Home » बिज़नेस » Reliance Aerospace to execute Rafale offset programme in India
 

रफेल सौदा: अनिल अंबानी के हाथ लगा डिफेंस सेक्टर का सबसे बड़ा काॅन्ट्रैक्ट

कैच ब्यूरो | Updated on: 4 October 2016, 4:22 IST
QUICK PILL
  • भारत और फ्रांस के बीच हुए रफेल समझौते के बाद अनिल अंबानी की रिलायंस समूह को बड़ी कामयाबी हाथ लगी है. अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप और रफेल बनाने वाली कंपनी दसॉ एविएशन ने संयुक्त उपक्रम (ज्वाइंट वेंचर) बनाने की घोषणा की है. यह ज्वाइंट वेंचर 59,000 करोड़ रुपये के रफेल समझौते को अमली जामा पहनाएगा.
  • रिलायंस ग्रुप ने जनवरी 2015 में पीपावाव डिफेंस एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड का अधिग्रहण कर डिफेंस सेक्टर में कदम रखा था. अधिग्रहण के बाद रिलायंस ग्रुप ने कंपनी का नाम बदलकर रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड कर दिया. करीब डेढ़ साल के भीतर ही कंपनी को भारत के रक्षा क्षेत्र का सबसे बड़ा ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट मिला है.
  • 23 सितंबर को भारत और फ्रांस के बीच रफेल समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद करीब डेढ़ हफ्तों के भीतर ही 22,000 करोड़ रुपये के ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट को पूरा करने के लिए ज्वाइंट वेंचर बनाने की घोषणा कर दी गई है. ऑफसेट समझौते के तहत 74 फीसदी मैन्युफैक्चरिंग भारत से किया जाना अनिवार्य है़, जिसका सबसे अधिक फायदा अनिल अंबानी की कंपनी को मिलेगा.

भारत और फ्रांस के बीच हुए रफेल समझौते के बाद अनिल अंबानी की रिलायंस समूह को बड़ी कामयाबी हाथ लगी है. अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप और रफेल बनाने वाली कंपनी दसॉ एविएशन ने संयुक्त उपक्रम (ज्वाइंट वेंचर) बनाने की घोषणा की है. दोनों कंपनियों के बीच बना संयुक्त उपक्रम रफेल समझौते में शामिल ऑफसेट प्रावधान को लागू करने के लिए है जिसकी कीमत करीब 22,000 करोड़ रुपये बैठती है. 

23 सितंबर को भारत और फ्रांस के बीच रफेल समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद करीब डेढ़ हफ्तों के भीतर ही 22,000 करोड़ रुपये के ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट को पूरा करने के लिए ज्वाइंट वेंचर बनाने की घोषणा कर दी गई है.

समझौते के तहत भारत को 36 रफेल लड़ाकू विमानों की आपूर्ति की जानी है. भारत और फ्रांस के हुए इस सौदे की कुल लागत 7.87 अरब यूरो (करीब 59,000 करोड़ रुपये) है. समझौते में 50 फीसदी ऑफसेट का प्रावधान है जो भारत के साथ हुए किसी सौदे में अब तक का सबसे बड़ा ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट है. 

भारत और फ्रांस के हुए रफेल सौदे की कुल लागत 7.87 अरब यूरो (करीब 59,000 करोड़ रुपये) है

ऑफसेट समझौते के तहत 74 फीसदी सामानों की खरीदारी भारत से किया जाना अनिवार्य है और इस लिहाज से यह करीब 22,000 करोड़ रुपये होता है. 

ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट को पूरा किए जाने का समय सात सालों का होगा और इसे जल्द ही अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है. 

दोनों  कंपनियों की तरफ से जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि दसॉ रिलायंस एयरोस्पेस ज्वाइंट वेंचर ऑफसेट दायित्वों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा. 

समझौते में टेक्नोलॉजी की साझेदारी का भी प्रावधान है और इसे लेकर डिफेंस रिसर्च एंड डिवेलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के साथ बातचीत की जा रही है.

प्रधानमंत्री बनने के बाद मेक इन इंडिया कार्यक्रम नरेंद्र मोदी की सर्वाधिक महत्वाकांक्षी परियोजना रही है. इस लिहाज से देखा जाए तो रफेल समझौते में 50 फीसदी ऑफसेट का प्रावधान रखा जाना मेक इन इंडिया की भावना के मुताबिक ही है क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर देश के भीतर रक्षा के क्षेत्र में निर्माण को बढ़ावा मिलेगा. लेकिन क्या यह काम किसी एक कंपनी को आगे बढ़ाकर किया जा सकता है?

