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खुदरा महंगाई की दर में गिरावट अच्छी नहीं बुरी खबर है

अभिषेक पराशर | Updated on: 14 December 2016, 12:18 IST
(एएफपी)

आम तौर पर मुद्रास्फीति यानी महंगाई की दर में गिरावट का स्वागत होता है, लेकिन नवंबर माह की महंगाई दर में गिरावट चिंता का सबब होनी चाहिए. आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक लिए गए नोटबंदी के फैसले से अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की पहली आधिकारिक झलक अब सामने आ चुकी है.

नवंबर महीने में खुदरा महंगाई दर का दो सालों के न्यूनतम स्तर पर आना स्वाभाविक नहीं बल्कि एक कृत्रिम बदलाव है, जिसकी वजह अचानक से लिए गए नोटबंदी के फैसले के बाद मांग में आई तेज गिरावट है. नवंबर महीने में खुदरा महंगाई दर 3.63 फीसदी रही है जो नवबंर 2014 के बाद से सबसे कम है.

नोटबंदी के बाद से देशभर में छोटे उद्योग, बाजार, मंडी, असंगठित क्षेत्र और छोटी कंपनियों में काम प्रभावित हुआ है. इसका असर नवंबर महीने की खुदरा महंगाई दर के आंकड़ों पर साफ दिख रहा है.

500 और 1000 रुपये के नोट बैन किए जाने के फैसले से आम लोगों के आय और खर्च में जबरदस्त कटौती हुई है जिसकी वजह से उपभोक्ता मांग में तेज गिरावट आई है. नवंबर महीने में महंगाई दर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुमान से भी कम है.

फिच ने वित्त वर्ष 2016 के लिए 7.4 फीसदी जीडीपी के अनुमान को संशोधित करते हुए 6.9 फीसदी कर दिया है.

आरबीआई ने मार्च 2017 के लिए खुदरा महंगाई दर का लक्ष्य चार फीसदी रखा है. बैंकों में करीब 12.50 लाख करोड़ रुपये की नकदी आने और खुदरा महंगाई दर के चार फीसदी से नीचे रहने का अनुमान आरबीआई को अगली समीक्षा बैठक में ब्याज दरों में कटौती के लिए मजबूर करेगा. बाजार एवं उद्योग ने अभी से इसकी उम्मीद लगानी शुरू भी कर दी है.

हालांकि खुदरा महंगाई में आई कमी मांग में हुई स्वाभाविक गिरावट या फिर आपूर्ति के मोर्चे पर अचानक हुए सुधार से नहीं जुड़ी है. बल्कि यह नकदी नहीं होने (जमा धन होने के बावजूद खर्च नहीं कर पाने की विवशता) के कारण मांग में आई गिरावट है.

हाल ही में आए एक सर्वे ने इस बात पर मुहर लगाई थी कि नोटबंदी के बाद देश में आमदनी और खर्च में कमी आई है. लोकल सर्कल्स के सर्वे में देश के 220 जिलों में करीब 15,000 लोगों की राय ली गई थी. सर्वे में शामिल लोगों ने इस बात को स्वीकार किया कि नोटबंदी के बाद खरीदने की क्षमता होते हुए भी नकदी किल्लत के कारण उनके खर्च में कमी आई है.

नोटबंदी के बाद मॉर्गन स्टैनली और बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच और फिच जैसी रेटिंग एजेंसी ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए भारत के जीडीपी ग्रोथ के अनुमान में कटौती की है. मॉर्गन स्टैनली और बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच 2016 के लिए भारत के जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 7.7 फीसदी से घटाकर 7.4 फीसदी कर चुकी है.

इतना ही नहीं एजेंसी ने 2018 के ग्रोथ रेट के अनुमान को भी 7.8 फीसदी से कम कर 7.6 फीसदी कर दिया है. वहीं फिच ने वित्त वर्ष 2016 के लिए 7.4 फीसदी जीडीपी के अनुमान को संशोधित करते हुए 6.9 फीसदी कर दिया है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) भी मौजूदा वित्त वर्ष के लिए जीडीपी के अनुमान को 7.6 फीसदी से घटाकर 7.1 फीसदी कर चुका है.

खतरे में ग्रामीण अर्थव्यवस्था

नोटबंदी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है. नवंबर महीने में दोपहिया वाहनों की बिक्री में आई गिरावट इसकी पुष्टि करता है. इसके अलावा लोकल सर्कल्स का सर्वे भी बताता है कि कुछ राज्य अन्य की तुलना में अधिक प्रभावित हुए हैं. बिहार, झारखंड और ओडिशा में लोगों की आय में गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पश्चिम बंगाल तथा केरल से अधिक की गिरावट आई है. जबकि महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश तथा पंजाब में अधिक लोगों ने खर्च घटाया है.

बेशक कालाधन का बढ़ना महंगाई को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार होता है. लेकिन यह महंगाई बढ़ाने के कई कारणों में से महज एक कारण होता है. एक अनुमान के मुताबिक देश में करेंसी के रूप में मौजूद कालाधन कुल काले धन का महज 6 फीसदी है. हालांकि बैंकों में 500 और 1000 रुपये के नोटों में जमा हुई रकम को देखकर यह कहा जा सकता है कि नोटबंदी की मदद से काले धन को अर्थव्यवस्था से बाहर करने की मुहिम पूरी तरह पटरी से उतरती नजर आ रही है.

इकनॉमी से बाहर नहीं निकला काला धन

भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी की कवायद के बाद बैंकिंग सिस्टम में करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये वापस नहीं आने की उम्मीद जताई गई थी. लेकिन 10 दिसंबर तक बैंकों के पास करीब 12.50 लाख करोड़ रुपये की करेंसी जमा हो चुकी है. एसबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक 14.18 लाख करोड़ रुपये की रकम 500 और 1000 रुपये के नोटों में थी, जिसमें बैंकों के पास जमा रकम शामिल नहीं है. वहीं अमान्य हो चुके 500 और 1000 रुपये की रकम जमा कराने की आखिरी तारीख 30 दिसंबर तक है.

नोटबंदी का सीधा असर उपभोक्ता बाजार पर हुआ है. उपभोक्ताओं को नकदी संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिसका असर उपभोक्ता सामानों की खरीदारी पर पड़ा है और इसकी वजह से खुदरा महंगाई दर एक झटके में 4 फीसदी से नीचे चली गई जबकि आरबीआई ने मार्च 2017 तक के लिए 4 फीसदी महंगाई दर का लक्ष्य रखा था. हालांकि सरकार ने इस लक्ष्य को महज एक महीने में हासिल कर लिया.

दो सालों के सूखे के बाद इस बार बेहतर मानसून की वजह से आपूर्ति के मोर्चे पर स्थिति सुधरने की उम्मीद थी लेकिन नोटबंदी की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को खाद और बीज खरीदने में दिक्कतों का सामना कर रहा है. आरबीआई भी सर्दी की फसल पर नोटबंदी की आशंका जता चुका है. वहीं शहरी इलाकों में बैंकों में लगी लंबी कतार कर्मचारियों की उत्पादकता को प्रभावित कर रही है.

दरअसल बेहतर मॉनसून की स्थिति आपूर्ति और मांग के बीच बने असंतुलन को पाटने का काम करती और इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्र में मांग की स्थिति बनती, जिसका फायदा देश की अर्थव्यवस्था को मिलता. लेकिन नोटबंदी ने इस संभावना को कमजोर कर दिया है. खासकर वैसी स्थिति में जब देश के भीतर ही नहीं बल्कि पूरे एशिया प्रशांत क्षेत्र के ग्रोथ रेट के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि को अहम माना जा रहा था.

(अभिषेक पराशर के ब्लॉग से साभार)

First published: 14 December 2016, 12:18 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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