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एच-1बी पॉलिसी से अंतरराष्ट्रीय ट्रेड की नई इबारत लिख रहे हैं ट्रंप

नीरज ठाकुर | Updated on: 8 May 2017, 9:45 IST
(AFP)

अगले कुछ सालों में भारत की दूसरी सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस 10 हजार अमरीकियों को नौकरी देगी. कंपनी का यह फैसला डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की अतिकुशल कर्मियों को लेकर सख्त एच—1बी पॉलिसी और उनके लिए अधिक वेतन तय किये जाने का नतीजा है. इंफोसिस की घोषणा से इसकी पुष्टि होती है कि अगर कोई देश ऐसा करता है तो वह स्थानीय कामगरों के लिए नौकरियां सुनिश्चित कर सकता है और कंपनियों से ऐसा कराने के लिए उन पर ज्यादा दबाव डालने की जरूरत नहीं होती. साथ ही इससे यह भी सिद्ध होता है भारतीय आईटी इंजीनियर दुनिया के आईटी ईकोसिस्टम के लिए अपरिहार्य नहीं हैं.

लंबे समय से भारतीय आईटी कंपनियां यह तर्क देती आ रही हैं कि वे भारती इंजीनियरों को उनके कौशल के लिए नौकरी देती हैं,लेकिन अगर इंफोसिस अगले दो साल में 10 हजार अमरीकियों को नौकरी देने जा रही है तो इसका आशय तो यही है कि विदेश में भारतीयों को नौकरी देने के पीछे सबसे बड़ा कारण अमरीकियों की तुलना में उनका कम वेतन था उनका उच्च कौशल नहीं.

 

अमरीका को फायदे से भारत को दर्द

अमरीका में प्रत्येक एक अमरीकी को नौकरी देने के पीछे एक भारतीय इंजीनियर देश में बेराजगार बैठा होगा. इंफोसिस जैसी कंपनियां इस कारण से उनके प्रॉफिट मार्जिन पर आने वाले असर से निपट भी सकती हैं पर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इस स्थिति से निपटना इतना आसान नहीं होगा.

आज भारत की सबसे बड़ी समस्या नये रोजगार पैदा करना है. भारत के रोजगार बाजार में हर साल 10 लाख से अधिक लोग प्रवेश कर रहे हैं. यद्यपि इंजीनियर भारत के श्रम बल का एक छोटा सा हिस्सा ही हैं पर वे भारत के मध्यम वर्ग का बड़ा हिस्सा गठित करते हैं, जो कि अब नकारात्मक रूप से प्रभावित होगा.

 

भारत के रेमिटेंस पर नकारात्मक असर

भारत दुनिया में सबसे अधिक विदेश से भेजा हुआ पैसा पाने वाला देश है. दुनिया की अर्थव्यवस्था में मंदी के चलते वर्ष 2016 में यह रेमिटेंस 9 प्रतिशत घटकर 62 बिलियन डॉलर रह गया. विदेशों में काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजा गये इस पैसे से भारत को अपने भारी व्यापार घाटे से निपटने में मदद मिलती है जो कि 2015—16 में 118 बिलियन डॉलर था.

यह देखते हुए कि भारत के कामगर सिर्फ अमरीका में ही नहीं खाड़ी देशों में भी नौकरियां गंवा रहे हैं, इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले दिनों में भारत को मिलने वाले इस रेमिटेंस और भी कमी आए.

 

क्या भारत में इसमें कुछ कर सकता है?

भारत की वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमन ने 20 अप्रेल को यह संकेत दिए थे कि अगर अमरीका एच—1बी वीजा पर अपना रवैया नहीं बदलता है तो भारत प्रतिक्रिया में अमरीका की कंपनियों को उसकी भारत स्थित सहायक कंपनियों द्वारा दी जाने रॉयल्टी पर पाबंदियां लगा सकता है. पर जानकारों ने तुरंत इस पर यह आगाह किया था कि वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन का सदस्य होने के नाते भारत के लिए यह विकल्प काफी मुश्किल होगा.

अमरीका और दूसरे देश अपनी वीजा नीति में बदलाव यह सुनिश्चित करने के लिए ला रहे हैं कि भारत जैसे देश उनके यहां अपनी श्रम शक्ति का निर्यात नहीं कर सकें. इसके विपरीत अगर भारत द्वारा अमरीका की सहायक कंपनियों को उनकी मूल कंपनी के लिए रॉयल्टी भुगतान पर रोक लगाई जाती है तो यह डब्ल्यूटीओ कन्वेंशन के उल्लंघन का मामला बनेगा.

