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क्या ई-कॉमर्स और तकनीकी कंपनियां संदेहास्पद गतिविधियों में लिप्त हैं?

नीरज ठाकुर | Updated on: 21 August 2016, 8:38 IST
(कैच न्यूज)

वर्तमान दौर में मुक्त व्यापार में प्रतियोगिता को समाप्त करने के कई तरीके मौजूद हैं. कुछ कंपनियां छोटी कंपनियों को खत्म करने के लिये कम कीमतों की पेशकश का सहारा लेती हैं तो कुछ उनका अधिग्रहण करके इसके अलावा कुछ कंपनियां ऐसी भी हैं जो छोटी कंपनियों का अधिग्रहण सिर्फ उन्हें बंद करने के इरादे से ही करती हैं. कई ई-कॉमर्स और टेक स्टार्टअप्स कंपनियां ऐसी ही कुछ चालों का इस्तेमाल करके बाजार में अपनी प्रभावी स्थिति का दुरुपयोग करती नजर आ रही हैं.

उदाहरण के लिये टैक्सी-एग्रीगेटर कंपनी को लेते हैं जिसने टैक्सी-फॉर-श्योर (टीएफएस) कंपनी के अधिग्रहण के मात्र 18 महीनों बाद ही उसे बंद करने का फैसला लिया है. ओला ने टीएफएस को 200 मिलियन डॉलर में अधिग्रहित किया था. संगठित टैक्सी बाजार में आधा दर्जन खिलाड़ी थे जिनमें से ओला और उबर की हिस्सेदारी सबसे बड़ी थी. ओला द्वारा टीएफएस के अधिग्रहण और फिर उसको बंद करने का निर्णय लेने के बाद उबर के रूप में अब बाजार में उसका सिर्फ एक ही गंभीर प्रतियोगी रह गया है.

बड़ी कंपनियों द्वारा छोटी कंपनियों के अधिग्रहण के कई उदाहरण

बीते कुछ वर्षों के दौरान स्टार्टअप के क्षेत्र में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जहां बड़ी कंपनियों ने छोटी कंपनियों का अधिग्रहण किया और फिर कुछ महीनों बाद उन्हें बंद कर दिया. फ्लिपकार्ट ने फरवरी 2012 में बिजली के उपकरणों की फुटकर बिक्री करने वाले लेट्सबाय का अधिग्रहण किया और सिर्फ तीन महीने बाद ही उसे बंद कर दिया.

फ्लिपकार्ट ने ऑनलाइन फैशन के बाजार के दो बड़े खिलाड़ियों- मिंत्रा और जबांग का अधिग्रहण किया है और अब उसके कब्जे में बाजार की 60-70 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. देर-सवेर छोटे खिलाड़ियों को एक बड़े प्रतिस्पर्धी के साथ प्रतिस्पर्धा कठिन लगेगी जिसके चलते उन्हें मजबूरन या तो अपनी दुकान को ताला लगाना पड़ेगा या फिर स्वयं को फ्लिपकार्ट को बेचना पड़ेगा.

इसके अलावा बाजार में ऐसी अफवाहें भी हैं कि साॅफ्टबैंक, कालारी कैपिटल और नेक्सस वेंचर्स का निवेश पाने वाली स्नैपडील भी फ्लिपकार्ट या अमेजन के साथ विलय करने की तैयारी में है. अगर यह सौदा परवान चढ़ता है तो ई-कॉमर्स के क्षेत्र के पूरे बाजार में सिर्फ दो बड़ी और महत्वपूर्ण कंपनियों का अधिपत्य हो जाएगा, फ्लिपकार्ट और अमेजन.

यह सारी तफ्सील ई-कॉमर्स और तकनीकी स्टार्टअप बाजार के दो बड़े खिलाड़ियों द्वारा प्रतियोगिता को सिरे से खत्म करने की एक संभावित रणनीति की ओर इशारा कर रही है जिसके बूते बड़ी कंपनियां कीमतों को तय करने के अलावा निवेशकों से निवेश पाने में अनुचित लाभ ले सकती हैं.

क्या सरकार इन क्षेत्रों में संदिग्ध गतिविधियों (प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा को खत्म करने की) पर रोक लगाने के लिये कुछ कर सकती है?


