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मुद्रास्फीति पर रघुराम राजन छोड़कर जाएंगे अपनी छाप

नीरज ठाकुर | Updated on: 20 July 2016, 7:33 IST

रघुराम राजन की लड़ाई वही लड़ाई है जो उनके सभी पूर्ववर्तियों द्वारा भी लड़ी गई थी. यह लड़ाई विकास के बड़े आंकड़े की चाहत में सरकार को सतत विकास के पथ का अपहरण करने से रोकने की है.

सरकारी व्यवस्था राजन के इस रुख से नाखुश थी कि उन्होंने रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति को मुद्रास्फीति से जोड़ दिया है. इसके बावजूद राजन ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) को अनदेखा कर सरकार की (ब्याज दरें कम करने की) मांग पूरी करने के सब तरह के दबावों का खुलकर सामना किया. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मई 2016 में 21 माह के उच्च स्तर पर पहुंच गया था. उन्होंने ब्याज दरें कम नहीं की.

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हालांकि राजन के इस फैसले को मीडिया, उद्योग और यहां तक कि वैश्विक संस्थानों की ओर से व्यापक स्वीकृति मिली. लेकिन इसके बावजूद राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के माध्यम से सरकार यह धारणा बनाने में कामयाब रही कि मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने के बहाने भारत के विकास का दम घोंटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक जिम्मेदार है, जबकि मुद्रास्फीति पहले से ही नियंत्रण में थी.

राजन के मुताबिक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति एक औसत भारतीय के जीवन को प्रभावित करती है और विकास की खातिर इसकी अनदेखी करना लाखों भारतीयों के हितों के साथ समझौता करने जैसा होगा.

शनिवार को पत्रकारों के साथ बातचीत में राजन ने अपने आलोचकों को चुनौती दी कि वे साबित करके दिखाएं कि मुद्रास्फीति नीचे है. यह पहली बार नहीं है कि राजन ने अपने आलोचकों को आड़े हाथों लिया है, लेकिन तथ्य यह है कि वे रिजर्व बैंक से अपनी विदाई की घोषणा पहले ही कर चुके हैं और इसके बावजूद वे मुद्रास्फीति लक्षित मौद्रिक नीति के पक्ष में खड़े हैं. इससे उनके आलोचकों पर कुछ असर हो, न हो, लेकिन उनके उत्तराधिकारी के लिए मुद्रास्फीति की अनदेखी कर सरकार के इशारे पर नाचना मुश्किल हो जाएगा.

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उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति प्रमुख रूप से खाद्य पदार्थों की कीमतों से तय होती है और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर नियंत्रण में कांग्रेस की अगुवाई वाले संप्रग के साथ-साथ भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार भी विफल रहा है.

राजन के ठीक पहले गवर्नर के पद पर रहे डी सुब्बाराव ने हाल ही में जारी अपनी संस्मरण पुस्तक 'हू मूव्ड माई इंटरेस्ट रेट - लीडिंग द रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया थ्रू फाइव ट्रबूलेंट इयर्स' में तत्कालीन वित्त मंत्रियों प्रणब मुखर्जी और पी चिदंबरम के साथ अपनी लड़ाई को सबसे सामने खोलकर रख दिया है. यह लड़ाई उच्च विकास दर हासिल करने के सरकार के प्रयास का समर्थन करने के लिए ढीली मौद्रिक नीति अपनाने का दबाव झेलने की है.

लेकिन राजन, सुब्बाराव से अलग हैं. वे अलग इस मायने में हैं कि वे भारतीय रिजर्व बैंक जैसी संस्था को अपने नियंत्रण में रखने के लिए दबाव की नीति अपनाने वाली सरकार की आलोचना (अपने संस्मरण के माध्यम से) करने के लिए तीन साल इंतजार करने को तैयार नहीं हैं.

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राजन यह सुनिश्चित करने के लिए लड़ रहे हैं कि उनके उत्तराधिकारी सरकार के इशारे पर अल्पकालिक लाभ के लिए लंबी अवधि के विकास की अनदेखी न करने पाएं, जिसके लिए मुद्रास्फीति के प्रबंधन की जरूरत होती ही है. ध्यान देने वाली बात यह है कि उनके उत्तराधिकारी सरकार के चुने हुए लोग होंगे, इसलिए खतरा अधिक है कि वे सरकार के इशारे पर नाचने लगें.

अप्रैल 2014 में सरकार ने उर्जिट पटेल समिति की उस रिपोर्ट की उन सिफारिशों को अपना लिया था, जिनमें देश में ब्याज दरें कम करने के लिए मुद्रास्फीति का प्रमुख पैमाना उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बनाने को कहा गया था.

राजग सरकार यह पछतावा कर सकती है कि उर्जित पटेल समिति की सिफारिशों को निवर्तमान संप्रग सरकार ने जाते-जाते स्वीकार कर लिया था, लेकिन सबको यह ध्यान में रखना चाहिए कि जाती-जाती संप्रग सरकार भी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधरित मुद्रास्फीति को निशाना बनाने से खुश नहीं थी.

जनवरी 2014 में दिए गए एक टीवी साक्षात्कार में तत्कालीन आर्थिक मामलों के सचिव अरविंद मायाराम ने कहा था कि "भारत के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति को मौद्रिक नीति के निर्धारक के रूप में मानना थोड़ी जल्दबाजी होगी."

बैचेनी के बावजूद यूपीए सरकार ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति को मौद्रिक नीतिगत निर्णयों के लिए एक उपाय के रूप में स्वीकार कर लिया था.

राजग सरकार को भी सतत विकास के महत्व को समझना चाहिए. भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के वित्त मंत्रियों के साथ संबंध हमेशा तनावपूर्ण ही रहे हैं. हर आने वाली सरकारों ने दबाव बनाने की रणनीति से रिजर्व बैंक के गवर्नर के पद को कमजोर करने की कोशिश की है, फिर भी, गवर्नर इस उम्मीद पर खरे उतरे हैं कि वे अपने निर्णय लेने में स्वतंत्र रहेंगे और सरकार के छोटी अवधि के लक्ष्यों की बजाय लंबी अवधि के विकास पर ध्यान केंद्रित करेंगे.

महंगाई और विकास पर अपने सीधे सवालों के माध्यम से राजन यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके उत्तराधिकारी भी उस छवि पर खरे उतरें.

नए गवर्नर के लिए एक औसत भारतीय की थाली का आकार घटा देने वाली मुद्रास्फीति की दर की अनदेखी करना मुश्किल होगा.

First published: 20 July 2016, 7:33 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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