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छत्तीसगढ़: राशन की दौड़ 24 किलोमीटर, वो भी पैदल

शिरीष खरे | Updated on: 26 December 2016, 8:36 IST

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 80 किलोमीटर दूर है मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का गृह क्षेत्र राजनांदगांव. राजनांदगांव जिला भी है और जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर और छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र सीमा में मानपुर क्षेत्र की यह है कोराचा पंचायत. मगर अभी सफर खत्म नहीं हुआ, यहां से दुर्गम गली से और 12 किलोमीटर चलने पर हम पहुचंते हैं ग्राम बुकमरका-सुडिय़ाल. यह गांव सामान्य दिखता है, लेकिन है नहीं. वजह यह है कि यह बांसों के लिए मशहूर है.

ग्राम पंचायत कोराचा के पूर्व सरपंच बीरबल शाह मंडावी हमारे साथ हैं. वे बताते हैं, "प्रदेश के वन-विभाग को इस इलाके के बांसों के कारण हर साल करीब एक करोड़ रुपए की कमाई होती है."

बांसों के बावजूद इस अमीर इलाके के लोग बेहद गरीबी और असुविधाओं के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं. हालत यह है कि ग्रामीणों को सरकारी राशन की चाहत में कोराचा पंचायत आने-जाने के लिए कुल 24 किलोमीटर का कठिन सफर तय करना पड़ता है. वयोवृद्ध सुकारो बाई बताती हैं, "छटवीं के बाद बच्चे पढ़ाई के लिए रोजाना इतना नहीं चल सकते. इसलिए जो बच्चे कोराचा में नहीं रह सकते, उनके लिए स्कूल जा पाना संभव नहीं है."

बांसों के बावजूद इस अमीर इलाके के लोग बेहद गरीबी और असुविधाओं के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं.

इसके अलावा भी बुकमरका-सुडिय़ाल गांव के रहवासी कई बुनियादी सहूलियत जैसे सड़क, बिजली और साफ पानी के लिए भी तरस रहे हैं. हम इस गांव तक पहाड़ों के बीच पगडंडी जैसे रास्ते से गुजरते हुए पहुंचे. इसी एकमात्र संकरे रास्ते से होकर लोग सालों से पैदल आते-जाते हैं.

इस दौरान छोटे-बड़े करीब एक दर्जन नाले पड़ते हैं. बारिश में यह नाले पानी लाकर पगडंडी का रास्ता बाधित कर देते हैं. यहां पहुंचे तो यह देखकर हैरत भी हुई कि अक्षय ऊर्जा विभाग ने सोलर पैनल लगाया है. इस तरह, शासन ने वैकल्पिक व्यवस्था के तहत गांव को रोशन बनाने का बीड़ा उठाया था, लेकिन देखरेख के अभाव में यह वैकल्पिक व्यवस्था भी पूरी तरह ठप हो चुकी है.

यहां बिजली नहीं होने के कारण आज के युग में भी टीवी, पंखे या किसी भी इलेक्ट्रानिक चीजों का उपयोग नहीं होता. आधुनिक समय में दिल्ली जैसे महानगरों के लोग एक बिजली विहीन दुनिया में रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. मगर यह यहां की हकीकत है.

ग्रामीण बताते हैं, पहाड़ी पर बसे इन गांवों में जनप्रतिनिधि भी आने से कतराते हैं. चुनाव के समय वोट मांगने आए तो आए, नहीं तो उसके लिए अपने कार्यकर्ताओं को भेज देते हैं. इसके बाद भी वे हर बार इस उम्मीद से 24 किलोमीटर आ-जाकर चुनाव कोराचा पंचायत में मतदान करने पहुंचते हैं कि इस बार सरकार उनकी पूछ-परख करेगी.

कोराचा पंचायत के मुताबिक यहां लगभग 40 घरों में 200 लोग रहते हैं. इस गांव में एक प्राथमिक स्कूल भी है. हम इस स्कूल में गए और यहां के बच्चों से बातचीत की. मगर यहां पढऩे वाले बच्चे अपने राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का नाम तक नाम नहीं बता पाए. यहां दो शिक्षक पदस्थ हैं, जो कोराचा पंचायत से आना-जाना करते हैं.

एक ग्रामीण राम दुग्गा ने बताया, "पांचवीं के बाद ज्यादातर बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं. यहां बीमार होने या प्रसव आदि के लिए घरेलू नुस्खे व वैद्यराज से ही काम चलाया जाता है. अपातकाल की स्थिति होने पर ट्रैक्टर से मानपुर तक मरीज को लाते हैं. इलाज के अभाव में मरीज की मौत भी हो जाती है. एक साल में ही  इलाज के अभाव में 5 लोगों की मौत हो चुकी है." ग्रामीणों ने बताया कि हाल ही में यहां 18 वर्षीय युवती सुमिता दुग्गा की उल्टी-दस्त में मौत हो गई.

गांव से वापस लौटते हुए हमें लगा हम कई सदी पीछे की दुनिया से बाहर निकल रहे हैं. राज्य के मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र होने के बावजूद बुकमरका-सुडिय़ाल विकास के रास्ते से बहुत पीछे छूट गया है. मगर आश्चर्य तो तब हुआ जब पता चला कि जिला मुख्यालय पर तैनात कई आला अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं है. जाहिर है इस तरह ये गांव विकास से छूटे ही रह जाएंगे.

इस बारे में जब मोहला-मानपुर विधायक तेजकुंवर नेताम से चर्चा की तो उन्होंने कहा, "इस तरह का गांव है, पूछकर ही बता सकती हूं. वैसे भी पिछले दिनों क्षेत्र में आयोजित शिविर में जिला प्रशासन के सामने पहुंच-विहीन गांवों में सड़क बनाने की मांग रख चुकी हूं."

दूसरी तरफ, कलक्टर मुकेश बसंल बताते हैं, "वन क्षेत्र होने के कारण वहां सड़क नहीं बनी होगी. ग्रामीणों को परेशानी न हो, इसका पूरा ध्यान रखा जाएगा. जल्दी ही कोई योजना बनाते हैं...."

First published: 26 December 2016, 8:36 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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