भारत में प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के नाम से एक कानून

केके शर्मा लॉ ऑफिसिस के चेयरमैन और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के पूर्व अध्यक्ष हैं. वो कहते हैं, ‘जी हां, भारत में प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 (‘अधिनियम’) के नाम से एक प्रतिस्पर्धा कानून है जो किसी भी विलय या अधिग्रहण के फलस्वरूप प्रतिस्पर्धा पर होने वाले किसी भी नकारात्मक असर (एएईसी) पर सवाल उठा सकता है. भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) के पास इस अधिनियम के अंतर्गत यह तय करने के लिये पूरा तंत्र मौजूद है जो यह तय कर सकता है कि कोई भी विलय या अधिग्रहण एएईसी की तरफ जा सकता है या नहीं.’

शर्मा आगे कहते हैं, ‘अगर सीसीआई को ‘प्रथम दृष्टया’ ऐसा लगता है कि कोई भी विलय या अधिग्रहण एएईसी की तरफ जा रहा है तो उसके पास ऐसे विलय या अधिग्रहण के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए जांच प्रारंभ करने की शक्ति मिली हुई है.’

ओला कैब पहले से ही बैंगलोर के टैक्सी बाजार में कथित रूप से कीमतों के संदिग्ध निर्धारण को लेकर सीसीआई की जांच का सामना कर रहा है.

2020 तक ई-कॉमर्स उद्योग के करीब 100 बिलियन डाॅलर के साथ भारतीय इंटरनेट बाजार का सबसे बड़ा हिस्सा बनने की उम्मीद

24 अप्रैल, 2016 को जारी एक आदेश में सीसीआई ने कहा, ‘सामने रखे गए तथ्यों के आधार पर आंकलन किया गया है कि विपक्षी पार्टी को हो रही कमाई की तुलना में ग्राहकों और चालकों को छूट और प्रोत्साहन के रूप में अधिक पैसा खर्च कर रही है.’ असल में यह जांच चेन्नई स्थित फास्ट ट्रैक कॉल कैब प्रा. लि. द्वारा ओला के तहत रेडियो टैक्सी उपलब्ध करवाने वाली एएनआई टेक्नोलॉजीज़ प्रा. लि. के खिलाफ की गई एक शिकायत के बाद प्रारंभ की गई थी.

इससे साफ होता है कि अभी तक सीसीआई ने किसी भी तकनीकी स्टार्टअप के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए कोई जांच प्रारंभ नहीं की है. और शायद वही वजह है कि अबतक बड़ी कंपनियों द्वारा छोटी कंपनियों का अधिग्रहण कर बाद में उन्हें बंद करने का फैसला सवालों के घेरे में नहीं आया है.

दिल्ली के एक वकील नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘इस बात की पूरी संभावना है कि ई-कॉमर्स कंपनियां बाजार में अपनी प्रभावी स्थिति का दुरुपयोग करते हुए छोटी कंपनियों का अधिग्रहण कर संदिग्ध गतिविधियों को अंजाम दे रही हों लेकिन सीसीआई ने अबतक ऐसे सभी विलयों को मंजूरी दी है. असल में कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहा सीसीआई अक्सर किसी भी सौदे को लेकर स्वतः संज्ञान लेकर जांच प्रारंभ नहीं कर पाया है. हालांकि सीसीआई को ई-कॉमर्स क्षेत्र में होने वाले प्रत्येक विलय और अणिग्रहण की गतिविधि पर नजर बनाए रखने की फौरी आवश्यकता है.’

काॅन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 तक ई-कॉमर्स उद्योग के करीब 100 बिलियन डाॅलर के साथ भारतीय इंटरनेट बाजार का सबसे बड़ा हिस्सा बनने की पूरी उम्मीद है. लेकिन ऐसा होना तभी संभव है जब सरकार बाजार में मौजूद छोटे और बड़े सभी खिलाड़ियों के बीच निष्पक्ष और बराबरी की प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता सुनिश्चित कर सके. अन्यथा होगा यह कि पहले इसमें घुसने वाला खिलाड़ी छोटे खिलाड़ियों को गटक जाएगा जिससे इस क्षेत्रों में अबतक हुआ विकास बेमानी हो जाने की पूरी संभावना है.

First published: 21 August 2016, 8:38 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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