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रिलायंस जियो बनाम एयरटेल: इतिहास क्या कहता है?

नीरज ठाकुर | Updated on: 5 September 2016, 15:29 IST

मुकेश अम्बानी ने हर भारतीय को बता दिया है कि कैसे रिलायंस जियो की पूरे भारतीय दूरसंचार बाजार पर कब्जा जमाने की योजना है. इसने स्टॉक मार्केट में सारे प्रतिद्वंदियों को मात दे दी. तो क्या मान लिया जाए कि अब एयरटेल, आईडिया, अनिल अम्बानी की स्वामित्व वाली रिलायंस इंफोकॉम के दिन लद गए हैं? इतिहास पर गौर करें तो नहीं. ऐसा नहीं हो सकता.

पहले मुकेश के बारे में ही बात करते हैं. अनुमानों के उलट काफी देर से देश के निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी कम्पनी के मालिक ने रिलायंस जियो इंफोकॉम लिमिटेड (रिलायंस इंडस्ट्रीज साम्राज्य का ही एक भाग) के प्लान के बारे में जानकारी दी.

प्रति माह 149 रुपए का भुगतान करने वालों के लिए अनलिमिटेड वॉइस कॉल्स. इससे दूसरी कम्पनियों के राजस्व को तगड़ा झटका लग सकता है. वॉइस कॉल्स से ही दूसरी कम्पनियां 80 प्रतिशत राजस्व कमाती हैं.

दरअसल मुकेश अम्बानी चाहते हैं कि वे मार्च 2017 तक 18,000 कस्बों व शहरों और दो लाख से ज्यादा गांवों तक पहुंच बना लें, यानी भारत की 90 फीसदी जनता तक.

अम्बानी ने कहा जियो भविष्य का फोन है और इसे ज्यादा डेटा, तकनीकी के अनुसार अपग्रेड भी किया जा सकेगा, जैसे 5जी, 6जी या उससे भी आगे. रिलायंस जियो ने 4जी सेवाओं के लिए अब तक 29,000 करोड़ रूपए खर्च कर दिए हैं; साथ ही और भी खर्च करने को तैयार है.

कर लो दुनिया मुठ्ठी में

रिलायंस जियो की घोषणा के बाद बेशक प्रतिद्वंदी कम्पनियों के स्टॉक में 11 प्रतिशत की गिरावट देखी गई. परन्तु उनके बारे में लिखने से पहले आइए, देखते हैं 27 दिसम्बर 2002 को क्या हुआ था?

उस दिन रिलायंस इंफोकॉम के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक (अब अनिल के अधीन रिलायंस कम्युनिकेशन) मुकेश अम्बानी ने कहा था, ‘शुरूआत में मार्च 2003 तक रिलायंस इंफोकॉम का नेटवर्क 673 कस्बों व शहरों में चालू होगा और इससे 6.4 लाख गांव और 2000 कस्बे एक-दूसरे से जुड़ जाएंगे. इस विशालकाय नेटवर्क का प्रयास ठीक ऐसे ही है जैसे भारत में रेल लाइनों का जाल.'

देशव्यापी नेटवर्क बिछाने की लागत 25,000 करोड़ बताई गई थी. अम्बानी बंधुओं में से बड़े भाई मुकेश ने 2004 के अंत तक लाभ कमाना शुरू कर दिया था और उनकी योजना बाजार के 20 से 25 फीसदी हिस्से पर प्रभुत्व जमाने की थी.

विफलताओं की सूची

रिलायंस इंफोकॉम ने 2003-04 में कुल 390 करोड़ रुपए का घाटा दिखाया. इस वजह से पैतृक कम्पनी आरआईएल (रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड) को 265 करोड़ रुपए का झटका लगा.

भारतीय दूरसंचार नियमन प्राधिकरण (ट्राई) के अनुसार, 2005 के बाद से रिलायंस कम्यूनिकेशन के नाम से जानी जाने वाली कम्पनी मार्च 2007 तक बाजार के मात्र 2.81 प्रतिशत हिस्से तक सिमट कर रह गई.

2016 में भी एयरटेल दूरसंचार बाजार का बादशाह बना हुआ है. 2004 में बाजार की 24.22 प्रतिशत हिस्सेदारी उसके पास थी.

आज 19.16 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ वोडाफोन दूसरे नंबर पर है. आइडिया का 17 प्रतिशत बाजार पर अधिकार है.

रिलायंस कम्युनिकेशन की बाजार हिस्सेदारी मात्र 9.93 प्रतिशत रह गई है, जो केवल बीएसएनएल और एयरसेल से ज्यादा है.

क्या इतिहास दोहराया जाएगा?

इसके पीछे एक तर्क दिया जा सकता है कि रिलायंस इंफोकॉम ने शायद इसलिए बाजार का भरोसा खो दिया हो क्योंकि अम्बानी बंधुओं के बीच उसी दौरान बंटवारा हो गया था. दूरसंचार व्यापार की सारी मूल रणनीति मुकेश की होने के बावजूद यह कम्पनी छोटे भाई अनिल के हिस्से आई थी.

दूसरा तर्क यह दिया जा सकता है कि किसी भी बाजार में पहली कम्पनी ब्रांड को पछाड़ना मुश्किल होता है. एयरटेल इस बाजार में बीस साल से जमा हुआ है.

रिलायंस जियो और एयरटेल दोनों के पास 4जी का पैन इंडिया लाइसेंस है. दूरसंचार क्षेत्र में काफी पैसा कमा चुकी सबसे बड़ी कम्पनी एयरटेल के लिए रिलायंस जियो के प्लान को टक्कर देना कोई मुश्किल काम नहीं है. इसके लिए वह मुफ्त वॉइस कॉल और 4जी डाटा कम से कम किराये पर दे सकती है.

दूरसंचार व्यवसाय सेवा की गुणवत्ता से चलता है न कि उसकी कीमत से. एमटीएनएल और बीएसएनएल की बाजार में गिरती साख इसका एक उदाहरण है.

दूसरे सेवा प्रदाताओं के मुकाबले एयरटेल और वोडाफोन अच्छी गुणवत्ता वाली सेवा उपलब्ध करवा रहे हैं. इसीलिए उच्च शुल्कों के बावजूद उनकी बाजार पर पकड़ अच्छी हैं.

इसलिए रिलायंस के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह अपने उपभोक्ताओं को अच्छी गुणवत्ता वाली सेवा उपलब्ध करवाए. मुकेश अंबानी का उल्लेख इस बात के लिए जरूर किया जाएगा कि उनकी वजह से दूरसंचार की सेवाओं और कीमतों में दो बार उथल-पुथल हुई. परन्तु देश की सबसे बड़ी निजी क्षेत्र केी कम्पनी के मालिक मुकेश यह तो चाहेंगे ही कि इस बार उन्हें मात न खानी पड़े.

First published: 5 September 2016, 15:29 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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