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भारतीय कंपनियां महिला डायरेक्टरों से क्यों काट रही हैं कन्नी?

नीरज ठाकुर | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • सेबी के दिशानिर्देशों के मुताबिक सभी लिस्टेड कंपनियों के बोर्ड में कम से एक महिला डायरेक्टर का होना अनिवार्य है.
  • 10,000 कंपनियों में से एक चौथाई ने अभी तक अपने बोर्ड में किसी महिला डायरेक्टर को शामिल नहीं किया है.

सेबी (भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड) ने आठ महीने पहले नियम बनाया कि लिस्टेड कंपनियों के बोर्ड में कम से कम एक महिला डायरेक्टर जरूर होनी चाहिए. लेकिन कंपनीज एक्ट 2013 के तहत 10,000 लिस्टेड कंपनियों में से एक चौथाई कंपनियां इसपर अमल करने में विफल रही हैं.

अधिकांश कंपनियों ने इस दिशानिर्देश को लागू तो किया लेकिन उन्होंने कंपनी के बोर्ड में प्रमोटर्स के परिवार के ही महिला सदस्य को डायरेक्टर बना दिया. सेबी का मकसद नीति निर्माण की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करना था लेकिन जिस तरह से कंपनियों ने इस नियम की काट खोज निकाली है वह चिंतनीय है. 

बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) अभी तक 370 कंपनियों पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगा चुका है लेकिन अभी 2,500 से अधिक कंपनियां सेबी के दिशानिर्देशों को धता बता रही हैं. उनका कहना है कि डायरेक्टर नियुक्त करने के लिए 'योग्य' महिलाओं की कमी है. 

तो क्या वाकई में योग्य महिला डायरेक्टरों की कमी है?

कैच ने इस मामले में जितने भी विशेषज्ञों से बातचीत की उन्होंने यह मानने से इनकार कर दिया कि इंडस्ट्री में डायरेक्टर बनने की योग्यता रखने वाली महिलाओं की कमी है. एचएसबीसी इंडिया की चेयरपर्सन नैना लाल किदवई बताती हैं, 'यह सिर्फ और सिर्फ मानसिकता का मामला है. भारत के कॉरपोरेट जगत में ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है जो यह काम कर सकती हैं. यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है. अगर महिलाओं को मैनेजर की कुर्सी दी जा सकती है तो वह निश्चित तौर पर डायरेक्टर भी बन सकती हैं.' 

किदवई महिलाओं के पक्ष में काम करने वाली एचआर पॉलिसी की कमी का भी जिक्र करती हैं. उन्होंने कहा, 'अधिकांश महिलाओं को मां बनने के बाद नौकरी छोड़नी पड़ती है क्योंकि भारतीय कंपनियों में उनके मुताबिक पॉलिसी नहीं है. हमें मां बन चुकी महिलाओं के लिए और अधिक छुट्टियों की जरूरत है.'

उन्होंने कहा, 'नई कंपनियां अब पहले के मुकाबले ज्यादा दिनों के लिए मैटरनिटी लीव दे रही हैं लेकिन अभी भी अधिकांश भारतीय कंपनियों को महिला कर्मचारियों के लिए विशेष सुविधाओं की जरूरत महसूस नहीं होती.'

किदवई भारत के सबसे पुराने इंडस्ट्री एसोसिएशन फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की पहली महिला प्रेसिडेंट हैं. किदवई डायरेक्टर के पद के लिए 25 महिलाओं के तीन बैच को ट्रेनिंग दे चुकी है.

सरकार की भूमिका

इन्फोसिस की स्वतंत्र निदेशक और बायोकॉन की मैनेजिंग डायरेक्टर किरण मजूमदार शॉ कहती हैं कि सरकार को सख्ती से सेबी के दिशानिर्देशों को लागू करना चाहिए. उन्होंने कहा, 'सरकार को पेनाल्टी के नियम को सख्ती से लागू करने की जरूरत है. नहीं तो ये कंपनियां इन नियमों को हल्के में लेंगी. अगर फिर भी हालात नहीं सुधरते हैं तो हमें पेनाल्टी की रकम बढ़ाने के बारे में विचार करना चाहिए.'

खबरों के मुताबिक सरकार सेबी के नियम का पालन नहीं करने वाली कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी करने का फैसला कर चुकी है. 

