Home » बिज़नेस » Why is the glare of Indian smartphone companies in Modi's make in India
 

मोदी के 'मेक इन इंडिया' में भारतीय स्मार्टफोन कंपनियों की चमक क्यों पड़ रही है फीकी

सुनील रावत | Updated on: 31 January 2018, 14:08 IST

मोदी सरकार का कहना है कि वह भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहती है. सरकार ने इसके लिए 'मेक इन इंडिया' जैसे कार्यक्रम भी शुरू किये. सरकार ने कहा कि लोकल मोबाइल  निर्माता कंपनियों को बढ़ावा दिया जायेगा. इसके पीछे एक बड़ा मकसद रोजगार सृजन करना भी था. क्या भारत की मोबाइल बनाने वाली कंपनियां इसके अंतर्गत तरक्की कर पा रही हैं.

एक ताजा रिपोर्ट की माने तो वर्तमान में भारत में स्थानीय कंपनियों के मुकाबले भारतीय बाजार पर चीनी कंपनियां कब्ज़ा जमाती जा रही हैं. वर्तमान में चीन की कंपनी शाओमी भारतीय बाजार पर अधिपत्य जमा चुकी है. रिसर्च फर्म, काउंटरप्वॉइंट और कैनालिस के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2017 की चौथी तिमाही में शाओमी ने सैमसंग को मात दे दी है. काउंटरप्वाइंट ने पाया कि चौथे क्वॉर्टर में शाओमी ने भारत में जहां 25 फीसदी बाजार पर कब्जा जमाया, वहीं सैमसंग 23 फीसदी पर सिमट गई.

 

क्या हैं भारतीय कंपनियों के हाल 

भारतीय कंपनियां माइक्रोमैक्स, लावा, इंटेक्स और कार्बन एक वक्त भारतीय स्मार्टफोन बाजार की चार बड़ी कंपनियां थी. लेकिन वर्तमान इन कंपनियां की पकड़ बाजार पर कमजोर होती जा रही है. हालांकि बाजार पर इनका प्रभाव अभी समाप्त नहीं हुआ है. ये भारतीय ब्रांड 36 करोड़ स्मार्टफोन वाले स्थानीय बाजार के करीब 20 फीसदी हिस्से पर काबिज हैं.

आंकड़ों की माने तो सितंबर 2017 तक सैमसंग की बाजार हिस्सेदारी 32 फीसदी थी. जबकि माइक्रमैक्स की बाजार हिस्सेदारी 11 फिसदी थी. माइक्रोमैक्स हर तिमाही 80 लाख स्मार्टफोन की बिक्री करती है लेकिन कुल सक्रिय स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं में उसकी हिस्सेदारी 5 फीसदी पर है.

 

भारत में नहीं बन पा रहे स्मार्ट फोन 

बीते दिनों रायटर्स ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि मेक इन इंडिया की लॉन्चिंग के तीन साल बाद भारत में सिर्फ आयातित उपकरणों को असेंबल कर फोन बनाए जा रहे हैं.

भारत में मोबाइल बेचने वाली विदेशी कंपनियां विदेश से कल पुर्जों का आयात कर भारत में फोन असेम्बल कर रही हैं. रिपोर्ट के अनुसार भारत में हेड फोन और चार्जर जैसे समान्य चीजों का मेनुफक्चरिंग हो पायी है.

टेक रिसर्च फर्म काउंटरपॉइंट के मुताबिक, भारत में फोन आयात करने पर ज्यादा टैक्स की व्यवस्था है और कलपुर्जे आयात करने पर कम टैक्स है इसलिए विदेशी कंपनियां भारत में कल पुर्जे आयात कर फोन असेम्बल कर लेती है, जिससे वह टैक्स से भी बच जाती हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक एक विदेशी कंपनी के अधिकारी का कहना है कि 'जब भारत में कोई कंपनी आने का मन बनाती है तो नोकिया के निकलने की बात उसके ध्यान में आ जाती है. गौरतलब है कि नोकिया पर चेन्नई में बने हैंडसेट वैट चुकाए बिना बेचने का आरोप था और इस पर तमिलनाडु सरकार ने कंपनी से 2,400 करोड़ रुपये वैट मांगा था.

भारत में मेक इन इंडिया से बड़ी संख्या में रोजगार आने की बात कही गई थी. 2015 में फॉक्सकॉन जैसी कंपनियों के आने से देश में 50,000 लोगों को रोजगार मिलने की बात कही गयी थी. ताइवान की कंपनी फॉक्सकॉन महाराष्ट्र में एक इलेक्ट्रॉनिक्स प्लांट लगानेवाली थी, लेकिन वह अभी तक नहीं लग पायी है.

First published: 31 January 2018, 14:09 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी