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7.9% विकास दर के दावे पर भी कहीं लेना न पड़ जाए यू-टर्न

नीरज ठाकुर | Updated on: 3 June 2016, 13:13 IST
(कैच)

जब सरकार द्वारा जारी हर प्रेस रिलीज में 'अच्छे दिन' की सूचना दी जाने लगे तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगते हैं. भारत सरकार का सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) पिछले एक साल से यही कर रहा है.

एमओएसपीआई भारतीय अर्थव्यवस्था जुड़े आंकड़े जारी करता है. अर्थशास्त्री और ब्रोकरेज फर्म के आर्थिक विश्लेषक इस आंकड़े पर ही भरोसा करते हैं. 

सेवाओं नहीं उपभोक्ताओं को बढ़ाने में लगी हैं टेलीकॉम कंपनियां

लेकिन पिछले एक सालों में मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकड़े विवादों में रहे हैं. यहां तक कि रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन तक ने मंत्रालय द्वारा पिछले साल के विकास आंकड़े को समझने में असमर्थता जताई.

एमओएसपीआई ने वित्त वर्ष 2015-16 की चौथी तिमाही के आंकड़े जारी करते हुए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की अनुमानित दर 7.9% बताई है. अर्थशास्त्रियों के लिए इस आंकड़े पर यकीन करना मुश्किल हो रहा है लेकिन सरकारी अधिकारियों ने बगैर कोई देर किए एक-दूसरे की पीठ थपथपाने लगे. 

नीति आयोग के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने ट्वीट किया, "2015-16 की चौथी तिमाही की विकास दर 7.9 %, 8% का जादूई आंकड़ा लगभग छू लिया. अच्छे दिन आने वाले हैं."

दावे की पोल

हालांकि 24 घंटे के भीतर ही अर्थिक विशेषज्ञ मानस चक्रवर्ती ने एक लेख में सरकार के दावे की पोल खोल दी. चक्रवर्ती ने अपने लेख में  स्पष्ट किया कि जीडीपी में ये उछाल 'डिस्क्रिपेंसीज' में बढ़ोतरी से आई है.

चक्रवर्ती ने साफ किया कि मार्च 2016 में ये 'डिस्क्रिपेंसीज' 1,43,210 करोड़ थी, जबकि मार्च 2015 में वो 29,933 करोड़ थी. 

चक्रवर्ती के अनुसार अगर इसको ध्यान में रख जाए तो 'नियत मूल्य' पर चौथी तिमाही की जीडीपी में केवल 3.9 % ही वृद्धि होगी.

आर्थिक जानकार मानस चक्रवर्ती ने स्पष्ट किया कि जीडीपी में ये उछाल 'डिस्क्रिपेंसीज' में बढ़ोतरी से आई है

वहीं सरकारी आंकड़े का बचाव करते हुए टीसीए अनंत ने बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार से कहा, "जीडीपी का मुख्य अनुमान उत्पादन पक्ष के आधार पर किया जाता है, न कि व्यय पक्ष के आधार पर. डिस्क्रिपेंसीज व्यय पक्ष में आती है. इसलिए आर्थिक विकास की आलोचना करने वालों को टाइम सिरीज के बारे में जानकारी होनी चाहिए. लोगों के लिए नई और पुरानी दोनों सिरीज के आंकड़े देखना मुश्किल नहीं है. पहले भी कई बार प्रोविजनल या रिवाइज्ड अनुमान में इतनी या इससे अधिक डिस्क्रिपेंसीज आती रही हैं."

हालांकि अनंत का तर्क गले से नहीं उतरता. ये कहना शायद तर्कसंगत नहीं है कि खपत पक्ष के बजाय व्यय में डिस्क्रिपेंसीज होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. 

 डिस्क्रिपेंसीज चाहे उत्पादन पक्ष में हो या व्यय पक्ष में इससे डाउनवर्ड रिवीजन की आशंका रहती है. पिछले एक साल में कार्पोरेट बिक्री में बढ़ोतरी नहीं हुई है इसलिए इस बात की ज्यादा संभावना है कि 1,43,210 करोड़ की डिस्क्रिपेंसीज को डाउनवर्ड रिवीजन करना पड़े.

सरकार का पिछला रिकॉर्ड

पिछले एक साल में सरकार पहले भी कई सेक्टर में डाउनवर्ड रिवीजन करती रही है.

सरकार ने इस साल फरवरी में वित्त वर्ष 2015-16 की तीसरी तिमाही के मैन्यूफैक्चरिंग के ग्रॉस वैल्यू एडिशन (जीवीए) में 12.6% की दर से वृद्धि की बात कही थी. इस आंकड़े पर लोगों ने शंका जताई थी क्योंकि तीसरी तिमाही में चेन्नई में आई बाढ़ के कारण उत्पादन काफी प्रभावित हुआ था. 

खरीफ फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को मंजूरी

सोमवार को जारी ताजा आंकडों के अनुसार सरकार ने पिछले वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में जीवीए को घटाकर 11.3% कर दिया. हालांकि ये आंकड़ा भी अक्तूबर से दिसंबर तक के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की सही तस्वीर नहीं दिखाता है.

पिछले वित्त वर्ष के जुलाई-सितंबर तिमाही में कृषि सेक्टर में 2.2% की वृद्धि की बात कही गई जबकि भारत का बड़ा हिस्सा सूखे से पीड़ित था. हाल ही सरकार द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार ये दर  2 % ही रही थी.

अन्य उदाहरण

इसके अलावा सोमवार को बिजली, गैस और वाटर सप्लाई का जीवीए में पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में 9.3% रहा. जबकि उससे पहले की चौथी तिमाही में ये दर 4.4% थी.

लेकिन सरकार की इन सेक्टर की दो सबसे बड़ी कंपनी एनटीपीसी और कोल इंडिया लिमिटेड के आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं. देश में बिजली के सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी के कुल मुनाफे में मांग की कमी के कारण 7.73 % की कमी आई है. वहीं कोल इंडिया के मुनाफे में केवल 0.22% की बढ़ोतरी हुई है.

बिजली, गैस और जलापूर्ति सेक्टर में भी सरकार ने जो अनुमानित विकास दर बताई है वो हकीकत में कम हो सकती है

कोल इंडिया का मुनाफा इतना कम होने के कारण बिजली कंपनियों में कोयले की मांग का कम होना है.

जिस तरह सरकार पिछले वित्त वर्ष की पहली तीन तिमाहियों की अनुमानित विकास दर पहले काफी अधिक बताकर बाद में उसे कम करती रही है, उसी तरह अगले कुछ महीनों में चौथी तिमाही की दर भी संशोधित करे. और तब ये पता चलेगा कि इस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था ने उतना विकास नहीं किया जितने का अनुमान था.

हालांकि अनुमानित आंकड़ों को ढोल पीटने वाली सरकार असली आंकड़े आने पर चुप लगा जाती है. जाहिर है हाथी के दिखाने के दांत और खाने के दांत अलग-अलग होते हैं.

First published: 3 June 2016, 13:13 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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