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जेटलीजी, जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए पर्यावरण का बजट बहुत कम है

निहार गोखले | Updated on: 28 February 2016, 8:29 IST
QUICK PILL
  • पिछले साल वित्त मंत्री जेटली ने पर्यावरण मंत्रालय को दी जाने वाली रकम में 25 फीसदी की कटौती कर दी. 2015-16 में पर्यावरण मंत्रालय का बजट 1,681 करोड़ रुपये रहा था.
  • पिछले साल जेटली ने नेशनल एडैप्टेशन फंड को 350 करोड़ रुपये दिया. पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर बता सकते हैं कि इस मामूली फंड से देश जलवायु परिवर्तन से होने वाली चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता.

2013 में विश्व बैंक ने भारत के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में इकोसिस्टम के 5.5 फीसदी तक की भागीदारी का अनुमान जाहिर किया था. आंकड़ों में देखा जाए तो यह करीब 1.4 ट्रिलियन के बराबर बैठता है. यह एक बड़ा आंकड़ा है जो हमें पर्यावरण की अहमियत को आंकड़ों की जुबानी बताता है.

अभी तक पर्यावरण मंत्रालय का ऐसा कोई विभाग नहीं है जो यह दावा करे कि उसके पास पर्याप्त फंड है. लेकिन पिछले साल जेटली ने पर्यावरण मंत्रालय को दी जाने वाली रकम में 25 फीसदी की कटौती कर दी. 

2015-16 में पर्यावरण मंत्रालय का बजट 1,681 करोड़ रुपये रहा था. यह 2015-16 में अनुमानति राजस्व का 0.01 फीसदी है. रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अक्टूबर से दिसंबर 2015 के बीच इस रकम से छह गुना अधिक रकम बतौर शुद्ध मुनाफा कमाया है.

पर्यावरण मंत्रालय पर देश की प्राकृति संपदा के संरक्षण की जिम्मेदारी होती है. एक तरफ से इसे जैव विविधता और वन्य जीवन को सुरक्षित रखना है तो वहीं दूसरी तरफ मंत्रायल की जिम्मेदारी वायु, जल और औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के साथ तटीय क्षेत्रों को भी नियंत्रित करने की है. 

प्रोजेक्ट टाइगर को पिछले साल के मुकाबले 15 फीसदी कम रकम दी गई. अब इस प्रोजेक्ट को नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी के नाम से जाना जाता है. 

ऐसा शायद इसलिए किया गया क्योंकि बाघों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखने को मिली. हालांकि इसके बावजूद कई ऐसी प्रजातियां हैं जिनको बचाए रखने की मुहिम को झटका लगा है क्योंकि मंत्रालय के पास इस दिशा में काम करने के लिए पर्याप्त फंड नहीं है.

वाइल्डलाइफ क्राइम ब्यूरो में महज 100 लोगों के काम करने की अनुमति है और फंड की कमी की वजह से कर्मचारियों की संख्या में बढ़ोत्तरी नहीं की जा रही है. हालांकि आपकी सरकार राज्यों को दिए जाने वाले फंड के मामले में विकेंद्रीकरण की बात करती है लेकिन अभी भी केंद्रीय मंत्रालय को ऐसे कई अहम काम करने हैं जिसके लिए पर्याप्त पैसे नहीं है.

वाइल्डलाइफ क्राइम ब्यूरो में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या में फंड की कमी की वजह से बढ़ोत्तरी नहीं की जा रही है

मंत्रालय तीन तरह की मंजूरियां देता है. पर्यावरण, वन और वन्य जीवन. इसके अलावा मंत्रालय की जिम्मेदारी इन तीनों मंजूरियों के उल्लंघन को रोकने की भी होती है. 

मंत्रालय फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया, बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया और ज्यूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को भी संचालित करता है. इन संस्थाओं की जिम्मेदारी नए पौधों और जानवरों की प्रजातियों को पहचानने की होती है. इन कामों को फंड की कमी की स्थिति में पूरा नहीं किया जा सकता.

फंड की कमी

पिछले साल जेटली ने नेशनल एडैप्टेशन फंड को 350 करोड़ रुपये दिए. पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर बता सकते हैं कि इस मामूली फंड से देश जलवायु परिवर्तन से होने वाली चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता. केवल पर्यावरण मंत्री जावड़ेकर ही बता सकते हैं कि नेशनल कॉस्टल मैनेजमेंट प्रोग्राम को दी गई 100 करोड़ रुपये की रकम कहां गई.

यहां तक कि तटीय इलाकों की मैपिंग के काम को पूरा नहीं किया जा सका है जबकि मौजूदा सरकार ने इसके लिए 31 जनवरी की डेडलाइन तय की थी.

ग्रीन हाउस गैसों की कटौती की गई घोषणा के करीब तीन महीनों के भीतर ही बजट पेश किया जा रहा है और सरकार ने संयुक्त राष्ट्र को सौंपी गई रिपोर्ट में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से जुड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है.

31 जनवरी की डेडलाइन के बावजूद तटीय इलाकों की मैपिंग का काम अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है

2030 तक इस दिशा में 2015 की कीमत के आधार पर करीब 2.5 ट्रिलियन डॉलर खर्च होने की उम्मीद है. यानी सालाना करीब 11 ट्रिलियन की रकम खर्च करनी होगी. 

हम जानते हैं कि सरकार यह काम मुख्य तौर पर विदेशी फंड की मदद से करेगी. लेकिन विदेशी फंड पाने की दिशा में कोई स्थायी फ्रेमवर्क नहीं है. धनी देशों ने इस दिशा में गरीब देशों को फंड देने से अपने हाथ खड़े कर लिए हैं.

इसके अलावा आपने पिछले बजट में अक्षय ऊर्जा के संबंध में किए जाने वाले शोध पर दिए जाने वाले फंड में भी कटौती कर दी है. इतना ही नहीं नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज को मुहैया कराए जाने वाले फंड में करीब 80 फीसदी की कटौती की गई है.

क्लीन एनर्जी व्हीकल को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने फेम (फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ हाइब्रिड एंड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स) को 75 करोड़ रुपये दिए थे. 

उम्मीद है कि सरकार इस फंड में वृद्धि करेगी. इस योजना के मद में अलगे दो सालों के दौरान करीब 795 करोड़ रुपये की जरूरत होगी जबकि भारी उद्योग मंत्रालय का कहना है कि इस योजना के लिए 14,000 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी.

सूची में शामिल मांगे अनगिनत हैं. लेकिन सरकार को एक बार विश्व बैंक की रिपोर्ट फिर से देखना चाहिए. इससे हमें पता चलता है कि प्रदूषण की वजह से स्वास्थ्य पर पड़ने वाला असर जीडीपी में करीब तीन फीसदी की हिस्सेदारी रखता है. इसमें कहा गया है कि उत्सर्जन में 30 फीसदी तक की कटौती जीडीपी के मामूली हिस्से को खर्च करके की जा सकती है. समुद्र के जल स्तर में 1-2 मीटर की बढ़ोतरी किसी वित्तीय आकलन से बड़ा नुकसान होगा.

राजकोषीय मामलों का हवाला देकर फंड में कटौती करना आसान है. लेकिन इसका नुकसान आपके आकलन से कहीं अधिक बड़ा होगा.

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First published: 28 February 2016, 8:29 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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