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टाटा डोकोमो मामलाः विदेशी निवेशकों नाराज कर सकती है सरकार की नीति

नीरज ठाकुर | Updated on: 3 August 2016, 7:34 IST

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भले ही सरकारी प्रतिनिधि व्यापार को सुगम बनाने, निवेशकों के लिए उपयुक्त माहौल बनाने की कितनी ही बातें कर लें लेकिन जब तक यह सरकारी नीतियों में परिलक्षित नहीं होता तब तक विदेशी निवेशक ऐसी अर्थवयवस्था से दूर ही रहना पसंद करते हैं.

भारत के संदर्भ में देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार एक ही बात दोहराते हैं कि उनकी सरकार विदेशी निवेशकों की भारत में प्रवेश की राह आसान बनाते हुए उनका स्वागत करती है ताकि वे यहां आकर निवेश करें लेकिन वास्तविक स्थिति इसके उलट दिख रही है.

इसका ताजा उदाहरण जापान की सबसे बड़ी मोबाइल कम्पनी एनटीटी डोकोमो है. नवम्बर 2009 में कम्पनी ने भारत की टाटा टेली सर्विसेज में 12,740 करोड़ रूपए का निवेश करके 117 रूपए प्रति शेयर के हिसाब से 26.5 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी थी. इस सौदे में तय किया गया था कि अगर डोकोमो पांच साल के अंदर टाटा का साथ छोड़ देती है तो इससे इसकी हिस्सेदारी के लिए लगाई गई कीमत का आधा लौटा दिया जाएगा.

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अब इसके दो तरीके हो सकते थे. या तो जापानी कम्पनी डोकोमो की 26.5 प्रतिशत हिस्सेदारी का बाजार की कीमत पर कोई खरीददार मिल जाए या भारतीय साझेदार इन शेयरों को निवेश की असल कीमत से आधे दाम में खरीद ले, इनमें से जो भी ज्यादा हो.

2014 में टाटा ने कुल 7250 करोड़ रूपए में डोकोमो का हिस्सा खरीदने का निर्णय लिया था और इसके लिए रिजर्व बैंक की इजाजत मांगी थी.

बड़ी बात निवेश में किए गए अनुबंधों में तय समुचित प्रतिबद्धता और उसके संरक्षण की है न कि किसी तयशुदा नतीजे की

अंतरराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ प्रतिबद्धता के महत्व को समझते हुए आरबीआई टाटा द्वारा डोकोमो के शेयर खरीदने के पक्ष में था जबकि एनडीए सरकार के वित्त मंत्रालय ने इसमें विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (फेमा) का अड़ंगा लगा दिया जबकि बात दो कम्पनियों के बीच की थी. सरकारी दखल की जरूरत ही नहीं थी.

बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार वित्त मंत्रालय को भेजे एक संदेश में आरबीआई ने कहा है कि ‘टाटा समूह को डोकोमो के शेयर 58 रूपए प्रति शेयर के हिसाब से खरीदने की अनुमति दे देनी चाहिए जबकि कम्पनी के आकलन कर्ताओं द्वारा इसकी कीमत 23.34 रूपए प्रति शेयर आंकी गई है, जो कि 60 प्रतिशत कम 

आरबीआई ने अपने एक संदेश में कहा, यहां बड़ी बात निवेश के संबंध में किए गए अनुबंधों में तय समुचित प्रतिबद्धता और उसके संरक्षण की है न कि किसी तयशुदा नतीजे की. इसके अलावा एफडीआई के संदर्भ में जापान के साथ हमारे संबंधों को भी ध्यान में रखना होगा. इसलिए हमें टाटा का प्रस्ताव मान लेना चाहिए.

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हालांकि वित्त मंत्रालय ने फेमा का हवाला देते हुए इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया. नतीजतन जापानी फर्म ने टाटा समूह को अंतरराष्ट्रीय विवाद निपटान अधिकरण में घसीटा और समूह पर 1.17 अरब डाॅलर का जुर्माना लगा दिया गया. इस पर अंतरराष्ट्रीय अधिकरण का सम्मान करते हुए आरबीआई ने एक बार फिर इस मामले से फेमा हटाने की मांग की.

खैर राजग सरकार का वित्त मंत्रालय भी वही गलती दोहराना चाहता है, जिसके लिए यूपीए सरकार को आलोचना का शिकार होना पड़ा था. यूपीए सरकार को इस बात के लिए आलोचना झेलनी पड़ी थी कि उसने ब्रिटिश टेलीकाॅम कम्पनी वोडाफोन पर अनावश्यक व्यापार कर लगा दिया था.

वित्तमंत्री अरूण जेटली ने 2014 के बजट भाषण में कहा था कि उनकी सरकार ऐसे दिखावटी करों की पक्षधर नहीं है

वित्तमंत्री अरूण जेटली ने 2014 के बजट भाषण में कहा था कि उनकी सरकार ऐसे दिखावटी व्यपारिक करों की पक्षधर नहीं है और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के अपने निर्णय पर अडिग है. उन्होंने यह भी कहा था कि वोडाफोन कर मामले का कानूनी समाधान निकाला जाएगा.

डोकोमो मामले में जब एक अंतरराष्ट्रीय अदालत ने कम्पनी के पक्ष में फैसला दे दिया है, उसके बावजूद एनडीए सरकार द्वारा इस मामले में दिखाई जा रही हठधर्मिता से लग रहा है विदेशी निवेशकों के प्रति एनडीए सरकार और यूपीए सरकार के रवैये में कोई फर्क नहीं है.

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टाटा डोकोमो मामले में तो मौजूदा एनडीए सरकार पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की प्रतिकृति ही नजर आ रही है. बात जब विदेशी निवेशकों को भगाने की हो तो सभवतः यह सरकार एककदम आगे नजर आती है.

First published: 3 August 2016, 7:34 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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