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सत्या पोद्दार: 14% जीएसटी से सरकार मालामाल, 20% से बंटाढार

स्कंद विवेक धर | Updated on: 9 August 2016, 8:51 IST

वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) लागू करने के लिए जरूरी संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान कल लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी पहलुओं पर अपनी बात रखी, लेकिन जीएसटी की दरों को लेकर उन्होंने कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया. सरकार तमाम दबावों और विपक्ष के बारंबार हमले के बावजूद जीएसटी की दरों को लेकर एक किस्म की लुकाछिपी खेल रही है.

लेकिन बाजार विशेषज्ञों की मानें तो जीएसटी की सफलता की सारी कहानी इसकी दरों पर ही निर्भर है. दुनिया भर के देशों में यह तभी सफल रहा है जब दरें एक समान, सरल और स्पष्ट रहीं. टैक्स विशेषज्ञों के मुताबिक जीएसटी की दर ही देश में इसकी सफलता या असफलता का कारण बनेगी.

संसद में पेश मौजूदा जीएसटी बिल का वर्किंग पेपर तैयार करने वाले टैक्स विशेषज्ञ सत्या पोद्दार ने इस संबंध में कई महत्वपूर्ण बातें कैच से साझा की. उनके मुताबिक, जीएसटी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितनी सरल है और उसकी दर क्या है? पोद्दार कहते हैं, “सभी वस्तुओं और सेवाओं पर 14 फीसदी की एकल दर वाली जीएसटी व्यवस्था भारत सरकार को मालामाल कर देगी. इतना ही नहीं इस दर पर आम आदमी और छोटे कारोबारियों को भी राहत मिलेगी.”

जाहिर है कि अगर पोद्दार के आकलन पर भरोसा करें तो लंबे समय से सरकार और विपक्ष के बीच जीएसटी की 18% की अपर लिमिट को लेकर जारी गतिरोध का कोई अर्थ नहीं रह जाता है. इसके बावजूद सरकार अभी भी दरों को लेकर एक संशय का माहौल बनाए हुए है. सत्या पोद्दार ने हमें जीएसटी की दरों और वैश्विक स्तर पर इसकी मौजूदा स्थिति से दो-चार कराया है.

भारत के लिए सही दर क्या है?

पोद्दार के मुताबिक अगर हम पूरे देश में 14 फीसदी की एकल दर सभी वस्तुओं और सेवाओं पर लगा दें तो भारत सरकार का खजाना भर जाएगा. जीएसटी की सफलता इसकी सरलता और एकरूपता में निहित है. अगर हम इसमें भी बहुपरतीय कर व्यवस्था की कोशिश करेंगे तो यह मौजूदा कर व्यवस्था की तरह ही जटिल और बेमायने हो जाएगा.

कल लोकसभा में प्रधानमंत्री के भाषण से इस बात की झलक मिली कि सरकार कोई एकल कर व्यवस्था की बजाय कई दरों वाली व्यवस्था लागू करने पर विचार कर रही है.  जीएसटी की दरों के निर्धारण को निम्न तरीके से समझा जा सकता है.

फिलहाल जिन वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी लगाने का प्रस्ताव है, उन पर लगने वाले सभी अप्रत्यक्ष करों को मिलाकर केंद्र और राज्य सरकार फिलहाल जीडीपी का छह फीसदी के बराबर टैक्स वसूल रही हैं.

  • टैक्स का फॉर्मूला यह है कि जीडीपी के एक फीसदी के बराबर टैक्स वसूलने के लिए 2 फीसदी टैक्स लगाना पड़ता है.
  • इस हिसाब से जीडीपी के 6 फीसदी के बराबर टैक्स वसूलने के लिए जीएसटी की 12 फीसदी दर लगानी होगी.
  • इस लिहाज से अगर जीएसटी की दर 14 फीसदी हो तो यह जीडीपी मौजूदा छह प्रतिशत अंशदान से करीब 1% ज्यादा का योगदान करेगी और साथ ही कुल कर संग्रह में 16% का ईजाफा भी करेगी.