डेढ़ साल का अनुभव

रिलायंस ग्रुप ने जनवरी 2015 में पीपावाव डिफेंस एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड का अधिग्रहण कर डिफेंस सेक्टर में कदम रखा था. अधिग्रहण के बाद रिलायंस ग्रुप ने कंपनी का नाम बदलकर रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड कर दिया. करीब डेढ़ साल के भीतर ही कंपनी को भारत के रक्षा क्षेत्र का सबसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिल गया. 

सोमवार को बंबई स्टॉक एक्सचेंज में रिलायंस डिफेंस इंजीनियरिंग लिमिटेड का शेयर करीब 9 फीसदी की शानदार उछाल के साथ 61.50 रुपये पर बंद हुआ.

रिलायंस ग्रुप की तरफ से जारी बयान के मुताबिक रफेल समझौते का ऑफसेट क्लॉज भारत के साथ हुए अब तक के सौदे के मुकाबले सबसे बड़ा है. लेकिन डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग (रक्षा निर्माण) में रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड (आरडीईएल) की न तो किसी तरह की विशेषज्ञता है और नहीं कोई खास अनुभव.

30,000 करोड़ रुपये के ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट का बड़ा हिस्सा रिलायंस की तरफ से बनाए जाने वाले प्रॉडक्ट पर खर्च होगा और बाकी की रकम अन्य भारतीय कंपनियों के मैन्युफैक्चरिंग को जाएंगी. यह कहने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए कि दसॉ का समझौता एक तरह से रिलायंस पर लगाया गया दांव है. 

सरकार ने रफेल समझौते के बाद इन आशंकाओं को दूर करने की दिशा में ऐसी कोई पहल भी नहीं की है. मेक इन इंडिया के प्रति प्रधानमंत्री की दिलचस्पी को देखते हुए टाटा ग्रुप, लार्सन एंड टुब्रो और महिंद्रा एंड महिंद्रा ने भी डिफेंस सेक्टर को लेकर रुचि दिखाई है. लेकिन सबसे बड़ी कामयाबी अनिल अंबानी की कंपनी को हाथ लगी.

रिलायंस ग्रुप ने जनवरी 2015 में पीपावाव डिफेंस एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग का अधिग्रहण कर डिफेंस सेक्टर में कदम रखा.

देश में मैन्युफैक्चरिंग के लिए आरडीईएल की योजना नागपुर के रिलायंस स्पेशल इकनॉमिक जोन में इंटीग्रेटेड फैसिलिटी का निर्माण करना है. माना जा रहा है कि इस केंद्र को लेकर अगले कुछ महीनों में काम शुरू होगा और करीब 12 महीनों बाद यहां से प्रॉडक्शन की शुरुआत होगी. देश को पहला रफेल 36 महीनों बाद मिलने की उम्मीद है.

रिलायंस ग्रुप के चेयरमैन अनिल अंबानी ने कहा, 'हमें खुशी हो रही है कि हमने एविशन के क्षेत्र में दुनिया की दिग्गज कंपनी दसॉ एविएशन और एरिक ट्रैपियर जैसे दूरदर्शी व्यक्ति के साथ साझेदारी की है. यह भारतीय एयरोस्पेस और रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की सब्सिडियरी रिलायंस एयरोस्पेस के लिए बदलाव का क्षण है.'

अनुभव और विशेषज्ञता नहीं होने के बावजूद अनिल अंबानी की कंपनी को देश की सुरक्षा के लिहाज से अहम माने जाने वाले डिफेंस सेक्टर का सबसे बड़ा ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट मिला है. 

खबरों के मुताबिक रिलायंस ने करीब 84,000 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट के लिए बोली लगाई थी लेकिन अभी तक उसे किसी में सफलता हाथ नहीं लगी है. 

भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार का बाजार है और आने वाले दिनों में अन्य विदेशी कंपनियों को भी इस बाजार में आने का मौका मिलेगा. अन्य कंपनियों के भारतीय बाजार में आने का मतलब ऑफसेट प्रावधानों के तहत भारतीय बाजार में होने वाले निवेश में बढ़ोतरी होना है जिससे घरेलू निर्माण को बढ़ावा मिलेगा. ऐसे में संबंधित क्षेत्र में होने वाले विदेशी निवेश से घरेलू स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा लेकिन उसकी गुणवत्ता कंपनी की विशेषज्ञता और अनुभव से ही बनी रह पाएगी.

रफेल समझौते के तहत रिलायंस ग्रुप को मिला कॉन्ट्रैक्ट डिफेंस सेक्टर में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के माामले में कितना विश्वसनीय सप्लाई चेन बना पाएगा, देखना बाकी है.

मेक इन इंडिया के तहत देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग का ईको सिस्टम तैयार किया जाना है और यह काम किसी क्षेत्र विशेष में एक कंपनी को आगे बढ़ाने की बजाए कंपनियों के समूह के साथ बेहतर तरीके से किया जा सकता है. 

First published: 4 October 2016, 4:22 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी