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गाइड फ़िल्म के बूढ़े पुरातत्वविद मार्को उर्फ किशोर साहू की 'आत्मकथा'

राजकुमार सोनी | Updated on: 22 October 2016, 7:34 IST
QUICK PILL
दिवंगत अभिनेता किशोर साहू की जन्मशती पर छत्तीसगढ़ सरकार पहली बार याद उन्हें करने जा रही है. राजनांदगांव में उनकी याद में एक महफ़िल सजेगी और उस किताब का विमोचन भी होगा जिसकी पांडुलिपी बड़ी मुश्किल से हासिल हो पाई है. उन्होंने गाइड में वहीदा रहमान के पति और हरे कृष्णा हरे रामा जैसी चर्चित फिल्म में ज़ीनत अमान के पिता की भूमिका के अलावा सैकड़ों फिल्मों में काम किया.

सिनेमा के किसी भी शौकीन से पूछें कि क्या आप किशोर साहू को जानते हैं तो उसका पहला जवाब ना ही होगा. लेकिन जैसे ही आप उसे बताएंगे कि किशोर साहू वहीं है जो देवानंद की फिल्म गाइड में बूढ़ा पुरातत्वविद मार्को था और जिसकी अपनी पत्नी रोजी (वहीदा रहमान) से गुफाओं के भीतर भी तकरार होती थीं तो शौकीन कह उठेगा, 'अरे भाई... मैं मार्को को जानता हूं'. बड़ा ही खडूंस बूढ़ा था. 

मार्को ने एक और सुपर-डुपर हिट फिल्म 'हरे कृष्णा हरे रामा ' में भी जीनत और देवानंद के पिता की भूमिका निभाई थीं. दिलीप कुमार और कामिनी कौशल की फिल्म 'नदिया के पार', राजकुमार और मीना कुमारी की फिल्म 'दिल अपना प्रीत पराई' सहित सैकड़ों फिल्मों में उन्होंने बतौर निर्माता, निर्देशक, लेखक और अभिनेता काम किया था. 

छत्तीसगढ़ के किशोर साहू को भले ही नई पीढ़ी नहीं जानती, लेकिन सरकार उन्हें जन्मशती पर पहली बार याद करने जा रही है. इसी महीने 22 व 23 अक्टूबर को राजनांदगांव में उनकी याद में एक महफ़िल सजेगी जिसमें राजकमल से प्रकाशित उनकी उस पुस्तक का विमोचन भी होगा, जिसकी पांडुलिपि काफी जद्दोजहद के बाद हाथ लगी है.

जीवनी खोजने में लगा एड़ी-चोटी का जोर

देवानंद की फिल्म गाइड में मार्को नई-नई गुफाओं और उसमें कैद रहस्यों की तलाश में रहता है. इस मार्को की जीवनी खोजने में शहर के दो साहित्यकार रमेश अनुपर और संजीव बख्शी को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा. अपने आखिरी सालों में किशोर साहू फिल्मी दुनिया में आ रहे बदलावों से बेहद दुखी थे. 22 अगस्त 1980 में अपने मौत से कुछ पहले उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखने की जानकारी साहित्यकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव को दी थी.

राजेंद्र यादव ने अपने एक लेख में किशोर साहू की बेजोड़ लेखन कला पर टिप्पणी की थी. यादव के देहांत के बाद साहित्यकार विष्णु खरे ने यह जानकारी जुटाई कि किशोर साहू अपने अंतिम दिनों में कहां और किस दशा में रहते थे. खोजबीन के बाद पता चला कि उनका देहांत तो थाईलैंड में हुआ था लेकिन किसी न किसी रुप में उनका संपर्क मुंबई से कायम था. 

विष्णु खरे के बाद साहित्यकार रमेश अनुपम और संजीव बख्शी ने मुबंई की कई गलियों की खाक छानी और एक दिन मुंबई के खार इलाके में उनके बेटे विक्रम साहू और हरे कांच की चूडिय़ां में काम कर चुकी उनकी पुत्री नैना साहू से मुलाकात की. दोनों साहित्यकारों की समझाइश के बाद विक्रम साहू अपने पिता की आत्मकथा के प्रकाशन के लिए तैयार हुए.

साहित्य से नाता

यह बात भी बहुत कम लोगों को मालूम है कि किशोर साहू ने साहित्य का सृजन करते हुए फिल्में बनाईं और अपनी फिल्मों से हिंदी साहित्यकारों को जोड़े भी रखा. साहू जब राजनांदगांव जिले के स्टेट स्कूल में अध्ययनरत थे, तब वे कहानियां और नाटक लिखने लगे थे.

अपने संघर्ष के दिनों में वे फिल्म अभिनेता अशोक कुमार के काफी करीब थे. अशोक कुमार की सिफारिश पर ही उन्हें हिमांशु राय ने अपनी फिल्म जीवन प्रभात में देविका रानी का हीरो बनाया था.

किशोर साहू की इस फिल्म ने सफलता के झंड़े गाड़ दिए थे मगर उनके भीतर का लेखक और कलाकार कुछ नया करना चाहता था. अपनी इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उन्होंने नागपुर का रुख किया और नाटकों में काम किया. इसके बाद इंडिया आर्टिस्ट लिमिटेड नाम की फिल्म निर्माण संस्था बनाई. 

अपनी फिल्म 'बहुरानी' में उन्होंने साहित्यकार अनूपलाल मंडल के उपन्यास मीमांसा को आधार बनाया था. एक फिल्म 'राजा' में उन्होंने साहित्यकार भगवती चरण वर्मा के प्रसिद्ध गीत 'है आज यहां... कल वहां चलो' का इस्तेमाल किया. 

लेखक के रुप में उनके चार कहानी संग्रह 'टेसू के फूल' अभिसार' धुएं की लकीर' और 'छलावा' हिंद पाकेट बुक्स से प्रकाशित हो चुके हैं.

नदिया के पार में छत्तीसगढ़ी

गाहे-बगाहे यह बहस चलती रहती है कि छत्तीसगढ़ी बोली का सबसे पहला प्रयोग किस फिल्मकार ने किया है? ज्यादातर जानकार फिल्म घर द्वार का ज़िक्र करते हैं मगर सच ये है कि किशोर साहू ने सबसे पहले दिलीप कुमार और कामिनी कौशल अभिनीत फिल्म नदिया के पार में कुछ पात्रों से छत्तीसगढ़ी बुलवाई थीं. 

अब तो सिनेमा की कोई लोकप्रिय मैग्जीन नहीं रहीं लेकिन एक समय माधुरी, मायापुरी और स्टार डस्ट से पहले फिल्म इंडिया नाम की मैग्जीन के संपादक बाबूराव पटेल ने किशोर साहू को आचार्य किशोर साहू की उपाधि दी थी. उन्हें आचार्य इसलिए कहा गया था क्योंकि वे अपनी फील्ड के बेजोड़ उस्ताद थे जिनका कोई सानी नहीं था.

70 साल की नैना

फिल्म हरे कांच की चूडिय़ां में बतौर अभिनेत्री मुख्य अभिनेता निभाने वाली किशोर साहू की पुत्री नैना साहू अब 70 साल की हो चुकी है. उनके बेटे विक्रम साहू ने फिल्म सत्ते पर सत्ता में अभिताभ बच्चन के एक भाई की भूमिका निभाई थी, वे भी इन दिनों छोटे-मोटे सीरियलों में काम करके अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं.

दोनों भाई और बहन अपने पिता की जन्मशती पर शिरकत करने के लिए राजनांदगांव आएंगे. सादे और दिलचस्प तर्जे बयां, आम बोलचाल की भाषा में मानवीय संवेदनाओं को उकेरने वाले किशोर साहू को गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकालना एक यादगार लम्हा तो होगा ही.

First published: 22 October 2016, 7:34 IST
 
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