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ब्रेग्जिट के बाद अब क्या करेंगे निवेशक?

अभिषेक पराशर | Updated on: 24 June 2016, 16:55 IST
QUICK PILL
  • ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से बाहर होने के बाद निवेशकों के सामने अब दो ही विकल्प होंगे. या तो वह अपने निवेश को निकाल लेंगे या फिर कुछ दिनों तक निवेश से परहेज करेंगे. 
  • ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से बाहर होने का असर इंफोसिस, टीसीएस और एचसीएल जैसी बड़ी आईटी कंपनियों के राजस्व पर पड़ेगा. इन कंपनियों के कुल राजस्व का करीब एक तिहाई यूरोपीय यूनियन के बाजार से आता है.
  • ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से अलग होने के बाद ब्रिटेन के निवेशक अब भारत बनाम ईयू के अन्य देशों के रियल एस्टेट से मिलने वाले रिटर्न और उसके जोखिम की तुलना करेंगे. ईयू से बाहर निकलने के बाद ग्रीस, स्पेन और पुर्तगाल जैसी जगह ब्रिटेन के निवेशक के लिए आकर्षक नहीं होंगे और इसका फायदा भारत को मिल सकता है.

ब्रिटेन अब यूरोपीय यूनियन (ईयू) से बाहर हो चुका है. निवेशकों के लिए यह बुरी खबर है और निवेश को लेकर उनका जोखिम बढ़ गया है. ऐसे में निवेशकों के सामने अब दो ही रास्ता होगा. या तो वह अपने निवेश को निकालेंगे या फिर कुछ दिनों तक ऐसा करने से परहेज करेंगे. 

ब्रिटेन के ईयू से बाहर होने के पहले तक साल 2016 एफडीआई निवेश के लिहाज से भारत के रियल एस्टेट के लिए ठीक लग रहा था लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं. बेहतर पूंजी प्रवाह और झटका खाने की शक्ति रखने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था रियल एस्टेट कारोबार के लिए ठीक रही है. 

ब्रेग्जिट से हालांकि भारत के रियल एस्टेट पर बड़ा असर नहीं होगा क्योंकि ब्रिटेन की कंपनियों की ऑफिस स्पेस में हिस्सेदारी महज 5-7 फीसदी के बीच है.

जेएलएल के कंट्री हेड अनुज पुरी के मुताबिक, 'ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से अलग होने के बाद ब्रिटेन के निवेशक अब भारत बनाम ईयू के अन्य देशों के रियल एस्टेट से मिलने वाले रिटर्न और उसके जोखिम की तुलना करेंगे. ईयू से बाहर निकलने के बाद ग्रीस, स्पेन और पुर्तगाल जैसे जगह ब्रिटेन के निवेशक के लिए आकर्षक नहीं होंगे और इसका फायदा भारत को मिल सकता है.'

पुरी ने कहा कि निवेशक कुछ समय तक इंतजार करेंगे क्योंकि उन्हें तुलनात्मक रूप से रिटर्न और रिस्क के अनुपात को समझने में थोड़ा समय लगेगा. 

ऐसी स्थिति में निवेश सबसे पहले उन सेक्टर्स से बाहर निकलेंगे जो उन्हें जोखिम भरा नजर आएगा. भारत के स्टॉक मार्केट के प्रदर्शन को देखते हुए रियल एस्टेट हाल तक जोखिम भरा क्षेत्र समझा जाता था लेकिन आरईआरए और अन्य सुधारों के बाद से इसने रफ्तार पकड़ ली है. 

जोखिम को देखते हुए रियल्टी स्टॉक पर कुछ समय के लिए बिकवाली का असर दिख सकता है क्योंकि निवेशक एफएमसीजी और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में पैसा लगा सकते हैं.

