Home » बिज़नेस » RBI Governor: Rajan's successor five major challenges
 

आरबीआई गवर्नरः राजन के उत्तराधिकारी के सामने पांच प्रमुख चुनौतियां

कैच ब्यूरो | Updated on: 20 June 2016, 16:51 IST
(कैच न्यूज)

आखिरकार कई महीनों तक चली अटकलों, आरोपों और छवि बिगाड़ने के एक पूरे अभियान के बाद शनिवार को रघुराम राजन ने घोषणा की कि वे भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में दूसरे कार्यकाल के इच्छुक नहीं हैं और उनकी योजना वापस पठन-पाठन की दुनिया में लौटने की है.

उनकी यह घोषणा वित्तमंत्री अरुण जेटली के सामने आरबीआई के शीर्ष पद पर अपनी पसंद के व्यक्ति की नियुक्ति करने का रास्ता साफ करती है.

पढ़ें: कांग्रेस: रघुराम राजन को हटाने के लिए बीजेपी और आरएसएस ने की लॉबिंग

राजन, जिनका कार्यकाल सितंबर में समाप्त हो रहा है, के रिश्ते नरेंद्र मोदी के शासन के साथ खासे कड़वे रहे हैं जिसकी एक वजह शायद भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति की स्थिति का आकलन करते समय राजन का अपने विचार साफ शब्दों में सामने रखना है.

लेकिन सरकार और विशेषकर जेटली को राजन से जो सबसे बड़ी शिकायत रही वह थी मुद्रास्फीती को लेकर उनका जुनून. राजन ने ब्याज दरों को निर्धारित करने के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को बेंचमार्क बनाने का फैसला किया.

पढ़ें:रघुराम राजन के बाद अब जेटली से स्वामी की जंग

एक तरफ जेटली और उनके साथियों का मानना था कि कम मुद्रास्फीती दर वाली व्यवस्था उद्योग जगत को सुस्त विकास के चंगुल से बाहर लाने में मददगार साबित होगी वहीं दूसरी तरफ राजन का मानना था कि जमाकर्ताओं को सकारात्मक वास्तविक ब्याज दरें उपलब्ध करवाने से अधिक महत्वपूर्ण मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना है.

हालांकि राजन की सोच ब्याज दरों और मुद्रास्फीति से कहीं आगे तक गई. ऐसे में चाहे जो भी उनका उत्तराधिकारी बने, उसे इन पांच मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगाः

मुद्रास्फीति की दर

राजन ने ब्याज दरों का निर्धारण करने के लिये सीपीआई को बेंचमार्क बनाया और पूर्व से चली आ रही थोक मूल्य सूचकांक के उपयोग की प्रथा को तोड़ा. यही वजह रही कि करीब 18 महीनों से भी अधिक समय तक डब्लूपीआई के एक नकारात्मक जोन में रहने के बावजूद राजन को खुदरा मुद्रास्फीति दर के बेहद खतरनाक माने जाने वाले 6 प्रतिशत के निशान के पार रहने के बावजूद मौद्रिक दरों में तेज कटौती नहीं करनी पड़ी.

पढ़ें:कौन संभालेगा राजन के बाद आरबीआई? रेस में ये 3 नाम हैं सबसे आगे

भविष्य पर नजर डालें तो आरबीआई के नए गवर्नर को मुख्य रूप से दो चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के बढ़ते हुए दाम और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करना. उम्मीद है कि यह दोनों ही कदम खाद्य पदार्थों, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, एफएमसीजी और ऑटोमोबाइल के दामों पर दबाव डालेंगे.

इस सरकार को खाद्य मुद्रास्फीति की दरों पर अंकुश लगा पाने में नाकाम रहने पर पहले ही काफी आलोचना का सामना करना पड़ा है और ऐसे में यह देखना खासा दिलचस्प होगा कि जेटली और आरबीआई के उनके नए साथी इस उच्च मुद्रास्फीति से निबटते हैं.

विनिमय दर

राजन के सामने बेहद कठिन चुनौतियां थी, या तो निर्यात को बढ़ावा देने के लिये मुद्रा का मूल्य कम होने दें या फिर मुद्रा को बेहद मजबूत बनाए रखें और ये सुनिश्चित करें कि महंगे आयात के चलते विदेशी मुद्रा को अधिक नुकसान न हो.

