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बुरी खबर: बैंकों के दबाव के आगे सरकार ने टेके घुटने

नीरज ठाकुर | Updated on: 12 December 2015, 7:54 IST
QUICK PILL
  • बैंकों के तर्क को सही मानते हुए सरकार अब छोटी बचत योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज दरों में कटौती की योजना पर काम कर रही है.
  • बैंकों का कहना है कि छोटी बचत योजनाओं पर दिए जाने वाले ज्यादा ब्याज की दरों के चलते वह आरबीआई के रेट कट्स का फायदा ग्राहकों को नहीं दे पा रहे हैं.

सरकार छोटी बचत योजनाओं मसलन जैसे नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट्स (एनएससी), पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (पीपीएफ) और पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट अकाउंट्स के लिए ब्याज दरों में कटौती करना चाहती है. लंबे समय से बैंकिंग सेक्टर सरकार से ब्याज दरों में कटौती की मांग करता रहा है. यहां तक कि रिजर्व बैंक के गवर्नर भी इस बारे में बोल चुके हैं.

बैंकों का कहना है कि इस तरह की योजनाओं पर ब्याज दरों को नियंत्रित किए जाने के फैसले से प्रतिस्पर्धा में बाधा आती है और वह चाहकर भी छोटी बचत योजनाओं के मुकाबले डिपॉजिट दरों को कम नहीं कर पाते हैं. बैंकों का कहना है कि इसकी वजह से लोग बैंकों से पैसा निकालकर इन योजनाओं में पैसा लगाना शुरू कर देंगे. वहीं डिपॉजिट पर अधिक ब्याज दर की वजह से वह लोन के ब्याज दर को कम नहीं कर पा रहे हैं.

पिछले हफ्ते एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सरकार छोटी बचत योजनाओं के ब्याज दरों में कटौती के लिए तैयार है. ऐसे में उन लोगों की स्थिति को समझना जरूरी है जिन्होंने इन योजनाओं में पैसा लगा रखा है. साथ ही बैंकों के पक्ष को भी समझने की जरूरत होगी.

क्या होंगे नतीजे

गैर पेंशनभोगी वरिष्ठ नागरिकों को होगा नुकसान. सातवें वेतन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 40 करोड़ कामगारों के मुकाबले केवल 52 लाख लोग ही पेंशन के हकदार हैं. ऐसे में बाकी लोगों विशेषकर निम्न-मध्य और मध्य वर्ग के लोगों के लिए छोटी बचत की योजनाएं ही सामाजिक सुरक्षा का एकमात्र जरिया हैं. इन योजनाओं की वजह से लोगों को बचत की प्रेरणा मिलती है.

पूर्व योजना आयोग के सदस्य रहे अभिजीत सेन बताते हैं, 'अगर आप छोटी बचत की योजनाओं के ब्याज में कटौती करते हैं तो वृद्ध लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी होगी. बुजुर्गों की बड़ी आबादी इन योजनाओं से मिलने वाले ब्याज से अपनी गुजर बसर करती है. ऐसे में इस आय में होने वाली कोई भी कटौती उनके जीवन यापन पर असर डालेगी.'

छोटी बचत की योजनाओं में नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट और पब्लिक प्रॉविडेंट फंड शामिल है

पोंजी योजनाओं के जाल में फंसने की उम्मीद बढ़ जाएगी. कम आय वाले अधिकांश लोग भारी रिटर्न की लालच में पोंजी योजनाओं के चक्कर में फंस जाते हैं. पोंजी योजना एक फर्जी निवेश की योजना है जो कम निवेशकों को भारी रिटर्न का वादा करती है. नए निवेशकों की मदद से वह पुराने निवेशकों को रिटर्न देती है. यह तब तक निवेशकों को भारी रिटर्न का वादा करती है जब तक कि उससे नए निवेशक जुड़ते रहते हैं. ऐसी योजनाएं उस वक्त खत्म हो जाती है जब नए निवेशकों का आना बंद हो जाता है. 

सीपीआई नेता और राज्यसभा सांसद डी राजा कहते हैं, 'छोटी बचत की योजनाओं के ब्याज दर को घटाकर सरकार लंबे समय के लिए लोगों को निवेश करने से हतोत्साहित करेगी. ऐसे में पोंजी स्कीम जल्द ही छोटे निवेशकों के लिए आकर्षक बन जाएगी.' 

बैंकों के डिपॉजिट से होगी प्रतिस्पर्धा. आम लोगों के लिए छोटी बचत की योजनाओं पर 8.4-8.8 पर्सेंट का ब्याज मिलता है.

वहीं बैंकों के डिपॉजिट पर करीब 7.5 पर्सेंट का ब्याज मिलता है. वरिष्ठ नागरिकों को इससे थोड़ा अधिक ब्याज मिलता है. बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट्स के मुकाबले छोटी बचत की योजनाओं पर ज्यादा ब्याज मिलता है इसलिए इन योजनाओं में लोग ज्यादा पैसा लगाते हैं.

आंकड़ों से नहीं मिलता सच

अप्रैल से जनवरी 2015 के बीच राज्यों की तरफ से छोटी बचत की योजनाओं में 4,318 करोड़ रुपये की रकम आई जबकि एक साल पहले यह रकम 9,948 करोड़ रुपये थी.

वहीं जनवरी 2015 में बैंक डिपॉजिट की रकम 84 लाख करोड़ रुपये थी. केयर रेटिंग्स के चीफ इकनॉमिस्ट मदन सबनवीस बताते हैं, 'छोटी बचत की योजनाएं समाज के कुछ निश्चित समूह के लिए बनाई गई हैं जिनका बैंकिंग सिस्टम से ताल्लुक नहीं है. छोटी बचत की डिपॉजिट की ग्रोथ रेट सालों तक कम रही है.' 

उन्होंने कहा, 'यह मान लेना गलत है कि लोग ब्याज दरों में अंतर के आधार पर अपने फंड को छोटी बचत की योजनाओं से निकाल उसे डिपॉजिट में लगा देंगे या फिर डिपॉजिट से निकाल कर छोटी बचत की योजनाओं में इनवेस्ट कर देंगे. अगर ऐसा होता तो लोग उस बैंक से होम लोन लेते जहां सबसे कम ब्याज दर है. लेकिन लोग अधिक ब्याज के बावजूद भी बैंक से जुड़े रहते हैं क्योंकि बैंक के साथ उनका एक रिश्ता बन जाता है.'

सबनवीस ने कहा, 'अगर आप मुझसे पूछेंगे कि क्या मुझे ब्याज दरों में मामूली अंतर से अपना निवेश का पैटर्न बदलना चाहिए तो मेरा जवाब होगा नहीं है. छोटी बचत की योजनाओं को लेकर सरकार जो दिशानिर्देश जारी करती है उसमें यह साफ होता है कि आप उस पैसे को बहुत आसानी से न तो निकाल सकते हैं और न ही ट्रांसफर कर सकते हैं. वैसे भी पोस्ट ऑफिस के मुकाबले बैंक जाना ज्यादा आसान होता है. बैंकों में आपको पोस्ट ऑफिस के मुकाबले ज्यादा सेवाएं मिलती हैं.'

वास्तविक कारण

मार्च 2015 में सरकारी बैंकों का ग्रॉस एनपीए 5.20 पर्सेंट से बढ़कर जून 2015 में 6.03 पर्सेंट हो चुका है. एनपीए और रिस्ट्रक्चर्ड अकाउंट भी सितंबर 2015 में 10.7 पर्सेंट रहा और मार्च 2016 में 10.3 पर्सेंट रहा.

अधिक एनपीए की वजह से भारतीय बैंकों के मार्जिन को बड़ा झटका लगा है. यही वजह है कि आरबीआई के तरफ से ब्याज दरों में 125 आधार अंकों की कटौती का फायदा बैंक अपने ग्राहकों को नहीं दे रहे हैं ताकि मार्जिन में सुधार किया जा सके.

अप्रैल 2014 से जून 2015 के बीच छोटी योजनाओं में 4,318 करोड़ रुपये जमा किए गए जबकि बैंकों में 84 लाख करोड़ जमा हुआ

ऑल इंडिया बैंक एंप्लॉइज एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च 2015 तक 7,035 मामले ऐसे हैं जिसमें जान बूझकर डिफॉल्ट किया गया और यह रकम 58,792 करोड़ रुपये रही. आरबीआई और वित्त मंत्रालय के सख्त दिशानिर्देशों की वजह से बैंक अपने एनपीए को बेच रहे हैं ताकि बचत खाते को सुधारा जा सके.

इस साल सरकारी बैंकों ने करीब 50,000 करोड़ रुपये के एनपीए को बिक्री के लिए रखा लेकिन वह महज इसमें से 6,000 करोड़ का एनपीए ही बेच सका. सरकार के एक अधिकारी ने अपना नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर बताया, 'बैंक बेहद खराब हालत में हैं. वह बलि का बकरा खोज रहे हैं. आज यह छोटी बचत की योजनाएं हो सकती हैं और कल कुछ और. हालांकि सच तो यह है कि जब तक एनपीए की गड़बड़ी को दूर नहीं कर लिया जाता तब तक बैंक आरबीआई के ब्याज कटौती का फायदा ग्राहकों को नहीं देंगे. 

आंकड़ों से साफ है कि छोटी बचत की योजनाओं का बैंकों के डिपॉजिट से कोई प्रतिस्पर्धा ही नहीं है. यहां निवेश करने वाले लोगों का पोर्टफोलियो बैंकिंग सेक्टर में निवेश करने वाले लोगों  के पोर्टफोलियो से बिलकुल अलग है. दुर्भाग्यवश सरकार बैंकों के तर्क को लेकर आगे बढ़ रही है जिससे आम लोगों पर फर्क पड़ेगा.

First published: 12 December 2015, 7:54 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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