Home » बिज़नेस » Why did the promoters of Malvinder Singh and Shivinder Singh Fortis Healthcare have to give up their resignation?
 

फोर्टिस हेल्थकेयर के प्रमोटर इन दोनों भाईयों को क्यों देना पड़ा इस्तीफ़ा ?

सुनील रावत | Updated on: 9 February 2018, 12:23 IST

फोर्टिस हेल्थकेयर के प्रमोटर मालविंदर मोहन सिंह और शिविंदर मोहन सिंह ने गुरुवार को अस्पताल बोर्ड से इस्तीफा देने का फैसला किया है. इन दोनों ने यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट के जापानी फार्मास्युटिकल कंपनी दाइची सैंक्यो को 3,500 करोड़ रुपये वसूलने की इजाजत मिलने के बाद लिया.

जानीमानी फार्मा कंपनी रेनबैक्सी के प्रमोटर रह चुके मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह फार्मास्युटिकल कंपनी दाइची के पक्ष में सिंगापुर की एक ट्राइब्यूनल ने आदेश किया था. इस आदेश में कहा गया था कि रेनबैक्सी के पूर्व प्रमोटर्स और सिंह बंधुओं मलविंदर और शिविंदर ने शेयरों की बिक्री करते वक्त यह जानकारी छिपाई कि भारतीय कंपनी यूएस फूड ऐंड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन और डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस के जांच का सामना कर रही है. 

क्या था विवाद

साल 2008 में रैनबैक्सी के मालिक मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह थे और उन्होंने रेनबैक्सी को जापान की दाइची सैंक्यो के हाथों 19,804 करोड़ रु बेच दिया था. दाइची सैंक्यो ने सिंगापूर की अदालत में इसके पूर्व मालिकों के खिलाफ एक मामला दर्ज किया था जिसमे उन्होंने कहा था कि रैनबैक्सी ने साल 2004 में अपनी दवाइयों को 40 देशों में भेजने के लिए गलत डेटा का इस्तेमाल किया जिसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते थे. जापानी कंपनी ने कहा कि उन्हें अगर इस बारे में पहले बताया होता तो वह रेनबैक्सी को कभी न खरीदते.

 

सिंगापुर की अदालत की 373 पन्नो की रिपोर्ट में कहा गया है कि रेनबैक्सी को कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े कई सवालों के जवाब देने होंगे साथ ही कंपनी पर 3,500 करोड़ का जुर्माना भी लग सकता है.

कैसे चला रेनबैक्सी के फ्रॉड का पता ?

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि सिंगापुर की अदालत ने यह फैसला उस एसएआर रिपोर्ट के आधार पर दिया गया है जिसे रेनबैक्सी की शोध और विकास (आरएंडडी) टीम ने साल 2004 में तैयार किया था. रिपोर्ट में बताया गया था कि रेनबैक्सी ने किस तरह नियमों का उल्लंघन कर 200 से ज्यादा दवाओं को 40 देशों में भेजने की मंजूरी दिलवाने के लिए गलत डेटा का इस्तेमाल किया जिसमे एड्स की दवाएं भी शामिल थी. साल 2004 में यह रिपोर्ट कंपनी की साइंस कमेटी के सामने भी पेश की गई जिसके बाद खलबली मच गई थी.

जिस वक़्त यह रिपोर्ट पेश की गई थी उस वक़्त वहां कंपनी के मालिक मलविंदर सिंह और रेनबैक्सी के तत्कालीन सीईओ ब्रायन टेंपेस्ट भी उपस्थित थे लेकिन मामले को इग्नोर कर दिया गया. इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले आरएंडडी के चीफ राजिंदर कुमार ने इससे नाराज होकर इस्तीफ़ा भी दिया था। कुमार ने कहा कि रैनबैक्सी ने जिस तरह नियमों का उल्लंघन किया उसके परिणाम गंभीर भी हो सकते थे.

2005 में राजेन्द्र कुमार के सहायक दिनेश ठाकुर ने रिपोर्ट अमेरिका के खाद्य और दवा विभाग (एफडीए) को भेजी. इसके आधार पर एफडीए और डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने फरवरी 2006 में रेनबैक्सी के खिलाफ जांच शुरू की. न्यूजर्सी स्थित कंपनी के दफ्तर पर छापा भी मारा गया और दस्तावेज जब्त किए गए. 2013 में अमेरिकी न्याय विभाग ने उस पर करीब तीन हजार करोड़ रु का जुर्मान लगाया. 2015 में दायची ने रेनबैक्सी को सन फार्मा 22,679 करोड़ रु में बेचा.

First published: 9 February 2018, 12:17 IST
 
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