पढ़ें: राजन के राज में 'रामभरोसे' मध्यवर्ग

अगर नए गवर्नर रुपए के मूल्य को गिरने देते हैं तो इसके फलस्वरूप चालू खाते के घाटे में वृद्धि हो सकती है. नतीजतन अपनी परियोजनाओं की फंडिंग के लिये विदेशी मुद्रा के रूप में ऋण लेने वाली कंपनियों पर पड़ने वाला दबाव काफी बढ़ सकता है. इसके अलावा हो सकता है कि कम रिटर्न के चलते निवेशकों के माध्यम से देश में आने वाला धन प्रभावित हो.

बैंकों की बैलेंस शीट

अगर कोई चीज ऐसी थी जो राजन को बिल्कुल नापंसद थी तो वह थी बैंकों द्वारा अपने बैड लोन को छिपाना. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, जो इस देश के बैंकिंग क्षेत्र के 70 प्रतिशत हैं, अभी तक चार लाख करोड़ रुपये से अधिक के बैड लोन घोषित कर चुके हैं और इसके अलावा अभी भी उनपर अघोषित रूप से 7 लाख करोड़ रुपये से अधिक के बैड लोन होने का अनुमान हैं.

राजन का सारा जोर इस बात पर रहा कि बैंक अपनी बैलेंस शीट को साफ-सुथरा रखें और उन्होंने सुनिश्चित किया कि वे ऐसा बिना किसी डर के कर सकें. उनके इस कदम ने जानबूझकर ऋण न चुकाने वालों में खलबली मचा दी जो जनता की जांच और ऋण चुकाने के लिये पड़ने वाले दबाव से प्रभावित हो रहे थे.

पढ़ें: दूसरा कार्यकाल नहीं चाहते रघुराम राजन

बैंकों ने अपनी ओर से खुद को होने वाले नुकसान की सूचना दे दी और बाजार का पूंजीकरण एकदम से काफी नीचे आ गया. क्या नए बैंकर एक नया और अलग दृष्टिकोण अपना पाएंगे?

उदाहरण के लिये क्या वे बैंकों को बकायेदारों के प्रति नरम रुख रखने की अनुमति देंगे या फिर उन्हें बैलेंस शीट में सुधार में मदद करने के लिये आर्थिक सुधार पर ही भरोसा करेंगे?

ऋण मूल्यांकन प्रणाली

वर्तमान बैंकिंग संकट एक विश्वसनीय ऋण मूल्यांकन प्रणाली की कमी का ही परिणाम है. बड़े ऋण के डूबने के संकट का सामना कर रहे अधिकतर बैंकों ने प्रमोटरों द्वार प्रस्तुत किये गए व्यापार संबंधी प्रस्तावों की विश्वसनीयता और व्यवहार्यता को सत्यापित ही नहीं किया. लंबे समय तक अगर बैंकों के काम को बेहतर बनाना है तो नए गवर्नर को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे किसी को भी ऋण देने से पहले सख्त नियमों का पालन करें.

विदेशी पूंजी निवेश

राजन को वैश्विक निवेशक समुदाय में आरबीआई के अबतक के तमाम गवर्नरों के बीच सबसे बेहतर माना जाता है. उन्होंने जिस तरीके से भारत की मौद्रिक नीति का संचालन किया उसने निवेशकों के मन में यह विश्वास बनाया कि भारत किसी भी वैश्विक आर्थिक तूफान का सामना कर सकता है.

उदाहरण के लिये अधिकतर देश अपनी शून्य ब्याज दर वाली मौद्रिक नीतियों के परिणामों को लेकर बिल्कुल अनजान हैं लेकिन राजन के नेतृत्व में भारत के साथ ऐसा नहीं है.

पढ़ें:आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन नहीं चाहते हैं सेवा विस्तार!

आखिरकार राजन एक मशहूर अर्थशास्त्री हैं जिन्होंने 2008 में आने वाले आर्थिक संकट की भविष्यवाणी काफी पहले ही कर दी थी. और जब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों से आरबीआई के गवर्नर के रूप में अपनी बात दुनिया के सामने रखी तो उनकी बात को अधिक वजन मिला.

राजन द्वारा उठाए गए कदमों ने निवेशकों के बीच यह विश्वास जगाया कि भारतीय अर्थव्यवस्था सही दिशा में आगे बढ़ रही है.

ऐसे में जो कोई भी राजन के उत्तराधिकारी के रूप में इस कुर्सी पर बैठेगा उसके लिये आगे की राह बेहद मुश्किल होगी विशेषकर जब वैश्विक निवेशकों का विश्वास जीतने की बारी आएगी.

First published: 20 June 2016, 16:51 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी