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जिनके कोयले से देश हुआ रोशन, उन्हीं के घर अंधेरा

शिरीष खरे | Updated on: 20 December 2016, 8:24 IST
(शिरीष खऱे/पत्रिका)
QUICK PILL
  • देश का पावर हब कहे जाने वाले कोरबा में वहां की संरक्षित जनजाति के आदिवासियों को ही बिजली नहीं मिल रही है. 
  • कोल प्लांट लगा होने की वजह से भूजल स्तर गिर गया है और प्लांट उनके लिए साफ़ पेयजल भी मुहैया नहीं करवा रहे हैं. 

कोरबा ज़िले के एक गांव के आदिवासी जब रात के अंधेरे में अपने गांव से सटे रानी अटारी खदान के सब स्टेशन की टिमटिमाती रोशनी देखते हैं तो इनका दिल जलता है. यहां के अड़सरा गांव के 32 पण्डो आदिवासी परिवारों की पीढियां बीतती गईं, लेकिन बिजली नसीब नहीं हुई. उनके गांव केन्दई के ठीक बगल में रानी अटारी की अंडर ग्राउंड कोल माइंस है. यहां से निकलने वाला गंदा पानी सीधे गांव में बहकर आता है. मानमती कहती हैं, 'हम इसी पानी को रोज़मर्रा की ज़रुरत के लिए इस्तेताल करते हैं, क्योंकि दूसरा कोई विकल्प नहीं है'. 

कोरबा देश का पावर हब है, जो प्रदेश की राजधानी रायपुर से करीब 200 किलोमीटर दूर है. यहां संरक्षित जनजाति कोरबा सहित अन्य जनजातियां मुख्य रूप से बसी हैं. यहां की पहचान एशिया के सबसे बड़े खुले कोयला खदान (ओपन कास्ट माइन) गेवरा माइंस की वजह से भी है, जो साउथ ईस्टर्न कोल फिल्ड्स (एसईसीएल) द्वारा कोरबा कोयला क्षेत्र में संचालित कई अंडरग्राउंड और ओपनकास्ट माइन्स में से एक है. इसके अलावा यहां भारत का सबसे बड़ा एल्युमिनियम संयंत्र भारत एल्युमिनियम कंपनी (बालको) भी है. 

पेयजल के लिए खानापूर्ति

क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की कोशिश पर गांव में पीने के पानी के लिए एसईसीएल (साउथ ईस्टर्न कोल्डफील्ड) ने हाल ही में यहां दो पानी की टंकिया लगाईं मगर इस टंकी में भी पेयजल की बजाय गंदा काला पानी था. गांव में पेयजल का एकमात्र स्त्रोत कुंआ है, जो गर्मियों में सूख जाता है. ग्रामीणों ने बताया कि भूमिगत खदान होने के कारण गांव का दोहन हो चुका है. नीचे की जमीन खोखली है, इसलिए यहां हैण्डपंप भी नहीं लग सकते. 

सरकारी आंकड़ों की मानें तो आने वाले तीन साल मे जिले में विकास की गंगा बहने वाली है. खनिज संस्थान न्यास की विकास निधि से कोरबा के विकास में 615 करोड़ 92 लाख रूपए के विकास कार्य होंगे, लेकिन इस पूरी योजना में अड़सरा पंचायत या ग्राम केन्दई का कोई जिक्र नहीं है, जबकि खनिज संस्थान न्यास के लिए स्थापित मापदण्डों के तहत उत्खनन से प्रभावित प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष क्षेत्रों को लाभ दिया जाना है. 

कोरबा जिले में खदान के बाहरी सीमा की 3 से 5 किलोमीटर के बफर जोन की 100 ग्राम पंचायतों के 202 ग्रामों को इसके लिए प्रत्यक्ष प्रभावित माना गया है. 

अब ओपन माइंस की तैयारी

अब रानी अटारी क्षेत्र में एसईसीएल (साउथ ईस्टर्न कोल्डफील्ड) द्वारा ओपन कोल माइंस का संचालन शुरू किए जाने की योजना है. जमीन अधिग्रहण के लिए केन्द्र सरकार ने धारा-4 का प्रकाशन किया है. इसके तहत आदिवासियों का विस्थापन और पुनर्वास की योजना है. वर्तमान में रानी अटारी में दो अंडर ग्राउंड माइंस संचालित हैं. 

यहां पश्चिमी विजय वेस्ट के नाम से ओपन माइंस शुरू करने की तैयारी की जा रही है. छत्तीसगढ़ राज्य खनन विभाग के मुताबिक इसके लिए 2442.71 एकड़ संरक्षित वन भूमि व 571 एकड़ राजस्व भूमि चिन्हांकन किया जा चुका है. चिन्हित भूमि में कोयले का अकूत भंडार होना पाया गया है.

इस गांव के सरपंच गुलाब सिंह बताते हैं, 'खदान में बिजली की व्यवस्था है, लेकिन मांग करने पर बिजली के लिए अधिकारियों ने साफ इंकार कर दिया था. हमने जनदर्शन कार्यक्रम के तहत कलक्टर और मुख्यमंत्री को अपना दुखड़ा सुनाया था. कई बार शासन को शिकायत भेजी. मगर गांव में विकास कार्य बंद हैं. हमारी हालत में कोई सुधार नहीं आया है'. 

मार्क्सवादी नेता सचिव संजय पराते कहते हैं, 'आदिवासी बहुल जिला एवं पांचवी अनुसूची का क्षेत्र होने के बावजूद यहां न तो पेसा कानूनों को मान्यता दी जा रही है और न ही आदिवासी वनाधिकार कानून का पालन किया जा रहा है'.

वहीं, सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट देवेन्द्र पटेल बताते हैं, 'मेरे पास तो ऐसी कोई जानकारी आई नहीं है. आप काफी देर से आए हैं. मैं अब रिलीव होने वाला हूं. अब आप नए एसडीएम से पूछना'.

कोरबा में सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी चौहान बताते हैं, 'कोल इंडिया देश के 20 प्रतिशत कोयले का उत्पादन छत्तीसगढ़ से ही करती है. देश के 52 हजार मिलियन टन से ज़्यादा कोयले का भार इसी राज्य में है. इसके बावजूद उनके घरों में ही बिजली न मिले तो यह विकास के विरोधाभाष को दर्शाता है'.

First published: 20 December 2016, 8:24 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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