भारत के लेबर मार्केट में प्रति तीन पुरुष कर्मचारियों के मुकाबले एक महिला कर्मचारी है

महिलाओं की आर्थिक साझेदारी वाले रिपोर्ट में भारत की रैंकिंग 136 देशों के बीच 134वीं है. डेलॉएट ग्लोबल की स्टडी के मुताबिक सीनियर कॉरपोरेट नौकरियों में भारतीय महिलाओं की बोर्ड में बतौर डायरेक्टर भागदारी 7.7 फीसदी है. इस स्टडी के मुताबिक नॉर्वे में महिला डायरेक्टरों की संख्या सबसे अधिक है. 

सूची में 36.7 फीसदी के साथ नॉर्वे सबसे ऊपर जबकि 29.9 फीसदी के साथ फ्रांस दूसरे नंबर पर है. वहीं 24.4 फीसदी के साथ स्वीडन, 22.3 फीसदी के साथ इटली चौथे नंबर पर जबकि 22.1 फीसदी के साथ फिनलैंड पांचवें नंबर पर है. चीन में महिला डायरेक्टर्स की हिस्सेदारी 8.5 पर्सेंट है. 

सेबी का मजाक बना रही हैं कंपनियां

इस कहानी का दूसरा पहलू और भी स्याह है. जिन कंपनियों ने सेबी के दिशानिर्देशों  का पालन किया है उन्होंने इसे महज कागजी खानापूर्ति के लिए किया है. उन्होंने महिला डायरेक्टरों की नियुक्ति बस सेबी के दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए किया है.

प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के मुताबिक 138 डायरेक्टरों में से करीब 12.26 फीसदी प्रमोटर्स के परिवार से आते हैं. यह ठीक उसी तरह है जैसे पंचायती राज चुनाव में महिलाएं चुनाव लड़ती हैं लेकिन वह महज पुरुष उम्मीदवार के प्रॉक्सी के तौर पर चुनाव लड़ रही होती हैं क्योंकि उन सीटों पर पुरुष उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ सकते.

प्राइम डेटाबेस के मैनेजिंग  डायरेक्टर प्रणव हल्दिया ने कहा, 'कंपनियों को महिला डायरेक्टरों के पीछे के विचार को लेकर गंभीर होना पड़ेगा. यह विविधता को बढ़ाने की कोशिश है. ऐसे में प्रोमोटरों के परिवार से महिला डायरेक्टरों की नियुक्ति इस मकसद को पूरा नहीं करती है.'

डब्ल्यूआईएलएल फोरम इंडिया की फाउंडर चेयरमैन पूनम बरुआ कहती हैं कि भारतीय कंपनियों ने यह दिखाया है कि वह महज दिखावे के लिए अपने बोर्ड में महिला डायरेक्टर चाहती हैं. उन्होंने कहा, 'इस रवैये को बदले जाने की जरूरत है.' बरुआ ने कहा, 'यह बात बिल्कुल बकवास है कि इंडस्ट्री में योग्य महिला डायरेक्टरों की कमी है. सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कंपनियां इस तरह का बयान देकर बचे नहीं.'

बरुआ बताती हैं कि जूनियर और मिड लेवल पर महिला कर्मचारियों की संख्या पुरुषों के बराबर है. 'लेकिन इससे ऊपर तरक्की के मामले में उनके साथ भेदभाव होता है.'

बरुआ ने कहा कि इस मानसिकता में तुरंत बदलाव असंभव है. इसलिए सेबी को तुरंत ही उन कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जिन्होंने अपनी बोर्ड में महिला डायरेक्टर्स को नियुक्त नहीं किया है. सेबी को नियमों में संशोधन करना चाहिए ताकि कोई प्रमोटर्स इसका मजाक नहीं बना पाए.

महिलाओं की भागीदारी से बढ़ेगी कमाई

अकाउंटेंसी फर्म ग्रांट थॉर्नटन के मुताबिक भारत, ब्रिटेन और अमेरिका की उन कंपनियों को पिछले साल 655 अरब का नुकसान उठाना पड़ा जहां बोर्ड में केवल पुरुष ही डायरेक्टर हैं. 'वूमन इन बिजनेस: द वैल्यू ऑफ डायवर्सिटी' रिपोर्ट में 1,050 बिजनेस ग्रुप का अध्ययन किया गया और इसकी तुलना महिला डायरेक्टरों वाले बोर्ड के मुकाबले उन बोर्ड से की गई जिसमें केवल पुरुष डायरेक्टर थे.

इस अध्ययन में पता चला कि जिस बोर्ड में ज्यादा विविधता थी वहां रिटर्न का औसत ज्यादा रहा. ऐसे में भारतीय कंपनियों को महिलाओं को आगे बढ़ाने में हिचक नहीं होनी चाहिए.

First published: 9 December 2015, 8:02 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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