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दो साल, पांच रिपोर्ट: काले धन पर देश को मूर्ख बना रही एसआईटी

नीरज ठाकुर | Updated on: 17 July 2016, 8:48 IST
QUICK PILL
  • जून 2014 में गठित विशेष जांच समिति अभी तक देश में काले धन को लेकर पांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप चुकी है. प्रत्येक रिपोर्ट में देश की अर्थव्यवस्था में काले धन को रोकने के उपायों की सिफारिश की गई.
  • हालांकि सुप्रीम कोर्ट में लगातार पांच रिपोर्ट सौंपने के बावजूद एसआईटी ने उस मामले का जिक्र नहीं किया है जहां सबसे अधिक काले धन का इस्तेमाल होता है.

क्या मोदी सरकार वास्तव में भारत में काले धन के प्रवाह को रोकना चाहती है? जून 2014 में गठित विशेष जांच समिति अभी तक देश में काले धन को लेकर पांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में सौंप चुकी है. प्रत्येक रिपोर्ट में देश की अर्थव्यवस्था में काले धन को रोकने के उपायों की सिफारिश की गई.

हालिया रिपोर्ट में एसआईटी ने 3,00,000 रुपये से अधिक के नकद लेन-देन को पूरी तरह से प्रतिबंधित किए जाने की सिफारिश की है. साथ ही एसआईटी ने देश की अर्थव्यवस्था में काले धन को रोकने के लिए किसी एक व्यक्ति के नकद रखने की सीमा 15 लाख रुपये किए जाने की सिफारिश की है.

अहम चूक

हालांकि सुप्रीम कोर्ट में लगातार पांच रिपोर्ट सौंपने के बावजूद एसआईटी ने उस मामले का जिक्र नहीं किया है जहां सबसे अधिक काले धन का इस्तेमाल होता है. राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे और उनके चुनावों में इस्तेमाल को लेकर एसआईटी ने कुछ नहीं कहा है.

दिसंबर 2014 में एडीआर ने सरकार की तरफ से गठित की गई एसआईटी को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के बड़े राजनीतिक दल बड़़े पैमाने पर बेनामी धन का इस्तेमाल करते हैं.

वित्त वर्ष 2005 से लेकर वित्त वर्ष 2013 के बीच के राजनीतिक दलों के आईटीआर के आकलन के आधार पर एडीआर ने पाया कि दलों को अज्ञात स्रोतों से इस दौरान 4,368.75 करोड़ रुपये की आमदनी हुई. यह रकम राजनीतिक दलों की कुल आय का करीब 73 फीसदी है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में उम्मीदवारों की तरफ से दिए जाने वालेे हलफनामे में उनकी संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि हुई है. कुल 165 फिर से चुने गए सांसदों की कुल अचल संपत्ति में 137 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

रिपोर्ट बताती है कि बीजेपी और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2013 में किए गए खर्च की रकम के बारे में समय पर रिपोर्ट नहीं सौंपी. दलों कोे 22 जुलाई 2013 तक रिपोर्ट सौंपनी थी लेकिन उन्होंने यह काम दिसंबर 2014 में किया.

जवाबदेही तय करने की विफलता

अगर सरकार की तरफ से बनाई गई एसआईटी काले धन को रोकने के लिए गंभीर होती तो वह निश्चित तौर पर राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के बारे में जवाबदेह बनाने के लिए सिफारिश करती. बीजेपी फिलहाल इस मामले की सबसे बड़ी लाभार्थी है.

ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं है कि अगर किसी पार्टी को अज्ञात स्रोत से सबसे ज्यादा आमदनी हो रही है तो वह निश्चित तौर पर इसे रोकने के लिए गंभीर कदम नहीं उठाएगी. यही वजह रही कि एसआईटी ने राजनीतिक दलों की तरफ से काले धन के इस्तेमाल को रोेकने की दिशा में कोई सिफारिश नहीं की. 

जबकि बीजेपी की सरकार लगातार गैर सरकारी संगठनों को विदेशी चंदा के मामले में घेरती रही है. सरकार गैर सरकारी संगठनों पर देश विरोध गतिविधियोें में शामिल होने का आरोप लगाती रही है. पार्टी का दोहरा रवैया उस वक्त खुल कर सामने आ गया जब दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले में कांग्रेस और बीजेपी दोनों को विदेशी स्रोत से पैसे लेने के मामलेे में शामिल पाया और यह सब कुछ एफसीआरए एक्ट के नियमों को नजरअंदाज कर किया गया.

केवल जुबानी वादे

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एनडीए सरकार ने सत्ता में आने के 100 दिनों के भीतर काले धन को वापस लाने का वादा किया था. अगर हम सरकार के आंकड़ों को माने तो 2014 में करीब 80 लाख करोड़ रुपये से अधिक की रकम विदेशों में जमा की गई. 

मोदी सरकार को सत्ता में रहते हुए दो साल हो चुके हैं और सरकार महज 3,770 करोड़ रुपये वापस लाने में सफल रही है.

ऐसे में काले धन को वापस लाने का दावा पूरी तरह से असंभव सिद्ध होता दिख रहा है. लेकिन इसके बावजूद सरकार की बयानबाजी में कमी नहीं आ रही. सरकार एसआईटी की मदद से मीडिया में काले धन के मुद्दे को बनाए हुए हैं.

First published: 17 July 2016, 8:48 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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