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नोटबंदी असल में लोकतंत्र के मूल विचार पर हमला है

अमिताभ पांडेय | Updated on: 23 December 2016, 8:19 IST

लोकतंत्र की धारणाओं पर विकास और विकासशील अर्थव्यवस्था के नजरिए से काफी विस्तार से चर्चा होती रही है. पर आम आदमी के लिए लोकतंत्र का मतलब है उसकी 'भागीदारी', सरकार को चुनने में ही नहीं, बल्कि नियमों, जन नीतियों को बनाने और उन्हें लागू करने में भी. कुल मिलाकर शासन की पूरी प्रक्रिया में हिस्सेदारी.

इसलिए लोकतंत्र में अवाम को सशक्त होना चाहिए, उसकी संस्थाओं में हक़ हो, अपनी बात कहने की स्वतंत्रता हो. उनकी आवाज बेअसर, अनसुनी नहीं होनी चाहिए. जिसे आवाम ने शासन के लिए चुना है, वे उनकी बात पर कान दें और उनकी बुनियादी मांगें पूरी करें.

लोकतंत्र लोगों को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में भागीदारी का हक़ देता है. पर चुनने के बाद उसकी 'भागीदारी' नहीं रह जाती. यही महत्वपूर्ण मुद्दा है. इस लिहाज से यह एक सीमित या बंधन वाली व्यवस्था है. अवाम की आवाज की अनदेखी दो स्तरों पर हो सकती है. पहला, राज्य की स्थाई संरचना से जुड़े लोग, जिस पर शासन के लिए अनुभवी और जरूरी लोग होते हैं. दूसरा, जनप्रतिनिधियों के स्तर पर, जिन्हें एक सीमित कार्यकाल के लिए चुना जाता है.

प्रतिनिधियों के बयान को समझना होगा, उनका कहना है कि नोटबंदी समस्या नहीं है क्योंकि सड़कों पर दंगे नहीं हो रहे

यदि शासन संरचनाएं औपनिवेशिक अवशेष हैं, औपनिवेशिक मानसिकता में रंगी हुई हैं, उनका संचालन करने वाले साहिब लोग हैं, जिनका 'जन्म शासन के लिए हुआ है, ना कि सेवा के लिए चुने गए हैं,' तो बहुत संभव है कि जन संवाद को बहुत ज्यादा अहंकार और व्यक्तिगत उन्नति के नजरिए से सुना जाएगा. मसलन तभी जब लोगों की बात पर ध्यान नहीं देने से हताशा में शांति भंग होने की संभावना हो.

चुने हुए प्रतिनिधि भी 'बहरे' हो सकते हैं, यदि उनका मुख्य मकसद सत्ता हाथियाना है. सत्ता से भौतिक और मनोवैज्ञानिक लाभों का आनंद लेना है. उनके लिए जन सेवा महज मुखौटा है या सत्ता हथियाने का छल. यहां भी सुनवाई तभी होती है, जब सामान्य, सहज यथास्थिति पर कोई गंभीर संकट पैदा होता है.

इसी संदर्भ में हमें सत्तारूढ़ कुछ प्रतिनिधियों के तकलीफदेह बयान की व्याख्या करनी है. उनका कहना है कि नोटबंदी समस्या नहीं है क्योंकि सड़कों पर कोई दंगे नहीं हो रहे हैं.

इस बयान से साफ लगता है कि लोगों को कष्ट पहुंचा रही समस्या पर तब तक ध्यान देने की जरूरत नहीं है, जब तक कि 'सड़कों पर दंगे ना हों, जब तक सार्वजनिक व्यवस्था बाधित नहीं होती.'

इस रवैये का एक आशय यह है कि इन समस्याओं से निर्वाचन क्षेत्र पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ रहा है, तब तक तो ठीक है, पर जब वे बहुत ही गंभीर उपद्रवी रूप अख्तियार कर लेती हैं, तभी उन पर ध्यान देना चाहिए.

यह निंदनीय स्थिति है और लोकतंत्र के मूल स्वरूप का उल्लंघन है. लोग, उनकी जरूरतें और समस्याओं के लिए ही तो राज्य का अस्तित्व है: एक लोकतांत्रिक राज्य लोगों 'के लिए' है, उनकी रक्षा और सेवा के लिए है, इसके उलट नहीं.

रॉबिनहुड मार्का सरकार

नोटबंदी ने पिछले 45 असुविधाजनक दिनों में गरीब, 'छोटे आदमी' को बड़े पैमाने पर कष्ट पहुंचाया है. जो उतने गरीब नहीं हैं, 'मध्यम वर्ग' के आदमी के लिए गंभीर असुविधाएं हुई हैं. संपन्न 'उच्च वर्ग' के आदमी को कोई खास असुविधा नहीं हुई, क्योंकि इस अर्थव्यवस्था में भी उसके पास अपना जीवन चलाने के लिए जरूरत भर पैसा आने के पर्याप्त साधन थे. जिन लोगों ने नोटबंदी को थोपा और लागू किया, वे अंतिम श्रेणी में आते हैं.

