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ईपीएफ पर मिली राहत को सरकार ने दूसरे तरीके से वसूला

नीरज ठाकुर | Updated on: 23 March 2016, 8:11 IST
QUICK PILL
  • पहले तो सरकार ने डीजल और पेट्रोल पर ड्यूटी में बढ़ोतरी कर कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का फायदा मध्य वर्ग तक नहीं पहुंचने दिया. अब सरकार ने बचत की छोटी योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज दरों में कटौती कर मध्य वर्ग को एक और झटका दिया है.
  • बैंकों और कॉरपोरेट लॉबी के दबाव में सरकार ने नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट, पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (पीपीएफ) और पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट अकाउंट्स में 130 आधार अंकों तक की कटौती कर दी है.

पिछले दो सालों के दौरान एनडीए सरकार ने साफ कर दिया है कि राजस्व में आई गिरावट का भार मध्य और निम्न वर्ग को ही उठाना होगा.

पहले तो सरकार ने डीजल और पेट्रोल पर ड्यूटी में बढ़ोतरी कर कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का फायदा मध्य वर्ग तक नहीं पहुंचने दिया. अब सरकार ने बचत की छोटी योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज दरों में कटौती कर मध्य वर्ग को एक और झटका दिया है.

बैंकों और कॉरपोरेट लॉबी के दबाव में सरकार ने नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट, पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (पीपीएफ) और पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट अकाउंट्स में 130 आधार अंकों तक की कटौती कर दी है. 

इसका मतलब यह हुआ कि मध्य वर्ग को जो रियायत ईपीएफ पर लगने वाले टैक्स के फैसले को वापस लिए जाने से मिली थी उसकी कीमत उन्हें इन बचत योजनाओं पर घटे ब्याज दरों को लेकर चुकानी होगी.

सरकार का कहना है कि छोटी बचत योजनाओं के जरिए उसकी कोशिश मध्य वर्ग के लोगों को निवेश का सुरक्षित विकल्प देना होता है

सरकार का कहना है कि देश में महंगाई कम हो चुकी है इसलिए छोटी बचत की योजनाओं के ब्याज में भी कमी आनी चाहिए. सरकार का कहना है कि छोटी बचत योजनाओं के जरिए उसकी कोशिश मध्य वर्ग के लोगों को निवेश का सुरक्षित विकल्प देना होता है.

सरकार ने पीपीएफ और एनएससी जैसी छोटी बचत की योजनाओं में मिलने वाले ब्याज में 130 आधार अंकों की कटौती की है

हालांकि अगर सरकार को यह लगता है कि महंगाई कम होने पर ब्याज दरों में कटौती होनी चाहिए तो फिर उसने 2009-13 के बीच निवेशकों को ज्यादा ब्याज क्यों नहीं दिया?

मसलन अगर इस अवधि में महंगाई की औसत दर 10 फीसदी रही और सरकार ने 9 फीसदी ब्याज दिया तो निवेशकों के लिए वास्तविक ब्याज की दर -1 फीसदी रही.

2009 से 2013 के बीच सीपीआई इंडेक्स और पीपीएफ के आंकड़ों को देखने के बाद यह समझा जा सकता है कि सरकार ने निवेशकों को नकारात्मक रिटर्न दिया. अधिकांश लोगों ने नकारात्मक ब्याज की दरों को लेकर कोई सवाल नहीं किया क्योंकि उन्हें इसके बारे में पता नहीं था.

हालांकि उन्हें इन बचत योजनाओं में पैसा डालने पर नुकसान हुआ क्योंकि अगर वह इस रकम को स्टॉक मार्केट या म्युचुअल फंड में लगाते तो उन्हें ज्यादा रिटर्न मिलता.

इस दौरान सभी बचत योजनाओं विशेषकर फिक्स्ड डिपॉजिट पर भी निवेशकों को कम या नकरात्मक रिटर्न ही मिला. 

सुविधा के मुताबिक सरकार देती है ब्याज

सवाल यह है कि अगर निवेशकों के पास कम महंगाई के जमाने में ज्यादा ब्याज कमाने का मौका था तो फिर सरकार ने उनके फायदों को छीनने की कोशिश क्यों की?

यूपीए और एनडीए सरकार का इस मामले में एक ही रुख रहा है. कच्चे तेल की कीमत जब 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर थी तब यूपीए सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को विनियंत्रित कर दिया ताकि उपभोक्ताओं से बढ़ी कीमत वसूली जा सके.

लेकिन जब जून 2014 के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में कमी हुई है तब एनडीए ने पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स पर टैक्स बढ़ाने का फैसला किया ताकि वह अतिरिक्त राजस्व जुटा सके. सरकार ने कच्चे तेल की घटती कीमत का फायदा ग्राहकों को देने की बजाए खुद ही रखने का फैसला किया.

बाजार से जुड़ी अर्थव्यवस्था का हवाला देकर छोटी बचत योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज के मामले में लोगों को गुमराह किया गया

बाजार से जुड़ी अर्थव्यवस्था का हवाला देकर छोटी बचत योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज के मामले में लोगों को गुमराह किया गया. क्या एनडीए सरकार यह लिखकर देगी कि अगर भविष्य में महंगाई 12 फीसदी को पार कर जाती है तो वह इसी अनुपात में छोटी बचत की योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज दरों में इजाफा करेगी? क्या वह पीपीएफ या एनएससी पर 15 फीसदी ब्याज देने को तैयार है.

बाजार के जानकार और समर्थक ऐसा अक्सर कहते हैं कि सरकार को इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में पैसे की जरूरत है इसलिए वह अधिक ब्याज दर देकर लोगों को अधिक पैसा नहीं दे सकते.

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मध्य वर्ग को जो फायदा ईपीएफ पर कर लगाए जाने के फैसले को वापस लिए जाने से मिला था वह ब्याज दरों में कटौती से खत्म हो चुका है

मुक्त बाजार के अर्थशास्त्री और वित्तीय अखबारों के संपादक छोटी बचत की योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज दरों में कटौती के फैसले की तारीफ कर रहे हैं. उनका कहना है कि इस फैसले से रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में कटौती का मौका मिलेगा और फि र इससे लोगों को मदद मिलेगी.

लेकिन सवाल यह है कि छोटी बचत में पैसा लगाने वाले कितने लोग होम या कार लोन लेते हैं? छोटी बचत की योजनाओं में देश का मध्य वर्ग और निम्न वर्ग पैसा डालता है. 

ऐसे में ब्याज दरों में की जाने वाली कटौती का सबसे ज्यादा फायदा कॉरपोरेट को होगा जो पहले से ही सरकार और बैंकों का बड़ा पैसा दबा कर बैठे हैं. बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी को ही उठाना पड़ता है.

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First published: 23 March 2016, 8:11 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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