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आरबीआई: बैड लोन की भरपाई के लिए जनता की गाढ़ी कमाई छीनना कहां तक सही?

नीरज ठाकुर | Updated on: 24 June 2016, 7:16 IST

बात जब बैड लोन या गैर निष्पादित संपत्ति की हो तो फिलहाल देश में कुछ और ही कहानी चल रही है. चहेते पूंजीपतियों से लोन रिकवरी में असफल रहने और बैंकिंग क्षेत्र को बचाने के लिए अब धीरे-धीरे जनता की जमा पूंजी के इस्तेमाल की ओर सरकार बढ़ रही है. इसका अभिप्राय यह है कि भविष्य में होम या कार लोन लेने की उम्मीद पाले बैठा आम भारतीय बैंकिंग क्षेत्र को बचाने के लिए पैसा देगा.

भारतीय बैंकों पर करीब दस लाख करोड़ का बैड लोन है, जिसके एक बड़े हिस्से की भरपाई कभी नहीं की जा सकती. डिफाल्टरों से कर्ज की वसूली पर बैंक को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, यह विचारणीय नहीं है. इस दिशा में बैंक की तरफ से बरती जा रही ढिलाई ने डिफाल्टरों की जिंदगी आसान बना दी है.

खबरों की मानें तो सरकार एक ऐसा प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है, जिसके अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक का अतिरिक्त पैसा सरकारी बैंकों में पैसे की भरपाई करने के काम में लिया जाएगा या यूं कहिए कि एक बैड बैंक बनाने के काम में लिया जाएगा.

अधिक धन की आवश्यकता

सरकारी बैंक देश के बैंकिंग सेक्टर का 70 फीसदी हिस्सा हैं और इन्हें बचाना जरूरी है. सरकार ने इसके लिए वर्ष 2015 से 2019 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र के पीएसयू बैंकों में 70,000 करोड़ रूपए के पूंजी प्रवाह की योजना बनाई है. 

परन्तु इतनी पूंजी भी पर्याप्त नहीं है. इसीलिए सरकार बैंकों को अतिरिक्त पूंजी देकर इस समस्या से निजात दिलाने के दूसरे उपाय खोज रही है. अन्यथा बैंक पूंजी की कसौटी पर खरे नहीं उतरेंगे.

वित्त वर्ष 2019 से बेसल-3 मानक लागू कर दिए जाएंगे. बेसल-3 के नियम औऱ शर्तें बैंकों में पर्याप्त पूंजी, तनाव परीक्षण और बाजार तरलता जोखिम पर अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखते हुए बेसल कमेटी के सदस्यों द्वारा सर्वसम्मति से तय किए गए हैं.

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वित्तमंत्री अरूण जेटली के बजट भाषण के अनुसार सरकारी बैंकों को इन मानकों पर खरा उतरने के लिए 2.40 लाख करोड़ रूपए की अतिरिक्त पूंजी की आवश्यकता होगी. बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ते बैड लोन को देखते हुए वास्तविक राशि इसे कहीं अधिक हो सकती है.

आरबीआई ऐसे बैंकों को बचाने के लिए अपनी बैलेंस शीट क्यों खराब करे, जो बिना क्रेडिट मापदंड परखे लोन दे देते हैं

क्या आरबीआई को इन खामियों को दूर करने की जरूरत है? चूंकि आरबीआई सरकार से संबद्ध है, इसलिए यह सरकार को अपना अंश देने को मजबूर है. यदि सरकार खस्ताहाल बैंकों में अतिरिक्त पूंजी लगाने की बात करती है या एक ऐसा बैंक बनाने की बात करती है जो दूसरे बैंकों से सारे बैड लोन खरीद ले तो इसमें कोई नुकसान नहीं है. वर्तमान में, आरबीआई की बैलेंस शीट काफी अच्छी है. इसमें इसकी पूंजी का 31.5 प्रतिशत दिखाया गया है.

अब सवाल उठता है कि आरबीआई ऐसे बैंकों को बचाने के लिए अपनी बैलेंस शीट क्यों खराब करे, जो बिना क्रेडिट मापदंड परखे लोन दे देते हैं. उत्तरोत्तर सरकारों ने सार्वजनिक क्षेत्र की एक और कम्पनी जीवन बीमा निगम का इस्तेमाल उन कम्पनियों के शेयर खरीदने के लिए किया है, जो निवेश पर अच्छा रिटर्न देती हैं. 

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केवल इसलिए ताकि वह इन कम्पनियों को उस स्थिति में बचा सके, जब इन्हें सार्वजनिक आॅफर्स पर अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिलती है. इसीलिए अरबों रूपए की संपत्ति होते हुए भी एलआईसी का रिटर्न दर दस साल के सरकारी बॉन्ड से कम है.

बचत की जरूरत कब होती है?

अतिरिक्त पैसा या पूंजी हमेशा लाभ दिलाने वाले क्षेत्रों में निवेश की जानी चाहिए. अगर सार्वजनिक क्षेत्र के प्रभावित बैंकों को आरबीआई से आसानी से पूंजी मिल जाती है तो उनके पास डिपफाॅल्टरों से वसूली का कोई कारण ही नहीं रहेगा. सरकार को विजय माल्या की करतूत का खर्च नहीं उठाना चाहिए. ऐसी व्यवस्था हो कि माल्या और उसके जैसे बाकी सभी लोग अपना कर्ज ईमानदारी से चुका दें.

अन्यथा एक दिन ऐसा आएगा, जब बचत करने वाले बचत की फिक्र में कमर तोड़ रहे होंगे और जो समझदार होंगे वे माल्या की तरह बेफिक्री से जिंदगी का लुत्फ उठा रहे होंगे.

First published: 24 June 2016, 7:16 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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