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स्टार्ट अप के लिए सेबी को लिस्टिंग नॉर्म्स में कतई छूट नहीं देनी चाहिए, क्यों?

नीरज ठाकुर | Updated on: 18 April 2016, 17:23 IST

जून 2015 में सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) द्वारा स्टार्ट अप्स के लिए स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टिंग नॉर्म्स को आसान कर दिया गया था. इसके पीछे वजह यह रही कि भारतीय स्टार्ट अप्स बाजार से पैसे उठाकर अपना व्यवसाय बढ़ा सकें. सोचा गया था कि इस प्रक्रिया में भारतीय निवेशकों को भी मुनाफा कमाने का मौका मिल सकेगा.

लेकिन इस नए नियम के आने के तकरीबन एक साल बाद भी एक भी भारतीय स्टार्ट अप ने खुद को स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं किया है. और अब पीटीआई के मुताबिक सेबी फिर से स्टार्ट अप्स के लिए लिस्टिंग रूल्स में कुछ छूट देने पर विचार कर रही है. 

सेबी के पहले चरण के नियमों में ढील देने के दौरान इसने स्टैंडर्ड वैल्युएशन पैरामीटर्स जैसे प्राइस ऑफ अर्निंग्स, अन्य शेयरों के बीच प्रति शेयर कमाई में छूट दे दी थी. इनमें छूट देने के साथ ही सेबी ने स्टार्ट अप्स को अपने व्यवसाय में होने वाले मुनाफे का खुलासा न किए जाने की भी अनुमति दे दी थी.

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इसके साथ ही नियमों के अंर्तगत मिनिमम ट्रेडिंग लॉ और मिनिमम एप्लीकेशन साइज को भी 10 लाख रुपये कर दिया था ताकि केवल बड़े और हाई नेट वर्थ वाले व्यक्ति ही आ सकें.

लिस्टिंग के लिए सेबी ने प्रमोटर्स और प्री लिस्टिंग इंवेस्टर्स को तीन वर्षों के अनिवार्य लॉक-इन पीरियड में भी छूट दे कर इसे छह माह कर दिया था.

अब अगर सेबी फिर से इन नियमों में ढील देने के बारे में निर्णय लेता है तो यह निवेशकों को खतरे में डाल देगा जिसके परिणामस्वरूप निवेशकों के सैकड़ों करोड़ रुपये डूब जाने का खतरा पैदा हो जाएगा.

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नियमों में ढील देने की बजाए स्टार्ट अप्स ने भारतीय स्टॉक मार्केट में सूचीबद्धता में दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई इसकेे चार प्रमुख कारण हैं.

1. भारतीय बाजार पिछले एक साल से काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है और ऐसे में कोई भी स्टार्ट अप बाजार में जाने का जोखिम नहीं उठा सकता.

2. खुले बाजार में केवल वहीं कंपनियां जा सकती हैं जिन्हें निवेशकों के जरिये गंभीर मुनाफे की उम्मीद है. अधिकांश भारतीय स्टार्ट अप्स फिलहाल जमीन पर अपने पांव मजबूती से टिकाने की कोशिश में जुटी हुई हैं.

90 फीसदी भारतीय स्टार्ट अप्स का व्यावसायिक ढांचा दोषपूर्ण हैं 

भारत की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट ने मार्च 2015 तक समाप्त बीते वर्ष में 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाया. जबकि इसके नजदीकी प्रतिस्पर्धी स्नैपडील ने इसी दौरान 1,328.01 करोड़ रुपये का नुकसान उठाया.

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3. मुनाफे की संभावनाः जहां कई कंपनियां यह दावा कर रही हैं कि वे आने वाले वक्त में मुनाफा कमाना शुरू कर देंगी, लेकिन उनके मौजूदा छूट आधारिक बिक्री के व्यावसायिक ढांचे को देखते हुए यह बहुत मुश्किल लगता है कि वे मुनाफा कमाने में सफल होंगी. और हकीकत यह है कि सेबी ने अपनी लिस्टिंग नॉर्म्स में कंपनियों को उनकी लाभ कमाने की संभावना छिपाने की भी छूट दे रखी है. इससे निवेशकों में भारतीय ई-कॉमर्स बाजार के प्रति संशय और बढ़ेगा.