 

ग्लोबलाइजेशन से दूर जाती दुनिया में भारत के लिए डब्ल्यूटीओ का महत्व

भारत 1948 में स्थापित गैट यानी जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड तथा 1995 में स्थापित डब्ल्यूटीओ का संस्थापक सदस्य है. सामानों के निर्यात में भारत के हित निहित हैं. लेकिन दुनिया के अन्य विकासशाल देशों की तरह भारत का बड़ा हित इसमें भी है श्रमशक्ति और लोगों की आवाजाही भी रहे.

लेकिन गैट और डब्ल्यूटीओ में विकसित देशों के वर्चस्व के कारण इन संगठनों ने सामानों की आवाजाही में आने वाले गतिरोधों को हटाने पर तो ध्यान केंद्रित किया है पर लोगों की आवाजाही पर नहीं. डब्ल्यूटीओ के दौर में भारत को लोगों की आवाजाही के मामले में कोई लाभ नहीं हुआ पर उसे सामानों की आवाजाही से कुछ हद तक फायदा हुआ है. और अब विकासशील देशों से श्रमशक्ति की मुक्त आवाजाही को रोकने लिए विकसित देश संरक्षणवादी उपायों को अपना रहे हैं.

विदेश व्यापार और डब्ल्यूटीओ मामलों के एक विशेषज्ञ डीके नायर के अनुसार “डब्ल्यूटीओ और गेट ने सामानों की आवाजाही पर आने वाली बाधाओं को हटाने पर ही अपना ध्यान केंद्रित किया है, जिसका अधिकांश फायदा विकसित देशों को ही हुआ है. हमें यह समझना होगा कि विकासशील देश प्राय: अपनी श्रम शक्ति के निर्यात पर ही निर्भर करते हैं. अगर श्रम शक्ति की आवाजाही में आने वाली बाधाओं को हटाने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया जाता है तो इससेविकसित देशों को कोई लाभ नहीं होने वाला हैै. भारत के साथ अब यही हो रहा है. भारत को दुनिया के अन्य विकासशील देशों के साथ अब इस मुद्दे पर सौदेबाजी और बातचीत करनी चाहिए की लोगों की आवाजाही में आने वाली बाधाओं को हटाया जाए."

 

अमेरिका कई उल्लंघन करके बच जाता है

डब्ल्यूटीओ में भारत के पूर्व राजदूत जयंत दासगुप्ता के अनुसार भारत ने व्यापार विवादों को लेकर डब्ल्यूटीओ के फैसलों को हमेशा माना है. पर अमरीका के संबंध में यही सही नहीं है, जिसने डब्ल्यूटीओ के फैसलों को दरकिनार करने के लिए प्राय: अपने स्थानीय कानूनों की आड़ ली है. उनके अनुसार डब्ल्यूटीओ में सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि किसके पास आर्थिक सत्ता है.

ऐसे में अमरीका कई प्रकार के उल्लंघन कर बच जाता है जबकि भारत को उनका पालन करना होता है. समस्या यह है कि अगर भारत डब्ल्यूटीओ से बाहर आ जाता है तो भारत वह बाजार गंवा देगा जो कि अभी उसके पास है. पर भारत को निश्चित रूप से अपने हितों को साधने के लिए बेहतर सौदबाजी करना होगा.

नायर का कहना है कि भारत को मुक्त व्यापार समझौते पर पुन: सौदेबाजी करना होगी जिससे भारत डब्ल्यूटीओ के कारण होने वाले नुकसान की क्षतिपूर्ति कर सके. उनका कहना है कि डब्ल्यूटीओ के संबंध में विकसित देशों के गठजोड़ के कारण भारत के सामने सीमाएं थीं पर मुक्त व्यापार समझौते के मामले में भारत कई प्रतिस्पर्धी देशों को काफी कुछ दे चुका है, जिससे बचा जा सकता था. पर कम से कम अब भारत को प्रत्येक मुक्त व्यापार समझौते की समीक्षा में यह देखना होगा कि उसके हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके.

First published: 7 May 2017, 8:01 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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