इस तरह इस नीति का दर्द सबको बराबर नहीं हुआ. किसी को रत्ती भर तकलीफ नहीं हुई, तो किसी को बहुत ज्यादा. इसके फायदे तो अभी देखने बाकी हैं, हालांकि इससे कोई फायदा हुआ हो इसका प्रमाण अब तक नहीं मिला है. जैसा कि हाल ही में कहा गया, सिस्टम में कितना काला धन है, यदि इसका अनुमान नहीं है, तो ऐसे धन पर अंकुश से कितना तथकथित लाभ होगा, उसका हिसाब कभी नहीं लगाया जा सकेगा.

आम माफी को फिर से लागू करना इस बात का सूचक है कि इस पूरी कवायद का मकसद काले धन पर अंकुश लगाना नहीं था, कर राजस्व बढ़ाना था. तर्क यह है कि यह अतिरिक्त राजस्व अच्छे काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. दुख की बात है कि अपनी व्यय नीतियों से लोगों के लिए अच्छा करने का भारत सरकार का ट्रैक रिकार्ड बहुत ही बुरा है. सब्सिडी के माध्यम से खास हितों को अप्रत्याशित लाभ मिलता है और उसका रिसाव मुख्यतया मध्यम वर्ग को लुभाने वाली सरकारी सेवाओं तक सीमित है.

1980 की शुरुआत से ही असमान विकास पर आधारित अर्थव्यवस्था ने बहुत ही अजीब असर डाला है

1980 की शुरुआत से ही असमान विकास पर आधारित अर्थव्यवस्था ने बहुत ही अजीब असर डाला है. उच्च वर्ग के खिलाफ पैदा होने वाला असंतोष और बढ़ती असमानता ने उसे वतर्मान व्यवस्था का रॉबिनहुड बना दिया. 8 नवंबर 2016 को हुई विनाशकारी घोषणा के बाद शुरू में आबादी के कुछ वर्ग की मानसिकता थी कि 'यदि संपन्न वर्ग के काले धन वालों का सफाया होता है, तो मुझे कुछ असुविधा झेलनी पड़ेगी.'

मेरा मानना है कि ऐसा मानने वाले भी ज्यादातर लोग वो थे जो आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं. लेकिन उनकी ईर्ष्या इस बात को लेकर थी कि उनके बीच मौजूद कुछ बेहद संपन्न लोगों की संख्या बढ़ रही थी जो कि काले धन पर सवार थे.

सवाल यह है कि इस कवायद से बेतहाशा प्रभावित हुए गरीब और अन्य लोग किसी और को हुए नुकसान पर अपना जीवन जी सकेंगे, खासकर मौजूदा स्थिति में जब यह साफ हो चुका है कि काले धन वाले इस फैसले की मार झेल सकते हैं. वे बेफिक्र होकर अपना गलत कमाया पैसे का काफी हिस्सा रख सकते हैं. इस तरह का रोबिनहुड ज्यादा दिन नहीं चलेगा. खासकर तब जब उसे अंत में वास्तव में अपने नुकसान का अंदाजा होगा.

लोकतंत्र लोगों की परवाह करने वाली व्यवस्था होनी चाहिए. 'सख्त प्यार' युद्ध या ऐसी ही आपात स्थितियों में चल सकता है, अन्यथा नहीं. जवाब इस सवाल का देना है कि क्या समानांतर अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए इतनी कड़वी दवा जरूरी थी (हम जानते हैं, यह पर्याप्त नहीं है)?

अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने का क्या यही एकमात्र तरीका था? या केशलेस लेन-देन की कीमत घटाने, उनकी सुरक्षा बढ़ाने और उनके लिए क्या उचित है, इसके लिए लोगों को शिक्षित करने का तरीका सही है?

लोकतंत्र में हम लोगों को विश्वास दिलाते हैं या अपनी सोच थोपने के लिए उनके सिर पर बंदूक तानते हैं?

क्या इस मानदंड से मूलभूत बातें बदल गई हैं कि वे कर को टालने की इच्छा और अपनी चतुराई छोड़ देंगे?

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में, जहां ज्यादातर लेन-देन नकद होता है, क्या लोगों का और कल्याण करने के लिए नोटबंदी और उसके नतीजे आवश्यक थे? क्या यह फैसला बहुमत का बड़े पैमाने पर भला करने और शायद कुछ राजनीतिक विरोधियों की आर्थिक मजबूती को नष्ट करने में सफल रहा?  यह तो वक्त ही बताएगा, या फिर तर्कसंगत आंकड़े. कोरे जुनूनी दावों से काम नहीं चलेगा.

First published: 23 December 2016, 8:19 IST
 
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