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क्यों PM मोदी के लिए 2019 का रास्ता पेट्रोल पंप से होकर गुजरता है ?

सुनील रावत | Updated on: 21 May 2018, 15:48 IST

अब यह स्पष्ट हो चुका है कि कर्नाटक विधानसभा चुनावों से पहले मोदी सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों को राजनीतिक लाभ के लिए स्थिर रखा. लेकिन चुनाव ख़त्म होने के बाद पेट्रोल की कीमतें अभी तक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है. कर्नाटक चुनाव के दौरान सरकारी तेल कंपनियों ने 19 दिनों के तक कीमतों में वृद्धि नहीं की.

रविवार को पेट्रोल की कीमत 76.24 रुपये प्रति लीटर के रिकॉर्ड उच्च स्तर पहुंच गई और राष्ट्रीय राजधानी में डीजल 67.57 रुपये के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में निरंतर वृद्धि हो रही है. इंटरनेशनल बाजार में तेल की कीमत करीब 80 डॉलर प्रति बैरल हो गई है.

अगले लोकसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है इसलिए तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि बीजेपी के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान कर सकती है. जानकारों की मानें तो आने वाले समय में तेल की कीमतें और भी बढ़ सकती हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि मोदी सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों को 2019 तक कैसे नियंत्रित करेगी.

बढ़ती कीमतों से बोझ को कम करने के लिए सरकार ने उत्पाद शुल्क में कटौती करने से इंकार कर दिया है. सरकार ने कहा कि वैश्विक दरों में हालिया बढ़ोतरी चिंता का विषय है क्योंकि यह आयात बिल को 50 अरब डॉलर तक बढ़ा सकती है और चालू खाता घाटे को प्रभावित कर सकती है. कच्चे तेल की कीमतों में हर 1 डॉलर की वृद्धि के से चालू खाता घाटे पर लगभग 1 अरब डॉलर का असर पड़ता है. केंद्र सरकार वर्तमान में पेट्रोल पर 19.48 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 15.33 रुपये प्रति लीटर का उत्पाद शुल्क लेती है.

जानकारों की मानें तो 'विभिन्न परिदृश्यों में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से आयात बिल पर अधिकतम 25 अरब से 50 अरब डॉलर का भार पड़ सकता है. कीमतों की बढ़ोतरी का प्रमुख कारण देखिए तो पेट्रोल की खुदरा कीमतों में 50% से ज्यादा हिस्सा अलग-अलग टैक्सों और डीलरों के कमीशनों का होता है. डीजल में इसकी हिस्सेदारी 40% से ज्यादा होती है.

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First published: 21 May 2018, 15:37 IST
 
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