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4. निवेश की कमीः मिंट अखबार के मुताबिक अक्तूबर-दिसंबर 2015 की तिमाही की तुलना में जनवरी-मार्च 2016 में निवेशकों द्वारा भारतीय स्टार्ट अप्स में 1.15 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया गया, जो कि पिछली तिमाही की तुलना में 48 फीसदी कम है.

जब प्राइवेट इक्विटी इंवेस्टर्स भी भारतीय स्टार्ट अप्स में अपनी दिलचस्पी खो रहे हैं तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि स्टॉक मार्केट में स्टार्ट अप्स को निवेशक कैसे मिलेंगे.

इस सब समस्याओं के बावजूद इंफीबीम इनकॉर्पोरेशन लिमिटेड हिम्मत करके पहली भारतीय ई-कॉमर्स कंपनी बनीं जिसने अपना पहला आईपीओ इस साल मार्च में निकाला. इसके बाद यह आईपीओ तब परेशानी में पड़ गया जब इसकी लॉन्चिंग के कुछ दिन बाद ही कोटैक महिंद्रा कैपिटल और आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज ने बतौर बैंकर आईपीओ से अपने हाथ पीछे खींचते हुए कहा कि कंपनी द्वारा इसकी स्टॉक कीमतों की काफी ज्यादा कीमत लगाई गई है.

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भारी नकारात्मक प्रचार के बावजूद यह आईपीओ कुछ आगे बढ़ा लेकिन इसने निवेशकों और कंपनियों के दिमाग में एक प्रभाव छोड़ दिया कि अभी इंडियन स्टॉक मार्केट स्टार्ट अप्स के लिए तैयार नहीं है.

सेबी को धैर्यवान होना होगा

सेबी द्वारा स्टार्ट अप्स के लिए लिस्टिंग नॉर्म्स में छूट देने का पिछला फैसला केवल इस दबाव में लिया गया था कि भारतीय स्टार्ट अप कंपनियां विदेशों में जाकर पैसे जुटाने में सक्षम हो सकें.

और अब 10 माह में केवल एक आईपीओ को देखने के बाद सेबी नियमों में और छूट देने के बारे में विचार कर रहा है. लेकिन बाजार नियामकों को यह समझना होगा कि स्टॉक मार्केट में कंपनियों की लिस्टिंग में तमाम निवेशक भी शामिल हो जाते हैं जो कंपनियों के व्यापारिक मॉडल के आकलन में विशेषज्ञ नहीं होते हैं. 

90 फीसदी भारतीय स्टार्ट अप्स का व्यावसायिक ढांचा दोषपूर्ण हैं और प्राइवेट इक्विटी के साथ ही वेंचर कैपिटलिस्ट्स भी स्टॉक मार्केट के रिटेल इंवेस्टर्स को अपना हिस्सा बेचकर इन स्टार्ट अप्स से बाहर निकलने की फिराक में हैं.

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अगर सेबी फिर से लिस्टिंग नॉर्म्स में छूट देता है तो संभावना है कि बंद होने की कगार पर पहुंच चुके तमाम स्टार्ट अप्स बिना किसी संवेदनशील जानकारी को साझा किए अपने आईपीओ लॉन्च कर दें. इससे पैसे लगाने वाले निवेशकों को बिना जानकारी पाए ही जुआं खेलना होगा.

इसका परिणाम काफी गंभीर होगा क्योंकि एक बार भारतीय स्टार्ट अप्स की कहानी से भरोसा खो चुके निवेशक भविष्य में बेहतर और अच्छे बिजनेस मॉडल वाली स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध कंपनी में भी निवेश करने से कतराएंगे. इसलिए सेबी को चाहिए कि वो थोड़ा धैर्य रखे और स्टार्ट अप्स को सूचीबद्ध करने के लिए सही वक्त का इंतजार करे.

First published: 18 April 2016, 17:23 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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