न्यूजीलैंड का उदाहरण देते हुए पोद्दार बताते हैं, "न्यूजीलैंड ने जीएसटी लागू करते समय 10 फीसदी की दर मानी थी, जिस पर कर संग्रह न्यूट्रल रहता. हालांकि, एक साल बाद जब 10 फीसदी जीएसटी का परिणाम सामने आया तो सरकार भौंचक रह गई. न्यूजीलैंड सरकार के राजस्व में 42 फीसदी का इजाफा हो गया था.”

पोद्दार के मुताबिक अगर इस उदाहरण के जरिए माना जाय तो भारत में 14 फीसदी की जीएसटी की दर से देश को बहुत फायदा होगा और आम आदमी को भी राहत मिलेगी. व्यापारियों को ज्यादा उलझना नहीं पड़ेगा, टैक्स चोरी भी कम हो जाएगी. अगर सरकार ने जीएसटी को इतना सरल और कम दर पर नहीं रखा तो इसकी सफलता संदिग्ध है.

किस देश में कितना जीएसटी

  • अमेरिका    11.72%
  • फ्रांस         20.00%
  • यूके           20.00%
  • जर्मनी        19.00%
  • आस्ट्रेलिया 10.00%
  • सिंगापुर       07.00%
  • न्यूजीलैंड    15.00%
  • कनाडा        05.00%
  • पाकिस्तान   17.00%

पोद्दार बताते हैं, "जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार कह चुके हैं, जो भी पार्टी जीएसटी का विरोध करेगी, वह सुसाइड करेगी. मैं ये कहता हूं कि जो भी सरकार 20 फीसदी या इससे अधिक टैक्स लगाएगी, वह भी सुसाइड के लिए तैयार रहे.”

पोद्दार के मुताबिक जीएसटी बिल में प्रस्तावित जीएसटी की चार दरें किसी लिहाज से उचित नहीं हैं

पोद्दार के मुताबिक ड्राफ्ट बिल में प्रस्तावित जीएसटी की चार दरें किसी लिहाज से उचित नहीं हैं. मालूम हो, जीएसटी की चार दरों में पहली दर सोने-चांदी पर होगी, जो 3-4 फीसदी के आसपास होगी, दूसरी 12 फीसदी होगी जो खाद्य वस्तुओं पर लगेगी. तीसरी 18 से 20 फीसदी होने की बात चल रही है. चौथी दर 40 फीसदी भी हो सकती है.

पोद्दार ने कहा कि भारत जैसे देश में कौन खुशी से 20 फीसदी या 40 फीसदी टैक्स देगा. फिर इतना ही जटिल टैक्स सिस्टम रखना था तो जीएसटी लाने की जरूरत क्या थी? इससे तो टैक्स चोरी की प्रथा को ही बढ़ावा मिलेगा. कुल मिलाकर इससे जीएसटी का मूल मकसद ही असफल हो जाता है.

सरकार का एक विचार यह भी है कि बिजली, पेट्रोलियम, रियल एस्टेट और एल्कोहल जैसे सेक्टर्स को पांच साल के लिए जीएसटी से बाहर रखा जाय. इन चारो सेक्टर्स का भारतीय अर्थव्यवस्था में 40 फीसदी योगदान है. पोद्दार ने कहा, "ऐसे में जीएसटी का बेस ही 60 फीसदी रह गया है. इसके चलते एक बाजार की संकल्पना को नुकसान पहुंचेगा, साथ ही विभिन्न राज्यों की इनपुट लागत में असमानता भी बनी रहेगी.”

2000 में रखी गई थी जीएसटी की नीव

वर्ष 2000 में तत्कालीन एनडीए सरकार ने अप्रत्यक्ष कर सुधार के लिए अर्थशास्त्री विजय केलकर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था. इस समिति ने वर्ष 2004 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें जीएसटी को लागू करने की सिफारिश की गई थी.

2004 में केंद्र में सरकार बदल गई, लेकिन उसने समिति के सुझाव को स्वीकार कर लिया. पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने 2006 के बजट में जीएसटी की घोषणा की. वर्ष 2010 में तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने इसे अप्रैल 2011 से लागू करने की घोषणा की.

गुजरात समेत कई राज्यों के विरोध के चलते यूपीए सरकार इस बिल को पारित नहीं करा सकी. 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बनी केंद्र की नई सरकार ने एक बार फिर जीएसटी को लेकर कार्यवाही शुरू की जो अब अंजाम पर पहुंची है.

First published: 9 August 2016, 8:51 IST
 
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