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ऋण बाज़ार में धीमी वृद्धि, सरकारी बॉन्ड्स में निवेश कर रहे बैंक

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 14 February 2017, 7:21 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

नोटबंदी के बाद जिस आसान और सस्ती उधारी की उम्मीद और जरूरत महसूस की जा रही थी, वैसा होता फिलहाल नहीं दिख रहा है. डिमोनेटाइजेशन के दो माह के दौरान उधारी में सिर्फ 60,140 करोड़ रुपये यानी मात्र 0.81 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि इस दौरान जमाओं में 4.7 प्रतिशत यानी 469.30 करोड़ की वृद्धि दर्ज की गई है. क्रेडिट अर्थात ऋण देने की दर पहले ही पिछले दो दशक में सबसे निचले स्तर पर थी और अब भी उसमें सुधार नहीं हुआ है, जिसके चलते बैंक उनके पास पिछले दिनों आई अधिक नकदी को गवर्नमेंट सिक्युरिटी में निवेश कर रहे हैं. 

रिजर्व बैंक के डाटा के अनुसार 11 नवंबर 2016 से लेकर 6 जनवरी 2017 के बीच बैंकों का गवर्नमेंट सिक्युरिटी में निवेश 25 प्रतिशत यानि 7,37,520 करोड़ रुपये बढ़ गया है. यह आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि चालू वित्त वर्ष में बैंकों का गवर्नमेंट सिक्युरिटी में निवेश पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 38 प्रतिशत बढ़ गया है. आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में जमा का प्रतिशत जहां 13.5 प्रतिशत बढ़ा है तो उधारी मात्र 2.3 प्रतिशत बढ़ी है.

नॉन-परफॉर्मिंग असेट और राइट-ऑफ की समस्या से पहले ही जूझ रहे बैंकों को उम्मीद है कि इस तरह के नकद और सुरक्षित निवेश से उनको लाभदायक रिटर्न मिल सकेगा. इंडिया रेटिंग के अनुसार मार्च के अंत तक बैंकों के खजाने में 38200 करोड़ की वृद्धि दर्ज की जा सकती है, जबकि 2015-16 में यह आंकड़ा 23,600 करोड़ दर्ज किया गया था. लब्बोलुआब यह है कि बैंक पैसा उधार नहीं दे रहे हैं. इसकी वजह या तो उधारी की कम मांग होना है या फिर ऐसे इंस्ट्रमेंट में पैसे निवेश कर रहे हैं जिससे जोखिम उठाए बिना उनके खजाने में वृद्धि हो जाए.

उत्पादन घटने से कमी

केयर रेटिंग्स के मुख्य आर्थिक सलाहकार मदन सबनवीस के अनुसार नवंबर-दिसंबर में उत्पादन में कमी के कारण उधारी की मांग में भी कमी हुई है. इस कारण जो अभी अतिरक्त पैसा बैंकों के पास आया है वो सारा उन्होंने सरकारी सिक्युरिटीज में निवेश कर दिया है. सबनवीस के अनुसार, बैंकों के पास फिलहाल और कोई विकल्प नहीं है. एक तरह बैंकों के पास नकदी आ गई है, जिसकी उन पर ब्याज की देनदारी होगी. बैंक इस जमा पैसे को विभिन्न सेक्टरों को उधार देकर ही अपनी आय अर्जित करते हैं. उधारी की मांग में कमी के चलते वे अब अतिरिक्त नकदी को सरकारी सिक्युरिटी बॉन्ड्स में निवेश कर रहे हैं.

कई विशेषज्ञ पहले ही कह चुके हैं कि देश में उधारी की वृद्धि दर पिछले दो दशक में सबसे कम आ चुकी है और डर है कि यह आंकड़ा अब चालू वित्त वर्ष में इकाई के आंकड़े तक आ सकता है. 

जीडीपी के सापेक्ष निवेश वित्त वर्ष 2012—2013 में 34 प्रतिशत था जो कि 2017—18 में 29 प्रतिशत तक गिरा. 

बैंकों का उधारी में धीमी वृद्धि को देखने का एक और तरीका यह हो सकता है : 2004 से 2012 के बीच यूपीए शासनकाल दौरान 320 पाक्षिक रिपोर्ट में हर पांचवी पाक्षिक रिपोर्ट में उधारी में कोई वृद्धि नहीं देखी गई. जबकि एनडीए के मई 2014 के बाद के शासनकाल में प्रत्येक तीसरे पाक्षिक में उधारी में कोई वृद्धि दर्ज नहीं हुई. दरअसल बैंक अपने कारेाबार की रिपोर्ट आरबीआई को प्रत्येक 15 दिन में देते हैं.

यह स्लोडाउन किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं है. रेलिगेयर मार्केट एनालिस्ट के अनुसार एसएमई की उधारी में 7 प्रतिशत की गिरावट हुई, जो कि लगातार 10वें माह में गिरावट दर्ज की गई. वहीं बड़े उद्योगों की उधारी में 2.3 प्रतिशत की गिरावट हुई.

रेलिगेयर की हालिया रिपोर्ट के अनुसार फूड प्रोसेसिंग के प्रत्येक सब-सेक्टर में मंदी दर्ज की गई. इसमें यह गिरावट नवंबर 2015 के -1.3 प्रतिशत की तुलना में 13.4 प्रतिशत रही. इंजीनियरिंग में 8.9 प्रतिशत की तुलना में -2.1 प्रतिशत रही. बुनियादी ढांचे के लोन में यह गिरावट 6.7 प्रतिशत रही. वार्षिक आधार पर टेलीकॉम और पॉवर सेक्टर में उधारी में गिरावट 6.3 प्रतिशत से लेकर 10.4 प्रतिशत रही. 

First published: 14 February 2017, 7:21 IST
 
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