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छत्तीसगढ़: एक सर्जन चाहिए ताकि 5000 ग़रीबों की आंखें बच सकें

शिरीष खरे | Updated on: 18 December 2016, 8:22 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • बिजली कारख़ानों से निकलने वाली धूल और धुएं से जांजगीर-चांपा ज़िले के आदिवासी मोतियाबिंद का शिकार हो रहे हैं. 
  • यहां के ज़िला अस्पताल में एक भी सर्जन नहीं है ताकि उनकी आंखों की रोशनी बचाई जा सके.

धान की खेती के लिए मशहूर रहा छत्तीसगढ़ का जांजगीर-चांपा ज़िला अब यहां के बाशिंदों को अंधा कर रहा है. बीते सालों में यहां बिजली बनाने के कई कारख़ाने लगे. कंपनियों ने अपने पावर प्लांट में आदिवासियों को मज़दूरी पर लगाया. प्लांट से निकलने वाली राख और धूल उनकी आंखों में जाती रही और हज़ारों की तादाद में वे मोतियाबिंद का शिकार हुए.  

विडंबना यह है कि पिछले 14 महीने से ज़िला अस्पताल में एक भी नेत्र सर्जन नहीं है जो इन मज़दूरों की आंखों का ऑपरेशन कर सके. डॉक्टर एएल कोर्राम यहां आख़िरी सर्जन थे. नेत्र विशेषज्ञ कहते हैं कि मोतियाबिंद के शिकार 90 फ़ीसदी मज़दूरों की आंखों की रोशनी आ सकती है, बशर्ते उन्हें इलाज मुहैया करवाया जाए. 

छत्तीसगढ़ सरकार के स्वास्थ्य विभाग का सर्वे कहता है कि बीते चार साल से ज़िले में मोतियाबिंद का ऑपरेशन नहीं हो पा रहा. सर्जरी के इंतज़ार में कम से कम 5 हज़ार ग़रीब यहां ऐसे हैं जिनकी बीमारी अंतिम चरण में पहुंच गई है. अभी भी ऑपरेशन से इनकी आंखें बचाई जा सकती हैं. ऐसा नहीं हुआ तो सभी अंधे हो जाएंगे. 

65 साल की कुंवर बाई ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन गुज़ारती हैं. उनकी आंखों में रोशनी के लिए मोतियाबंदि के ऑपरेशन की ज़रूरत है. मगर सरकारी अस्पताल में सर्जन है नहीं और प्राइवेट अस्पताल का ख़र्चा वह उठा नहीं सकती. ऐसी सूरत में उनके पास इंतज़ार करते-करते अंधा हो जाने के अलावा कोई चारा नहीं है. चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कारख़ानों में बड़ी संख्या में युवा आदिवासी मज़दूरी करते हैं और वो भी इसकी चपेट में हैं. 

  

छत्तीसगढ़ राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र के डॉ. प्रबीर चटर्जी कहते हैं कि जांजगीर-चांपा में संचालित उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं और धूल के कारण इन मरीज़ों की संख्या बढ़ रही है. ज़िले में हर साल 1.6 फीसदी लोग दृष्टिहीनता की श्रेणी में शामिल होते जा रहे हैं. इसकी चपेट में औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोग भी हैं. सबसे ज़्यादा पीड़ित मालखरौदा, डभरा, पामगढ़, बम्हनीडीह विकासखंड के तहत आने वाले गांवों के आदिवासी हैं. 

नेत्र विशेषज्ञों कहते हैं कि मोतियाबिंद के शिकार तकरीबन 90 फीसदी मरीज़ों की आंखों की रोशनी वापस आ सकती है लेकिन इसके लिए सर्जरी करनी ही पड़ेगी. ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. वी जयप्रकाश के मुताबिक नेत्र सर्जन की तैनाती के लिए बीते 14 महीने में पांच बार शासन को चिट्ठी भेजी गई है लेकिन अभी तक कोई पहल दिखाई नहीं पड़ रही.

शिविर पर पाबंदी

छत्तीसगढ़ में मोतियाबिंद जैसे ऑपरेशन के लिए सरकारी शिविर लगने पर भी पाबंदी है. इसकी वजह 2012 से लेकर 2015 के बीच डॉक्टरों की लापरवाही से हुए हादसे हैं. इस दौरान 60 से ज्यादा ऐसे मामले आए जहां सरकारी शिविर में सर्जरी करवाने गए लोगों की आंखें पूरी तरह ख़राब हो गईं. सरकारी सुविधाओं के कमी और डॉक्टरों की लापरवाही को इसकी बड़ी वजह बताया गया था. 

सबसे ज़्यादा शिकायतें दुर्ग के बालौद और धर्मतरी के बागबहरा नेत्र शिविरों से आई थीं. इस हादसे से सरकार को बड़ी बदनामी झेलनी पड़ी थी, इसलिए सरकारी शिविर ही बंद कर दिए गए. अगर शिविर चल रहे होते तो जांजगीर-चांपा के कुछ आदिवासियों की सर्जरी करके उनकी आंखें बचाई जा सकती थीं. 

राष्ट्रीय अंधत्व नियंत्रण कार्यक्रम के राज्य प्रभारी डॉ. सुभाष मिश्रा कहते हैं कि अब किसी भी मरीज की आंखों का ऑपरेशन सिर्फ नियमित अस्पताल के सर्व सुविधा-युक्त ऑपरेशन थियेटर में ही होगा. गुणवत्तापूर्ण सर्जरी के लिए केंद्र सरकार से ही हिदायत आई है. दिलचस्प है कि सरकार इस तरह की तैयारियां करती है लेकिन डॉक्टरों की तैनाती, जो कि सबसे ज़रूरी पहलू है, उसी मोर्चे पर सुस्त दिख रही है. 

बदतर हालात

आंख से जुड़ी तकलीफ़ों और कार्यक्रमों के मामले में राज्य की हालत बदतर है. राज्य स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक नेत्रदान से आंखें लेने के मामले में छत्तीसगढ़ 20वे नंबर पर है. यहां एक साल में महज 83 आखों का दान हुआ है. ऑपरेशन और नेत्रदान के अलावा स्कूली बच्चों को नि:शुल्क चश्मा देने के मामले में भी राज्य लक्ष्य से बहुत पीछे होता जा रहा है. एक साल में 21,070 बच्चों को निशुल्क चश्मा देने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन 7,202 बच्चों तक चश्मा नहीं पहुंचा पाया. 

इसी तरह बीजापुर, सुकमा, सूरजपुर, बलरामपुर, बालौदा बाजार और मुंगेली इस योजना के तहत ज़िला अस्पतालों में आंखों के ऑपरेशन के लिए विशेष यूनिट से छूट गए हैं. 

First published: 18 December 2016, 8:22 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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