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जन औषधि स्टोर की राह में कई रोड़े हैं

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 1 March 2016, 12:28 IST

इस साल के आम बज़ट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जनकल्याण वाली योजनाओं की ऐसी झड़ी लगा दी कि वो नए समाजवादी नज़र आने लगे हैं.

ऐसे ही फैसलों की कड़ी में वित्त मंत्री ने जन औषधि कार्यक्रम को विस्तार देने की घोषणा की. इसके तहत गरीब लोगों को सस्ती दर पर दवा उपलब्ध कराने के लिए दुकानें खोली जाती हैं.

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सरकार ने इस साल ऐसी तीन हजार दुकानें खोलने की बात कही है. हालांकि जन औषधि स्टोर का पिछला रिकॉर्ड निराशाजनक ही रहा.

आइए एक नजर डालते हैं इस योजना के क्रियान्वयन में आने वाली मुश्किलों पर


  • भारत में अभी 137 जन औषधि स्टोर हैं.
  • साल 2012 तक देश में कुल 112 जन औषधि स्टोर थे. यानी साल 2012 से 2015 के बीच केवल 25 नई दुकानें खुल सकीं. 
  • तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य सस्ती या मुफ्त दवा देने के लिए अपनी-अपनी योजनाएं चलाते हैं इसलिए उन्हें केंद्र की इस योजना में कोई खास रुचि नहीं है.
  • जन औषधि स्टोर पर 320 दवाएं सस्ती दर पर मिलती हैं. मसलन, जो पैरासिटामॉल बाजार में 14 रुपये की मिलती है वो जन औषधि स्टोर पर दो रुपये की मिलती है. इन स्टोर पर दवा की आपूर्ति सीमित होती है क्योंकि वो पूरी तरह  दवा क्षेत्र की पीएसयू पर निर्भर होती हैं.
  • जन औषधि योजना साल 2008 में शुरू हुई थी. तब इसके लिए 24 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था. लेकिन 11वीं पंचवर्षीय(2007-12) योजना में इसके लिए छह करोड़ रुपये अनुमोदित हुए.
  • कुछ जन औषधि स्टोर फौरी मांग को पूरा करने के लिए निजी दवा निर्माताओं से भी दवा लेने लगे हैं.
  • जन औषधि की राह में एक रोड़ा ये भी है कि निजी कंपनियां नहीं चाहतीं कि डॉक्टर मरीजों को जेनेरिक दवा लिखें.

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First published: 1 March 2016, 12:28 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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