Home » बिज़नेस » World Population Day: India is expected to overtake China’s numbers in the next six years
 

क्या अगले 6 साल में हमारी आबादी चीन को भी पीछे छोड़ देगी ?

कैच ब्यूरो | Updated on: 8 July 2018, 13:37 IST

11 जुलाई विश्व जनसंख्या दिवस है. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत अगले छह वर्षों में जनसंख्या के मामले में चीन से आगे निकल सकता है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत में सरकार इसके लिए क्या काम कर रही है. 2016 में भारत में सबसे ज्यादा 27.9 लाख नए टीबी के मामले सामने आये. इनमे से सबसे ज्यादा शिशु मृत्यु लगभग 9, 00,000 थी. जबकि सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चों की संख्या सबसे बड़ी संख्या (दुनिया के लगभग एक तिहाई 180 मिलियन) थी. इन सभी आंकड़ों का मूल कारण एक है. जनगणना 2011 के अनुसार हर साल भारत की आबादी 121 करोड़ रुपये में से 2.6 करोड़ बच्चों जुड़ते हैं. जो अब लगभग 125 करोड़ होने का अनुमान है.

देश के 640 जिलों में से 146 में कुल प्रजनन दर (टीएफआर - 15-49 साल की प्रजनन आयु अवधि में किसी महिला को पैदा होने वाली बच्चों की औसत संख्या) 3 है, जो राष्ट्रीय औसत 2.2 के मुकाबले 3 है. संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट का अनुमान है कि भारत की आबादी चीन से 2024 तक पार हो सकती है.

 

इसी तरह के देश आर्थिक साक्षरता और जनसंख्या वृद्धि से जूझ रहा है जबकि पडोसी देश इसमें सफलता पाने में काबियाब हुए हैं. पाकिस्तान टीएफआर 3.55 पर, बांग्लादेश 2.14 और नेपाल 2.17 पर स्थित है. भूटान लिविंग स्टैंडर्ड सर्वे रिपोर्ट 2017 के अनुसार केवल भूटान ने कुल प्रजनन दर 1.9 हासिल की है. जिसका मतलब है कि वह अब जनसंख्या में कमी के रास्ते पर है.

पिछले कुछ वर्षों में पारिवारिक नियोजन उपायों को इंट्रा-गर्भाशय गर्भनिरोधक उपकरणों (आईयूसीडी) की तरफ स्थानांतरित हुए है. 1990 के दशक में गर्भ निरोधक गोली का आगमन हुआ था. 2000 में जनसंख्या विरोधी अभियान के लिए सरकार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 100 सदस्यीय राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग की स्थापना की थी.

पिछले साल अपनी नवीनतम राष्ट्रीय परिवार नियोजन पहल के हिस्से के रूप में सरकार ने मिशन परिवार विकास शुरू किया. यह स्वास्थ्य केंद्र में निपटाए जाने के लिए सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या के बजाय सामाजिक मुद्दे के रूप में पारिवार नियोजन से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर पहला प्रयास था. इस पहल में सास बहू सम्मेलन शामिल है जिसका उद्देश्य सास और ससुराल वालों के बीच संचार में सुधार करना है.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में नसबंदी भारत की परिवार नियोजन पहल का मुख्य आधार बन रही है. भारत के जनसंख्या फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक पूनम मुत्तेेजा कहते हैं कि इसके लिए कई कारक हैं. "अस्थायी तरीके हमेशा कुछ दुष्प्रभाव आते हैं. उदाहरण के लिए आईयूसीडी और गोलियां दोनों अनियमित अवधि बनाती हैं.

एनएफएचएस -4 डेटा के अनुसार, 53.5 प्रतिशत जोड़े भारत में "आधुनिक" जन्म नियंत्रण उपायों का उपयोग करते हैं. नसबंदी से गुजर रही महिलाएं उस संख्या का 36 प्रतिशत हैं. इसके बावजूद यह सभी विकल्पों में से सबसे जटिल है. कम से कम पुरुष नसबंदी (0.3 प्रतिशत) है.

ये भी पढ़ें : Success story: लंदन से करोड़ों की नौकरी छोड़कर भारत में खड़ा किया सबसे सफल मिल्क स्टार्टअप

First published: 8 July 2018, 13:37 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी