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रिलायंस की जियो से निपटने के लिए आगे आई वोडाफोन की प्रोमोटर कंपनी वोडाफोन पीएलसी

अभिषेक पराशर | Updated on: 23 September 2016, 18:08 IST
QUICK PILL
  • रिलायंस इंडस्ट्रीज की रिलायंस जियो इन्फोकॉम की चुनौती से निपटने के लिए वोडाफोन इंडिया को उसकी प्रोमोटर कंपनी का सहारा मिला है. वोडाफोन इंडिया को वोडाफोन पीएलसी से 7.5 अरब डॉलर (47,700 करोड़ रुपये) की पूंजी मिली है.
  • प्रोमोटर कंपनी ने वोडाफोन इंडिया में वैसे समय में पूंजी निवेश किया है जब देश में 1 अक्टूबर को सबसे बड़ी टेलीकॉम रेडियो वेव की नीलामी होने जा रही है. इससे पहले रिलायंस जियो ने बाजार में आक्रामक तरीके से दखल देकर मौजूदा कंपनियों की परेशानी बढ़ा दी है.
  • जियो के पास रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी प्रोमोटर कंपनी है जो फिलहाल 91,000 करोड़ रुपये की नकदी के पहाड़ पर बैठी हुई है. इस मामले में वोडाफोन की स्थिति जियो की तरह ही है जिसके पास वोडाफोन पीएलसी जैसी प्रोमोटर कंपनी है.

दुनिया के दूसरे बड़े टेलीकॉम मार्केट में वर्चस्व को लेकर कंपनियों के  बीच होड़ शुरू हो चुकी है. रिलायंस जियो के भारतीय टेलीकॉम मार्केट में दखल के तत्काल बाद रिलायंस कम्युनिकेशन ने जहां एयरसेल के अधिग्रहण की घोषणा की वहीं अब वोडाफोन इंडिया को उसकी प्रोमोटर कंपनी वोडाफोन पीएलसी से 7.5 अरब डॉलर (47,700 करोड़ रुपये) की पूंजी मिली है. 

भारतीय बाजार में उपभोक्ता संख्या के आधार पर वोडाफोन एयरटेल के बाद दूसरी बड़ी कंपनी है. ब्रिटिश कंपनी वोडाफोन पीएलसी से वोडाफोन इंडिया को मिली रकम का इस्तेमाल जियो से मुकाबले में किया जाएगा. वोडाफाने के उपभोक्ताओं की संख्या करीब 20 करोड़ है.

वोडाफोन इंडिया के मैनेजिंग एडिटर और चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर सुनील सूद ने कहा, 'पूंजी का इस्तेमाल स्पेक्ट्रम को बढ़ाने और टेक्नोनोलॉजी विस्तार में किया जाएगा. इसके अलावा इस पूंजी का इस्तेमाल 4जी और 5जी तकनीक की तैनाती में खर्च किया जाएगा.'

प्रोमोटर कंपनी ने वोडाफोन इंडिया में वैसे समय में पूंजी निवेश किया है जब देश में 1 अक्टूबर को सबसे बड़ी टेलीकॉम रेडियो वेव की नीलामी होने जा रही है. इससे पहले रिलायंस जियो ने बाजार में आक्रामक तरीके से दखल देकर मौजूदा कंपनियों की परेशानी बढ़ा दी है.

रिलायंस जियो इन्फोकॉम रिलायंस इंडस्ट्रीज की सबसे बड़ी स्टार्टअप है. रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसा प्रोमोटर होने की वजह से ही जियो इन्फोकॉम बाजार में आक्रामक हो पाई है. जियो ने वॉयस कॉल को मुफ्त किए जाने और डेटा पैक को बेहद सस्ता कर दिया है.

जियो के एक जीबी डेटा पैक की कीमत करीब 50 रुपये है जबकि अन्य कंपनियां इसके लिए फिलहाल 250 रुपये से 300 रुपये तक वसूल रही है. इसके अलावा कंपनी ने दिसंबर 2016 तक अपनी सभी सेवाओं को मुफ्त रखा है. माना जा रहा है कि कंपनी इस ऑफर को जनवरी 2016 के बाद भी जारी रह सकती है.

भारत में मौजूद तीनों बड़ी टेलीकॉम कंपनियों की कमाई का सबसे बड़ा जरिया वॉयस कॉल से होने वाली आमदनी है. जबकि रिलायंस जियो ने इसे अपनी ऑफर में मुफ्त कर दिया है. रियालंस जियो ने अपने उपभोक्ताओं से केवल डेटा के लिए पैसे लिए जाने की घोषणा की है. 

जियो की सस्ती योजना  से न केवल मोबाइल इंटरनेट बाजार का विस्तार होगा बल्कि डेटा की खपत में उम्मीद से अधिक बढ़ोतरी होगी और इसका फायदा सीधे सीधे जियो को होगा.

उम्मीद के मुताबिक

जियो के बाद ही फिच ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि जियो के बाजार में आने से वैसे समय में प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी होगी जब कंपनियों को बाजार में बने रहने के लिए पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी करनी होगी.

वोडाफोन समेत अन्य कंपनियों पर पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी किए जाने का दबाव है. जियो के पास रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी प्रोमोटर कंपनी है जो फिलहाल 91,000 करोड़ रुपये की नकदी के पहाड़ पर बैठी हुई है. वहीं अन्य कंपनियों को पूंजीगत खर्च के लिए रकम जुटाने की आवश्यकता होगी.

हालांकि इस मामले में वोडाफोन की स्थिति जियो की तरह ही है जिसके पास वोडाफोन पीएलसी जैसी प्रोमोटर कंपनी है. इसके साथ ही कंपनी अगले साल की शुरुआत में सबसे बड़ा आईपीओ लाने की भी योजना बना रही है. 

माना जा रहा है कि वोडाफोन पीलएसी से मिली रकम का इस्तेमाल कंपनी स्पेक्ट्रम की आक्रामक खरीदारी में करेगी. अनुमान के मुताबिक वोडाफोन इंडिया 16,300 करोड़ रुपये इस पर खर्च कर सकती है.

जियो के बाद भारती एयरटेल, आइडिया और रिलायंस कम्युनिकेशन के शेयर बेहद दबाव में है. जियो की लॉन्चिंग के दिन एयरटेल के शेयरों में जबरदस्त 6.37 फीसदी की गिरावट आई थी. 

वहीं आइडिया के शेयर करीब 10 फीसदी से अधिक तक टूट गए थे.  चौथी बड़ी कंपनी और रिलायंस ग्रुप की प्रतिस्पर्धी रिलायंस कम्युनिकेशन का शेयर करीब 9 फीसदी तक नीचे चला गया था.

जियो के पास रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी प्रोमोटर कंपनी है जो 91,000 करोड़ रुपये की नकदी के पहाड़ पर बैठी हुई है.

भारतीय बाजार में दबदबा  बनाए रखने के लिए वोडाफोन अभी तक करीब सवा लाख करोड़ रुपये का निवेश कर चुकी है. कंपनी की योजना पूंजी की मदद से अधिक ब्याज दर वाले कर्ज को भी कम करने की है. कंपनी पर करीब 34,500 करोड़ रुपये का कर्ज भी है.

एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया सेल्युलर पिछले एक दशक में स्पेक्ट्रम की खरीदारी में भारी निवेश कर चुके हैं और उनकी योजना आने वाले दिनों में भी अधिक स्पेक्ट्रम खरीदने की है ताकि नेटवर्क और अधिक मजबूत बनाया जा सके.

बदलेंगे बाजार के नियम

फिच ने कहा था कि जियो के बाजार में आने से वैसे समय में प्रतस्पिर्धा में बढ़ोतरी होगी जब कंपनियों को बाजार में बने रहने के लिए पूंजीगत खर्च में इजाफा करना होगा क्योंकि बाजार में जल्द ही बड़े पैमाने पर 4जी हैंडसेट उपलब्ध होंगे. 

जियो के आने के बाद बाजार में मौजूद अन्य कंपनियों पर टैरिफ को कम करने का दबाव बढ़ गया है. आरकॉम जियो ने साफ कर दिया है कि वह अपने उपभोक्ताओं से केवल डेटा के लिए पैसे लेगी न कि वॉरूस कॉल के लिए. 

इस लिहाज से कंपनियों को जियो से टक्कर लेने के लिए डेटा ऑपरेशन में बढ़ोतरी करनी होगी जिसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा. जाहिर तौर पर यह निवेश स्पेक्ट्रम क्षमता को बढ़ाने में होगा.

जियो के आने के बाद बाजार में मौजूद अन्य कंपनियों पर टैरिफ को कम करने का दबाव बढ़ गया है.

अन्य कंपनियों ने रिलायंस जियो के बाजार में सामने आने के बाद अपनी रणनीति को आगे बढ़ाना शुरू किया है. मसलन तात्कालिक तौर पर कंपनियां टैरिफ प्लान की कीमतों में कटौती और लंबे समय के लिए  अधग्रिहण और विलय जैसे फैसले ले रही हैं. 

जबकि रिलायंस जियो इन्फोकॉम टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे अपनी तैयारी पहले ही पूरी कर चुका है.

रियालंस जियो इन्फोकॉम के पीछे रिलायंस इंडस्ट्रीज खड़ी है जिसके पास करीब 93,000 करोड़ रुपये का नकदी है. अन्य कंपनियों को पूंजीगत जरूरतों और ऑपरेशन बढ़ाने के लिए बाजार से पूंजी जुटाने में भी मशक्कत करनी होगी, जबकि जियो को इस मोर्चे पर फिलहाल किसी तरह की दक्कितों का सामना नहीं करना होगा. यहां वोडाफोन इंडिया अपने प्रोमोटर वोडाफोन पीएलसी की वजह से एयरटेल, आइडिया सेल्युलर और अन्य कंपनियों के मुकाबले मजबूत स्थिति में नजर आती है. 

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First published: 23 September 2016, 18:08 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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