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Exclusive: 'उन्हें माओ के विचार नहीं...रोटी चाहिए...बेहतर ज़िंदगी चाहिए'

राजकुमार सोनी | Updated on: 12 July 2017, 13:06 IST
फाइल फोटो

भारतीय पुलिस सेवा 1986 बैच के अफ़सर और नक्सल अभियान के पुलिस महानिदेशक दुर्गेश माधव अवस्थी का मानना है कि छत्तीसगढ़ में माओवाद की जड़ों को मजबूत करने में अफवाह तंत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. बस्तर के बीजापुर और सुकमा जिले में माओवादियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ की घटनाओं का जिक्र करते हुए अवस्थी कहते हैं, "जब इन इलाकों में माओवादियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ की घटना हो गई तो अफवाह तंत्र इस प्रचार में जुट गया कि सरकार का खुफिया तंत्र विफल था और बड़ी संख्या में जवानों की मौत हो गई है. जवान लापता हो गए हैं." माओवादी मोर्चे पर सरकार असफल है. अफवाह तंत्र में कौन-कौन लोग शामिल हैं, ये पूछे जाने पर अवस्थी कहते हैं, "इसमें प्रशासनिक अफसर के अलावा माओवाद के नाम पर रोजी-रोटी कमाने वाले छुटभैये सक्रिय हैं." अवस्थी ने पत्रिका से एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा कि जो लोग माओवाद के ख़ात्मे की बात करते हैं, वे ही लोग माओवाद को पालते और पोसते हैं. पेश है पूरा इंटरव्यू:

सवाल- क्या माओवादी इलाकों में पुलिस की विश्वसनीयता ख़तरे में है?

जवाब- जिस इलाक़े में संघर्ष चल रहा हो, वहां सब कुछ अविश्वसनीय ही होता है. किसी को पता नहीं होता कि कौन माओवादियों के साथ है और कौन पुलिस के साथ. यदि संघर्षरत इलाक़ों में पुलिस ग्रामीणों को प्रताड़ित करना बंद कर देगी, तो उसे ग्रामीणों का सहयोग मिलेगा.

सवाल- क्या आपको लगता है कि बस्तर के ग्रामीण माओवाद के ख़ात्मे के पक्ष में नहीं हैं?

जवाब- माओवादियों को सहयोग देने वाले कुछ ग्रामीण जरूर इस पक्ष में नहीं हैं कि माओवाद का ख़ात्मा हो, लेकिन ज्यादातर लोग यही सोच रखते हैं कि उनके गांव से माओवादी चले जाएं. ग्रामीण माओवादियों से ऊब गए हैं. उन्हें माओ के विचार नहीं...रोटी चाहिए, बेहतर ज़िंदगी चाहिए.

सवाल- छत्तीसगढ़ में माओवादियों के फलने-फूलने की क्या वजह मानते हैं?

जवाब- यहां व्यापारियों और ठेकेदारों से उगाही की एक पुरानी परंपरा चल रही है. बस्तर में सक्रिय माओवादी लंबी-चौड़ी रसद हासिल करते हैं. व्यापारी और ठेकेदार भी उनकी मदद से अपना काम आसान करना चाहते हैं. बस्तर की भौगोलिक परिस्थिति भी माओवादियों को पनाह देती है. बस्तर की सीमाएं आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और ओडिशा से सटी हुई है. माओवादी एक घटना के बाद दूसरे राज्य चले जाते हैं. कहने को तो बस्तर काला पानी कहा जाता है, लेकिन यह इलाक़ा अवैध उगाही का एक बड़ा सेंटर भी है.

सवाल- जब संयुक्त अभियान चलाने की बात होती है, तो फिर माओवादियों की धर-पकड़ में अन्य राज्य सक्रिय क्यों नहीं होते?

जवाब- संयुक्त अभियान चल रहा है. यही एक वजह है कि आंध्र से माओवादियों के पैर उखड़ गए हैं. ओडिशा में भी माओवादी बचते फिर रहे हैं. छत्तीसगढ़ में ज़रूर उनकी सक्रियता दिखाई देती है, लेकिन जल्द ही यहां से भी वे नेस्तनाबूद कर दिए जाएंगे.

सवाल- कई सालों से यह बात कहीं जा रही है कि अब-तब में माओवाद का ख़ात्मा हो जाएगा? आख़िर कोई तो समय सीमा होगी?

जवाब- संघर्षरत इलाक़ों में कोई भी दावा ग़लत है. किसी तरह की छड़ी घुमाकर भी माओवादियों को खदेड़ा नहीं जा सकता. एक दीर्घकालीन नीति पर काम चल रहा है. जिस इलाक़े में शिक्षा का प्रसार होगा. सड़क होगा, पानी और बिजली और रोजगार की सुविधा होगी, तो वहां के लोगों का रुझान माओवाद की तरफ़ नहीं होगा. माओवाद उसी इलाक़े में पनपता है, जहां क्षेत्रीय असंतुलन कायम रहता है.

सवाल- तो क्या यह माना जाए कि सरकार क्षेत्रीय संतुलन कायम नहीं कर पा रही है?

जवाब- पहली बार सरकार मजबूत इच्छा शक्ति के साथ माओवादियों का मुकाबला कर रही है, लेकिन जो लोग माओवाद के नाम पर फल-फूल रहे हैं, वे ही चाहते हैं कि समस्या जस की तस बनी रहे.

सवाल- कहा तो यह भी जाता है कि माओवादियों से मुकाबले के बजाय पुलिस सेफ जोन तलाशती है?

जवाब- यह सब डेढ़-दो साल पहले शायद होता था, जब माओवादियों के नाम पर निर्दोष ग्रामीण फंसाए जाते थे. बच्चों को गोलियों से भून देने की घटना होती थी, लेकिन अब माओवादियों से असली मुठभेड़ हो रही है. पिछली जनवरी से लेकर अब तक सुरक्षाबल और माओवादियों के बीच मुठभेड़ की चार सौ से ज़्यादा घटनाएं हो चुकी हैं. जवान पूरी मुस्तैदी के साथ माओवादियों के प्रभाव क्षेत्र में जाकर मुक़ाबला कर रहे हैं.

सवाल- क्या कारण है कि छत्तीसगढ़ में अब तक किसी बड़े माओवादी लीडर ने आत्मसमर्पण नहीं किया? ज़्यादातर माओवादी भरमार बंदूक चलाने वाले थे?
जवाब- सारे माओवादी लीडर आंध्र प्रदेश के हैं, इसलिए वे आंध्र में ही समर्पण करते हैं. भरमार बंदूक के साथ मुठभेड़ या समर्पण करने वाले जनमिलिशिया के सदस्य होते हैं. आंध्र के माओवादी लेयर का इस्तेमाल करते हैं. पहली लेयर में वे उन्हीं लोगों को सामने रखते हैं, जो पुलिस की गोलियों का निशाना बनते हैं. ऐसे लोग वे ग्रामीण हो सकते हैं, जो माओवादियों का सहयोग करते हैं.

First published: 12 July 2017, 13:06 IST
 
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