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अचानक से पनगढ़िया समाजवादियों की भाषा क्यों बोलने लगे?

नीरज ठाकुर | Updated on: 7 February 2017, 8:24 IST

सिद्धांत व्यवहार में चल पाएं यह जरूरी नहीं है. महज दो साल हुए हैं सत्ता में आए और गुजरात मॉडल के चैंपियन मोदी सरकार की आधारशिला डगमगाती नजर आ रही है. मुक्त बाजार के अर्थशास्त्री और सरकारी वैचारिक थिंक टैंक नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान) के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया का नजरिया अचानक से समाजवादी हो गया है. वे उद्यमों से समाज कार्य करने और नौकरियां गढ़ने की खातिर विकास को त्यागने की अपेक्षा करने लगे हैं.1

आठ अगस्त की एक बैठक में अरविंद पनगढ़िया ने कहा, 'भारत में सफल उद्यमों का रुख पूंजी प्रधान उद्योग या कुशल श्रमिक प्रधान रहा है. यदि मैं थोड़ा तीखे शब्दों में कहूं तो हमारे उद्यमियों का उद्यम के लिए रुख ब्राह्मणों सरीखा है, इसलिए जो उद्यम वे शुरू करते हैं, या तो वे तकनीकी रूप से काफी संपन्न होते हैं या पूंजी का परिनियोजन होता है.'

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उन्होंने आगे कहा, 'अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्रों में 90 फीसदी से ऊपर श्रमिकों को नौकरियां देकर हमने अच्छा काम नहीं किया, जहां सभी जानते हैं कि उन्हें अच्छा भुगतान नहीं किया जाता.'

पनगढ़िया उद्यमों से नौकरियां गढ़ने की खातिर विकास को त्यागने की अपेक्षा करने लगे हैं

अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके पनगढ़िया विकास के कट्टर हिमायती रहे हैं और सरकार द्वारा संपत्ति के वितरण के विचार के कटु आलोचक रहे हैं.

पनगढ़िया ने अपनी किताब, 'इंडियाज ट्रिस्ट विद डेस्टिनी: डिबंकिंग मिथ्स दैट अंडरमाइन प्रोगेस एंड एड्रेसिंग न्यू चैलेंजेज़', जिसके सहलेखक जगदीश भगवती हैं, में 'गुजरात मॉडल' को विकास के प्रतीक के रूप में पेश किया है, जो मुख्य रूप से विकास और निजी उद्यम से चालित है.

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इसी किताब में पनगढ़िया सरकार द्वारा संपत्ति के पुनर्वितरण के केरल मॉडल की यह तर्क देकर आलोचना करते हैं कि यह विदेशों में रह रहे केरलवासियों की निजी कमाई गई संपत्ति है, जिसने प्रदेश में सामाजिक सूचकों को सुधारा है.

दरअसल पनगढ़िया का अर्थशास्त्रीय सिद्धांत कहता है कि उद्यमियों का ध्यान केवल धन कमाने पर होना चाहिए, जो लोगों को गरीबी से बाहर निकाल सकता है. लेकिन मोदी सरकार के राज में उद्यम और उद्योग पर बहुत ज्यादा ध्यान देने से 2015 में पैदा की गई नौकरियों की संख्या छह साल में सबसे कम 1.35 लाख रह गईं. इसकी वजह से विकास के मोदी मॉडल की पहले ही आलोचना हो चुकी है, जो कि कुल मिलाकर इंडस्ट्री को खुली छूट देने और नफा कमाने के फार्मूले पर आधारित है.

पनगढ़िया का समाजवाद की ओर झुकाव

मुक्त बाजार का अर्थशास्त्र जिसमें संपत्ति के पुनर्वितरण को लेकर सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं हो, एक उद्यमी से केवल उन उद्यमों पर ध्यान देने की उम्मीद की जाती है, जो अपनी कंपनी के लिए लाभ कमाते हों. यदि यह उन सेक्टर्स से आए, जिसमें कुशल श्रमिकों की जरूरत है, तो राज्य उन्हें और कहीं पूंजी लगाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता.

दूसरी ओर अपने भाषण में पनगढ़िया उद्यम के साथ नैतिकता को जोड़ते हुए लगते हैं. यदि हम विश्व के पूंजीवादी मॉडल देखें, तो कोई भी देश उद्यमी को निर्देश नहीं दे सकता कि उसे अपनी पूंजी कहां लगानी चाहिए. यही कारण है कि पूंजीपतियों का विरोध करने वालों की आलोचना के बावजूद कम कौशल वाले काम विकसित देशों से विकासशील देशों पर डाल दिए गए.

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यदि उद्यम से जुड़े पनगढ़िया के विचारों को कोई मानता है, तो सूचना प्रौद्योगिकी, ऑटोमोबाइल और उन सेक्टर्स में कोई निवेश नहीं होना चाहिए जहां इंसानों की जगह रोबोट्स या कृत्रिम समझ रखने वाले सॉफ्टवेयर ले रहे हैं.

विश्वभर की कंपनियां जो 'उच्च तकनीक या पूंजी प्रबंधन' पर भरोसा कर रही हैं, सबसे ज्यादा मुनफा कमा रही हैं. लेकिन इन कंपनियों में बहुत कम नौकरियां रहती हैं क्योंकि हर कर्मचारी की आमदनी काफी अच्छी है.

2015 में पैदा की गई नौकरियों की संख्या छह साल में सबसे कम 1.35 लाख रह गईं

भारत में बढ़ती युवा जनसंख्या के मद्देनजर 2030 तक प्रति वर्ष एक करोड़ नौकरियों की व्यवस्था करने की जरूरत है. स्वाभाविक है कि परपंरागत रूप से लाभ कमाने वाले सेक्टर्स इतनी बड़ी जनसंख्या को नौकरी नहीं दे सकते.

इसीलिए भारत की जरूरतों को देखते हुए मुक्त बाजार के अर्थशास्त्र पर फिर से विचार करना आवश्यक हो गया है. इस संदर्भ में चीन उपयुक्त उदाहरण है जो भारत से एक दशक बाद विश्व व्यापार संघ में शामिल हुआ था. चीन की सरकार ने इस समय का उपोयोग उन सेक्टर्स को सहयोग करने में किया, जो उसकी जनसांख्यिकी के लिहाज से महत्वपूर्ण थे.

दूसरी ओर भारत, जो पश्चिमी देशों के नियमों से प्रभावित और सृजित रहा है, ने अपने आर्थिक मॉडल की सफलता की कहानी मध्यम वर्ग के छोटे से हिस्से के उत्थान में दिखाई.

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ढाई दशक बाद चीन निर्माण के क्षेत्र में विश्व में सबसे अग्रणी है, जो अपनी बड़ी आबादी के लिए नई नौकरियों की व्यवस्था भी कर रहा है. दूसरी ओर भारत भी आईटी के क्षेत्र में शक्तिशाली बन गया है, लेकिन इसने अपने देश में कम नौकरियों के कारण बेरोजगार जनसंख्या के सामने संकट पैदा कर दिया.

मुनाफा कमाने वाले सेक्टर्स के पीछे भाग रहे भारतीय उद्यमियों की आलोचना करते समय पनगढ़िया वस्तुत: मुक्त बाजार के मॉडल की आलोचना कर रहे हैं, जो उनके अर्थशास्त्र से संबंधित सैद्धांतिक विचारों के एकदम उलट है.

शायद पनगढ़िया धीरे-धीरे महसूस करने लगे हैं कि अर्थशास्त्र से जुड़ी मुक्त बाजार की कट्टर अवधारणा अपनी चरम सीमा तक जा पहुंची है. यदि सरकार अपने लोगों को गरीबी से बाहर निकालने के लिए केवल उद्यमियों के धन कमाने पर भरोसा करती है, तो हमारे भारत जैसे देश में यह विचार चलने वाला नहीं है.

First published: 12 August 2016, 8:23 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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