आईटी कंपनियों पर कितना होगा असर

ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से बाहर होने का असर इंफोसिस, टीसीएस और एचसीएल जैसी बड़ी आईटी कंपनियों के राजस्व पर पड़ेगा. इन कंपनियों के कुल राजस्व का करीब एक तिहाई यूरोपीय यूनियन के बाजार से आता है.

आईटी सेक्टर हर साल भारत में सबसे ज्यादा ऑफिस स्पेस की बुकिंग कराता है. 2015 में कई यूरोपीय रिटेलर्स ने अपनी विस्तार रणनीति के तहत नए बाजारों का रुख किया. 

पुरी ने कहा, '2016 में भी हमें ऐसा होने की उम्मीद है. लेकिन अगर यूरोपीय यूनियन का आर्थिक परिदृश्य कमजोर होता है तो कंपनियों की विस्तार रणनीति को झटका लग सकता है. ऐसी स्थिति का सीधा असर रियल एस्टेट बाजार पर पड़ेगा.'

सरकार ने पिछले दो सालों में कई सुधारों को आगे बढ़ाया है. साथ ही महंगाई को भी काबू में करने में मदद मिली है. इसके अलावा बेहतर मानसून की भविष्यवाणी ने आने वाले दिनों में बेहतर ग्रामीण ग्रोथ की उम्मीद जताई है. ऐसे में ब्रेक्जिट के बाद भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.

ब्रिटेन के बाहर होने के साथ ही आने वाले दिनों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों में कटौती करने की संभावना कम हो गई है. यह भारत समेत अन्य विकासशील देशों के लिए बेहतरीन खबर है. ब्रिटेन के साथ भारत के द्विपक्षीय कारोबार में भारत से होने वाला निर्यात अधिक है. हालांकि आने वाले दिनों में निर्यात लागत में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है. 

2015-16 में ब्रिटेन के साथ भारत का व्यापार 94 हजार 300 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 59 हजार 100 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ जबकि आयात की रकम 34 हजार 700 करोड़ रुपये रही.

भारतीय कंपनियां ब्रिटेन के जरिये ही यूरोप में प्रवेश करती हैं. अब ब्रिटेन के अलग होने के बाद उन्हें यूरोप के देशों के साथ नए सिरे से करार करने होंगे. यह कंपनियों के खर्च को बढ़ाएगा और उन्हें कई तरह की नियामकीय दिक्कतों का भी सामना करना होगा.

भारतीय कंपनियां ब्रिटेन के जरिये ही यूरोप में प्रवेश करती हैं

2015-16 में ब्रिटेन के साथ भारत का व्यापार 94 हजार 300 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 59 हजार 100 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ जबकि आयात की रकम 34 हजार 700 करोड़ रुपये रही.

भारतीय कंपनियां ब्रिटेन के जरिये ही यूरोप में प्रवेश करती हैं. अब ब्रिटेन के अलग होने के बाद उन्हें यूरोप के देशों के साथ नए सिरे से करार करने होंगे. यह कंपनियों के खर्च को बढ़ाएगा और उन्हें कई तरह की नियामकीय दिक्कतों का भी सामना करना होगा.

भारत को अब ब्रिटेन के साथ जहां नई शर्तों पर करार करना होगा वहीं ईयू से बाहर होने की स्थिति में ब्रिटेन को भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपने व्यापार को बढ़ाने का दबाव होगा.

जब अमेरिकी में मंदी आई थी तब भारतीयों ने इस मौके का फायदा उठाकर वहां प्रॉपर्टीज में निवेश किया.अब पॉन्ड 31 सालों के निचले स्तर पर है. इससे आने वाले दिनों में ब्रिटेन के प्रॉपर्टीज में निवेश बढ़ने की संभावना है. लंदन हमेशा से ही भारतीयों विशेषकर एचएनआई और कारोबारी घरानों के लिए पहली पसंद रहा है. ऐसे कारोबारी और कंपनियां इस मौके का फायदा उठाकर ब्रिटेन में निवेश करने से नहीं चूकेंगी.

First published: 24 June 2016, 16:55 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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