 अरब डाॅलर की कमाई की, इनमें से अधिकतर इसी साल निकाल ली जाएंगी. एफसीएनआर जमा योजना गिरते रुपए को संभालने के लिए लाई गई थी. रुपए की अब तक की सबसे कम कीमत 68.85 रुपए प्रति डाॅलर देखी गई और सेंट्रल बैंक ने वाणिज्यिक बैंकों को निर्देश दिए कि वे अपनी जमाओं को पर्याप्त बनाए रखने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाएं. एफसीएनआर जमाओं के निकाले जाने के चलते 20 अरब डाॅलर के तत्काल निकल जाने की संभावना है.

इस साल बैंकिंग प्रणाली से इतनी बड़ी राशि के निकल जाने का अर्थ है कि बैंकों के लिए ऋण देने की दर में तेजी नहीं लाई जा सकेगी. इसलिए एक संतुलित मौद्रिक नीति का राजन का तर्क वाजिब है.

इंडिया रेटिंग्स एंड रीसर्च की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015-16 से 2018-19 के बीच सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों (पीएसबी) में सीमित पूंजी के चलते उनके ऋण दरें कम हो कर 9 प्रतिशत तक आ सकती हैं.

रिपोर्ट मध्यम पीएसबी के लिए और भी भयावह तस्वीर प्रस्तुत करती है. वर्ष 2016 से 2019 के बीच इन बैंकों में ऋण वृद्धि दर 8.1 प्रतिशत ही रहने की संभावना है.

इतना ही नहीं रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पुरानी हो चली गैर निष्पादित संपत्तियों के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ऋण लागत ऊंची रहने की संभावना है. इससे वित्त वर्ष 2018-2019 में देश की सामान्य सकल घरेलू उत्पाद दर भी प्रभावित होगी.

विदा हो रहे आरबीआई गवर्नर ने उद्योगों को दरों की कटौती का तोहफा नहीं दिया. अब देखना यह है कि क्या आरबीआई के भावी गवर्नर भातीय बैंकों के साथ क्या इतना ही उदार रवैया अपनाएंगे.

First published: 10 August 2016, 7:41 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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