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नई परियोजनाओं पर कैंची चलाएं प्रभु

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 February 2016, 9:45 IST
QUICK PILL
  • रेलवे में लंबे समय से बड़े सुधारों की मांग की जाती रही है. हालांकि वादों के बावजूद इस दिशा में अभी तक कोई फैसला नहीं किया जा सका है.
  • जब तक किसी परियोजना के मद में दी गई रकम का पूरा इस्तेमाल नहीं कर लिया जाता है तब तक और रकम नहीं जारी की जानी चाहिए. केवल पैसा रिलीज करना और काम नहीं होने की संस्कृति पर रोक लगाई जानी चाहिए.

भारतीय रेलवे बहुत बड़ी और पुरानी कंपनी है. जैसा कि अक्सर इस तरह के संस्थानों के साथ होता है वह समय के साथ पुराने पड़ जाते हैं और उनका संगठन जड़ता का शिकार हो जाता है. इसके साथ ही लोगों का निहित स्वार्थ भी बढ़ता चला जाता है. 

रेलवे में संगठित श्रम, प्रोफेशनल मैनेजमेंट और राजनीतिक नेतृत्व के निहित स्वार्थ हैं. इतना ही नहीं रेलवे राजनीति का बड़ा हथियार बन चुका है. कई बड़ी परियोजनाओं का आवंटन चुनावी फायदों और क्षेत्रों को ध्यान रखकर किया जाता है.

हालांकि पीएसयू कंपनी को लेकर जुड़ी कई चिंताओं के बावजूद रेलवे का प्रदर्शन शानदार रहा है. रेलवे एक लिहाज से अपवाद रहा है. अपने आकार और दायरे की वजह से रेलवे एक बड़ी कंपनी है और यह वह ताकत देती है जिसका इस्तेमाल आप आगे आने वाले समय में कर सकते हैं. 

पहले रेलवे को कुछ जरूरी सवालों का जवाब देना होगा. मसलन यह एक व्यावसायिक ईकाई है जिसकी सार्वजनिक जिम्मेदारी है. तो फिर सार्वजनिक जवाबदेही कहां खत्म होती है और कहां से व्यावसायिक जवाबदेही की शुरुआत होती है.

जब सरकार से बजटीय सहयोग की मांग की जाती है तो व्यावसायिक पहलू को लेकर बात की जाती है. जब किराए में बढ़ोतरी की जाती है तब रेलवे की सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर विमर्श किया जाने लगता है. रेलवे का वित्त हमेशा से ही लुंज-पुंज तरीके से संचालित होता रहा है. अभी भी रेलवे पुराने अकाउंटिंग सिस्टम पर भरोसा करता है जो आधुनिक प्रक्रिया से दूर है.

सुधार होना बाकी

कई समिति और बजट भाषणों में मंत्रियों ने अकाउंटिंग सिस्टम का आधुनिकीकरण किए जाने का जिक्र किया लेकिन अभी तक यह नहीं हो पाया है. अक्सर वित्त के वैकल्पिक स्रोतों का जिक्र किया जाता है लेकिन इसे साफ-सुथरी बैलेंस सीट के बिना कैसे हासिल किया जा सकता है.

घाटे में चल रही कंपनियों में पैसा लगाए जाने को लेकर भी चर्चा की जाती रही है तो ऐसे में रेलवे वित्तीय तौर पर अव्यावहारिक होने का विकल्प उठा नहीं सकता. इसके साथ आंतरिक तौर पर भी व्यवस्था को सुधार किए जाने की जरूरत है. 

जैसा कि रेल मंत्री ने पिछले बजट सत्र में कहा था कि विनिवेश नहीं होने की वजह से समस्या हो रही है और इसकी वजह से क्षमता में बढ़ोतरी किए जाने में मदद नहीं मिल पा रही है. इससे न केवल सुरक्षा पर असर पड़ा है बल्कि सेवाओं की गुणवत्ता पर भी असर पड़ा है.

हालांकि इसके बावजूद रेलवे अपने प्रोजेक्ट में निवेश कर रहा है . पिछले बजट में एक रेलवे यूनिवर्सिटी बनाने की भी घोषणा की गई थी.

काम होता रहेगा?

राजनतिक बाध्यता और नौकरशाही जटिलताओं की वजह से संसाधनों की बर्बादी हुई है. मौजूदा सरकार ने इस बर्बादी के खिलाफ कड़ा रुख लिया है.  

ऐसे में सबसे बड़ी जरूरत नई परियोजनाओं को खत्म कर उसे रेलवे की जरूरतों और तात्कालिक प्राथमिकताओं के मुताबिक बनाया जाना चाहिए. इससे निहित स्वार्थों के लोगों को झटका लगेगा.

हल्की प्रगति के साथ रेलवे साल दर साल डिलीवर करने में सफल रही है. सामान्य तौर पर हर साल नए ट्रेन चलाए जाते हैं और फ्रेट भाड़ा में बढ़ोतरी होती है. इसके अलावा टिकट बुकिंग और रिफंड की प्रक्रिया को आसान और सस्ता बनाया गया है.

हालांकि अगर लंबे समय के लिहाज से काम करना है तो धीरे-धीरे वाली व्यवस्था से कोई सुधार नहीं होगा. शुरुआत करते हुए पहले सभी खर्चों को तार्किक बनाया जाना चाहिए और परियोजनाओं को लागू किए जाने की दिशा में लोगों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए. इसके अलावा जब तक किसी परियोजना के मद में दी गई रकम का पूरा इस्तेमाल नहीं कर लिया जाता है तब तक और रकम नहीं जारी की जानी चाहिए.

केवल पैसा रिलीज करना और काम नहीं होने की संस्कृति पर रोक लगाई जानी चाहिए. जवाबदेही को केवल रोजाना के काम तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए. रेलवे को इस तरह के सुधारों की सख्त जरूरत है लेकिन क्या सुरेश प्रभु इसे करने को तैयार है? हमें जल्द ही इस बारे में पता चल जाएगा. 

First published: 18 February 2016, 9:45 IST
 
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